इस नववर्ष पर, देश के चप्पे-चप्पे में उजाला हो तम का सँहार करता हर दिल,निर्भय शिवाला हो

इस नववर्ष पर, देश के चप्पे-चप्पे में उजाला हो तम का सँहार करता हर दिल,निर्भय शिवाला हो

2020 सयानेपन की उम्र में कदम बढ़ाती हर उम्र की वो गणना है जहाँ पहुँच कर टीन एेज समाप्त हो जाती है।इस कमसिन उम्र में पाँव न फिसले,इसीलिए हर धार्मिक इँसान अपनी अपनी सामर्थ्यानुसार विद्याध्ययन के साथ साथ स्वाध्याय की ओर अग्रसर होता है और अपने चिंतन से अपने जीवन के उद्देश्य की खोज पर निकल पड़ता है।

यही तो वो उम्र है, जिसमें लुभावने और मादक कारक हर व्यक्ति को अपने मोहपाश में बाँधने का खुला निमन्त्रण देते हैं।सच है कि स्कूल और परिवार की बँदिशों से निकला हर व्यक्ति अपनी आज़ादी को अपनी आकाँक्षाओं की सलीब पर टाँग कर अपना एक अलग ही मज़हब गढ़ लेता है।तब शुरू होती है एक विरोधाभासी सँघर्ष की यात्रा, जिसमें सँस्कार व्यक्ति को अपनी तरफ खींचते हैं और मादकता का ग़ुरूर अपनी तरफ खींचता है।एैसी दुविधापूर्ण स्थिति में हर व्यक्ति को परिवार के उपदेश पुरातनपँथी लगते हैं और समाज के तथाकथित ठेकेदार अपना स्वार्थ साधने के लिए, कुछ कर गुज़रने का जुनून रखने वाली,भोलीभाली मानव जाति को दिशाभ्रमित करके अलगाववादी रास्तों पर भटकने के लिए छोड़ देते हैं।

आज हमारा मुल्क भी इसी दिग्भ्रमित दशा में, अपनी टीन एेज का अँत होने पर, अपनी युवावस्था की सीढ़ी पर पहला कदम बढाने जा रहा है।जिसमें अनेक लुभावनी मनोवृत्तियाँ इस जीवन के सफर में बाधा बन कर आएँगी।बस इतना सा ख़्याल रखना है कि मनभावन मादकताओं का जीवनकाल क्षणभँगुर होता है, और वास्तविक मधुशाला का नशा कभी खत्म नहीं होता, इसलिए समूची मानवजाति के लिए ये सारगर्भित चिंतन और मनन का समय है।

किसी भी मज़हबी धार्मिकता का अँधानुकरण न करते हुए,

बहुत सोच समझ कर हर कदम बढ़ाना होगा, जिससे आज समाज में फैली दुराचारी मानसिकताओं पर लगाम लग सके और एक स्वस्थ एवँ स्वच्छ राष्ट्र का निर्माण हो।

न किसी वेद ग्रँथ का सार रहें

ना ग़ुलामी की प्रीत बहार रहें

निस्वार्थ प्रेम का ही उद्गार रहें

उस अखँड लौ का प्रचार रहें

अनेक शिक्षण सँस्थानों की शिक्षा पर आज का माहौल एक सवाल उठा रहा है – हमारे देश की वैदिक सँस्कृति के जीवन मूल्य कहाँ खो गए ?

अपने घर,गली,मोहल्ले,स्कूल,कॉलेज,ऑफ़िस,शहर और देश में आज किसी भी उम्र की महिला सुरक्षित नहीं है, आखिर क्यूँ ?

हर रोज़ एक भाई,बेटा,पति और पिता घायल होता है

जब रूसवा किसी बेटी की आँख़ का काजल होता है

आजकल जन जन में साक्षरता की मशाल जला कर एक शिक्षित राष्ट्र के निर्माण पर मेहनत की जा रही है।कई सरकारी और ग़ैर सरकारी स्कूल और सँस्थाएँ स्कूल के प्राँगण में “हैप्पीनेस” और “सजगता” की विशेष कक्षाएँ चला रहे हैं।

आए दिन बलात्कार की बढ़ती हुई घटनाओं पर रोक लगाने के लिए, मनीष सिसोदिया जी और अरविंद केजरीवाल जी ने अनेक स्कूलों के बाइस लाख लड़के लड़कियों को विशेष शपथ दिलाते हुए सभी महिलाओं की इज़्ज़त और मदद करने की बात रखी।यही नहीं परिवार और स्कूल में परस्पर सँवाद पर ज़ोर देते हुए अपराधिक प्रवृत्ति के अपराधियों के लिए सामाजिक और पारिवारिक बहिष्कार की बात पर भी विचार किया गया।

लेकिन आज भी बदनामी और उपहास के डर से कितनी ही बेटियों को उनका परिवार अपनी आवाज़ बुलँद करने की इजाज़त नहीं देता।

आज भी बेटों और बेटियों के रहन-सहन और दिनचर्या में ज़मीन आसमान का अँतर पाया जाता है।आखिर एैसा क्यूँ है ?

