आओ हम संसदीय भाषा में बात करें : -राजकुमार अरोड़ा गाइड

आओ हम संसदीय भाषा में बात करें : -राजकुमार अरोड़ा गाइड

कितना अजीब समय आ गया है कुछ वर्षों पहले जब भी कोई गलत,अमर्यादित
भाषा का प्रयोग करता था तो यही कहा जाता था कि असंसदीय या अन
पार्लियामेंट्री लैंग्वेज क्यों बोल रहे हो पर आज जब संसद व विधान सभा में
ही नैतिकताओं को ताक पर रख गाली गलौज,भद्दे व्यंय,मर्यादाहीन भाषा का प्रयोग किया जाता है, कुर्सियां उठा कर एक दूसरे पर फेंकी जाती हैं, माइक तोड़
दिए जाते हैं,गिरेबान तक पकड़ लेते हैं तो फिर यही पंक्तियाँ चरितार्थ होती नज़र
आती हैं-
आओ भयंकर हलचल,हंगामे,उत्पात करें,आओ हम संसदीय भाषा मे बात करें।

जिन लोगों को हम अपना प्रतिनिधि बना कर लोकतंत्र के इन मंदिरों में भेजते हैं
अपने भविष्य के निर्माण व नीतिनिर्धारण के लिये वो अपने ऐसे कुत्सित कुकृत्यों से देश व देशवासियों का मस्तक शर्म से झुका देते हैं, विदेशों में भी छवि धूमिल
होती है।पक्ष और विपक्ष में कौन किसे पुरजोर तरीके से नीचा दिखायेगा,ऐसा ही
दंगल का वातावरण देखने को मिलता है। अब तो दस बारह वर्षों में यह प्रवर्ति बहुत ज्यादा बढ़ गई है, समझ नहीं आता ये देश के कर्णधार आने वाली पीढ़ियों के लिये क्या सन्देश छोड़ना चाहते हैं? क्षोभ तब और ज्यादा बढ़ जाता है जब सत्ता पक्ष ही सुचारू रूप से सरकार चलाने की बजाए विपक्ष से भी ज्यादा आक्रमक और अनैतिक हो जाता है। संसद,विधानसभा आदि के अधिवेशन अब जोरआजमाइश का नज़ारा प्रस्तुत करते लगते हैं।

आज सच में हमारे देश की परिस्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है, किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि सही दिशा में,सही विकास की राह पर कैसे आगे बढ़ा जाये। हर कोई अंधेरे में ही हाथ पांव मारता दिखाई दे रहा है।बस सत्ता बचाने के
लिये सभी स्थापित मान्यताओं को सूली पर टांग दिया है।राहुल गांधी व कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसने वाले अपने को दूसरों से अलग व अति स्वस्थ राजनीति का दावा ठोकने वाली भाजपा व उसके कर्णधार चाहे वो महामना मोदी
जी ही क्यों न हों,कोई कसर नहीं छोड़ते। 82 दिन से चल रहे दिल्ली के द्वार पर धरना दे रहे किसानोँ को संसद में कुटिल मुस्कान के साथ मोदी जी द्वारा आन्दोलनजीवी कहना इन धरतीपुत्रों का अपमान है तो परजीवी कहना कहीं उससे भी ज्यादा। राजनीति में सोहार्द की जगह तल्खी ने ली है।

राजनीतिक कबड्डी के बीच बजट सत्र में बजट पर सही ढंग से चर्चा ही नहीं हुई!किसान आंदोलन छाया रहा। राहुल 23 मिनट के भाषण में 2 मिनट ही बजट पर बोले!कहा कि देश को चार लोग चला रहे हैं हम दो,हमारे दो। राजनीति संसद से सड़क तक जाती है पर संसद व सड़क के वक्तव्य एक जैसे नहीं हो सकते। 2014 में मोदी जी द्वारा बड़े ही व्यंग्यात्मक लहज़े में राहुल गांधी को हर भाषण में”शहज़ादा” कहना, फरवरी 2017 में मोदी जी ने मनमोहन सिंह के लिये’ रेनकोट पहन कर नहाने’ के जिस रूपक का इस्तेमाल जिसे कॉंग्रेस ने तल्ख व बेहूदा कहा तो मनमोहन जी ने नोटबन्दी के लिये’संगठित और कानूनी डाकाज़नी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। 2007 में सोनिया गांधी ने मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था,कॉंग्रेस के प्रमोद तिवारी ने नोटबन्दी को लेकर मोदी की तुलना हिटलर, मुसोलिनी से की। सर्जिकल स्ट्राइक को ले कर राहुल गांधी ने ‘खून की दलाली’ शब्द का प्रयोग किया। मणिशंकर अय्यर,दिग्विजय सिंह,गिरिराज सिंह, सम्बित पात्रा आदि ने अपने गैरजिम्मेदाराना वक्तव्यों से कितनी बार अपने अपने दल के नेताओं से असहज किया है।हरियाणा के कृषि मंत्री जे पी दलाल ने तो आंदोलन के दौरान दो सौ से ऊपर किसानों की मौत को ले कर उपहास की मुद्रा में यूँ कह दिया कि इनको तो मरना ही था घर में होते तो भी मरते। लगता है सत्ता में आते ही इन नेताओं की संवेदनशीलता ही मृतप्राय हो जाती है।

