एक न एक दिन..

एक न एक दिन..

सुदूर.. बचे-खुचे जंगलों में

एक चिड़िया कर रही है प्रार्थना ,

एक न एक दिन..

विज्ञान की किताबें पढ़ते हुए

तुम जरूर महसूस करोगे

कविताओं की कमी ,

.. तब सारे कवि पूर्वज मिलकर

सिखाएंगे विज्ञान की परिभाषाएं !!

एक न एक दिन..

मोबाइल, इंटरनेट..सब रुख कर जाएंगें

जंगलों की ओर ,

कंक्रीट के घरों में फिर उगेगी दूब..

फिर उड़ेगीं तितलियां इतराती हुई..

पतंगें फिर दिखेंगीं सातवे आसमानों पर..

बतियाएंगीं चिड़ियां सारा दिन..

बच्चे फिर खेलेंगे कागज़ की नावों से..

एक न एक दिन..

घोंसले में आएंगीं सभी चिड़ियां फिर से

प्रार्थना करने के लिए !!

नमिता गुप्ता “मनसी”

कविता और कहानी