आज वक्त की ये माँग है कि पुरूष प्रधान मानसिकता को बदला जाए।बेटियों को कराटे और बेटों को पराँठे सिखाए जाएँ, ताकि लिंगभेद की असमानता पर लगाम लगे।

कितने भी सी सी टी वी कैमरे लगाए जाएँ, कितने भी कड़े क़ानून बनाए जाएँ, कितनी भी स्ट्रीट लाइट लगाई जाएँ, लेकिन जब तक व्यक्तिगत सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक, किसी तरह के परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

क्या कारण है कि आज का दिशाहीन युवा वर्ग नशे की गर्त में अपना सुकून खोजने लगा है? जब तक इस समस्या का कारण नहीं ढूँढा जाएगा तब तक इसका निवारण भी असँभव है।

क्या कारण है कि पी एच डी के लिए शोध करती छात्रा को भी बाज़ारू निगाहों का सामना करता पड़ता है, क्या कारण है? काबिल कैंडिडेट की जगह शार्ट कट अपनाती हुई तथाकथित आधुनिक लड़कियों को जॉब मिल जाती है, और काबिल लड़कियाँ डिप्रेशन में आत्महत्या कर लेती हैं।

क्या कारण है कि आज बिना दहेज के बसाई गई बेटियों ने भी पुरूष वर्ग की नाक में दम कर रखा है।

क्या कारण है कि घर बसने से ज्यादा उजड़ने लगे हैं। देश का हर इँसान आज सोशल मीडिया पर हज़ारों लाखों दोस्तों के होते हुए भी वास्तव में अकेला है, और मानसिक अवसाद से ग्रस्त है।

क्या कारण है आज दूध की बोतल के साथ शिशु के हाथ में मोबाइल दे दिया जाता है?

क्या नादान उम्र के बालक टच स्क्रीन पर परोसी जाने वाली अच्छी या बुरी मनोरँजन साइट्स में अँतर समझ सकते हैं?

क्या प्रेम के बाज़ारू तरीक़े कमसिन उम्र के जोड़ों को सही चुनाव की दिशा दिखा सकते हैं?

अधेड़ उम्र के पुरूष छोटी उम्र की लड़कियों को अपनी लोलुपता का शिकार बनाने को ही अपना पुरूषत्व समझते हैं।

कहीं न कहीं पुरूषों के अलावा कुछ महिलाओं की भी मानसिकता बीमार हुई है, जो निजी स्वार्थ के चलते तो पुरूष प्रधान समाज के ओछे प्रस्तावों पर किसी भी तरह का समझौता कर लेती है, लेकिन अपनी नाक पर मक्खी बैठते ही महिला आयोग का रूख कर लेती है।सशक्तीकरण की आढ़ में कुछ महिलाओं ने सँस्कारों की सीमारेखा लाँघ कर खुद को आधुनिक साबित करने की रेस में शामिल कर लिया है जो उसे कभी नहीं जिताएगी।

जब तक ये दोहरी मानसिकता महिलाओं और पुरूषों की सोच पर हावी रहेगी, तब तक इस देश की बीमार मानसिकता का कोई उपचार सँभव नहीं है।

कहीं न कहीं हमारी शिक्षा प्रणाली में ही कमी है जो किसी भी उम्र के विद्यार्थी में वास्तविक शिक्षा के सँस्कार आरोपित नहीं कर पाई।

माँ को ही हर बचपन को सही रास्ता दिखाना होगा

स्कूल भेजने से पहले पाठ सँस्कृति का पढ़ाना होगा

बहनों को अब जीवन मूल्यों का स्वाँग रचाना होगा

भाईयों को सँस्कारों का रक्षा कवच बँधवाना होगा

हर प्रिय को प्रेम का वास्तविक अर्थ समझाना होगा

पत्नी को भी शिव की गौरी सा गरल पिलाना होगा

द्रोण न हो कोई भी गुरू, तब शिष्य सूफ़ियाना होगा

लिंग भेद कहीं न हो,हर रूह को कलमा पढ़ाना होगा

पहचान अपनी और सम्मान ख़ुद का सिखाना होगा

मानवतावादी मानव जीवन का हर अफ़साना होगा

आइए इस नववर्ष पर अपना सार्थक योगदान देकर एक सशक्त मुल्क का निर्माण करें।

इस नववर्ष पर, देश के चप्पे-चप्पे में उजाला हो

तम का सँहार करता हर दिल,निर्भय शिवाला हो

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

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