2015 में तो लोकसभा में ऐसी स्थिति भी आई जब कांग्रेस के 44 में से 25 सदस्य निलंबित हो गए थे। मिर्ची स्प्रे छोड़ने से ले कर चाकू निकालने तक की
घटनाएँ हुईं।एक विधेयक को पास कराते वक्क्त इतनी उतेजना थी कि कुछ समय
तक लोकसभा का लाइव प्रसारण भी रोकना पड़ा था ताकि कुछ तस्वीरें देश को
दिखाई न पड़े। यह इतिहास भी मोदी के तथाकथित स्वर्णिम काल में ही रचा गया।राजनीति में व्यंग्य,कटाक्ष और व्यक्तिगत टिप्पणियां कोई नई बात नहीं है,यह कोई भारत की ही विशेषता नहीं है।अभी राहुल गांधी ने चीन के साथ ज़मीन विवाद पर वार्ता को ले कर कहा कि मोदी ने चीन के सामने सिर झुका दिया,वो कायर हैं, सेना के बलिदान पर थूक रहे हैं। सी ए ए आंदोलन के समय पिछले वर्ष भाजपा के अनुराग ठाकुर व कपिल मिश्रा ने एक समुदाय के लिये बहुत ही अभद्र व घिनौने शब्दों का प्रयोग किया था।

राजनीति अब गलाकाट प्रतियोगिता का दूसरा नाम हो गई है।दुर्भाग्य से अब शोर का दौर है। ये कृषि कानून भी पिछले वर्ष जबरदस्त शोर में जबर्दस्ती राज्यसभा में पास कराये गये। ऐसा न करके संसदीय समिति को सौंप जा सकता था। किसानों के हित के लिये बनाया गया कानून किसानों को ही समझाने में विफल है सरकार! आंदोलन जितना लम्बा होता जाएगा उसी के अनुसार न तो पद की गरिमा मर्यादा का ध्यान रखा जाएगा न ही भाषा का! अब सोशलमीडिया पर बहुत ही अभद्र टिप्पणियाँ देखने सुनने को मिल रही है! उन पर लगाम भी कसी जा रही है! मुकद्दमे भी दर्ज किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय मीडिया तो अनजाने दबाव में अपनी भूमिका का निर्वाह ही नहीं कर पा रहा।राष्ट्रीय चैनल पर समसामयिक विषयों पर स्वस्थ बहस नहीं होती,कौन कितने ऊंचे स्वर में येन केन प्रकारेण दूसरे की बोलती बंद करा सकता है, चुभते हुए व्यंग्य कस सकता है। चैनलों को अपनी टी आर पी से मतलब है देश से नहीं! इस के लिये आजकल वे देशहित को कुर्बान करने से नहीं चूकते।

चुनावों के दौर में एक दूसरे को पटखनी देने के चक्कर मे भाषा की मर्यादा तो
आंसू बहाती नज़र आती है। अब पांच राज्यों में चुनाव है। पश्चिमी बंगाल में तो ममता राज को उखाड़ फेंकने को ले कर अभी से ही भाजपा के बड़े बड़े नेता
अपना होशोहवास ही खो बैठे हैं। दोनों ओर से ऊलजलूल शब्दों व आरोप प्रत्यारोप का खूब नज़ारा देखने को मिल रहा है। अमित शाह तो ऐसे गृह मंत्री हैं जो साम दाम दण्ड भेद की नीति से हर राज्य को बस किसी तरह अपने गृह या पाले में लाना चाहते हैं। तथाकथित सरदार पटेल बनने के चक्कर मे पूरे देश के पटल से नैतिकता को ही गायब कर दिया है। रात को सोते दिल्ली आवास में हैं,उठते पश्चिमी बंगाल में हैं। ये दोनों कर्णधार मोदी और शाह प्रचण्ड बहुमत के कारण बहुत ज्यादा आत्ममुग्ध हैं,विपक्ष को कुछ भी कह देना उनके लिये आसान सा हो गया है, पर यह किसी भी रूप में स्वस्थ,नैतिक व अनुकरणीय राजनीति का उदाहरण नहीं है। देश पर महामारी का साया है।अर्थव्यवस्था को खड़ा करने की चुनौती है,राजनीति से यह अपेक्षा की जाती है कि मर्यादा रेखाओं का ध्यान रखें पर दुर्भाग्य से ये रेखाएँ अनवरत धुंधला रही हैं।

अब हम भारतीयों के पास राजनीति में शुचिता व स्वस्थ वातावरण की कल्पना को साकार करने के लिये प्रभु से इन सब राजनीतिज्ञों को सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करने के सिवा और क्या उपाय है? सदाचार व नैतिकता की दुहाई देने वाले ही अब भ्र्ष्टाचार व अनैतिकता की राह पर अग्रसर है। मर्यादा को लांघ कर जो राजनीति को दूषित कर रहे हैं उन्हें चुनावों में हर हाल में नकारना होगा तभी इनको सबक मिलेगा।आम आदमी तो जब ये उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते तो पांच साल तक कसमसाता ही रह जाता है।आम मतदाता भी क्या करे,किसे चुने,सत्ता के इस हमाम में सभी वस्त्रहीन हैं,फिर भी सत्ता को एक ही के हाथों में बार बार दे कर उसे निरंकुश बनाना भी ठीक नहीं,परिवर्तन होता रहेगा तो इन्हें अपने मर्यादाहीन होने के परिणाम का एहसास होगा और स्वस्थ लोकतंत्र के लिये यह बहुत जरूरी है।यही परिवर्तन का एहसास ही नई संभावनाओं को जन्म देगा और सम्भावना का कभी अन्त नहीं होता वो तो अनन्त होती है, इसी में ही तो उसकी खूबसूरती है और इसी का डर इन देश के होने वाले कर्णधारों को होना बहुत जरूरी है।

-राजकुमार अरोड़ा गाइड
कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार
सेक्टर 2,बहादुरगढ़(हरियाणा)

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