कविता- जीने का रास्ता

कविता- जीने का रास्ता

मरना यदि हल है समस्याओं का

तो चलो आज मर जाते हैं

थोड़ा थोड़ा घुटने से अच्छा

खुद को ही आज मिटाते हैं।

लेकिन

उससे पहले सुनो जरा सा

कुछ बातें कर लेते हैं

थोड़ी अपनी तुम कहना

थोड़ी अपनी हम कह लेते हैं।

क्या क्या बीती इतने दिन तक

दिल की आज सुना लेते हैं

कब-कब गिरे थे बेसुध होकर

चलो कुछ आंसू गिरा लेते हैं

बात बड़ी थी या थी छोटी

कुछ तो वजह रही होगी

इतने टूटे तुम, तभी तो

जीने की उम्मीद छोड़ी होगी

टूटन से बचने का कोई उपाय नहीं

खुद को समेटने का कोई इलाज नहीं

फिर भी जज्बातों को चलो

कुछ पकड़कर बैठते हैं

तुम भी अपनी आज कहो

थोड़ी हम भी अपनी कह लेते हैं

हो सकता है

जीने का कोई रास्ता मिल जाये

खुशी खुशी मरने की राह समझ आ जाये

खुद को मारे उससे पहले

अपनों की थोड़ा सोच लेते हैं

रोकर गिरे जब कभी

एक कंधा ढूंढ लेते हैं

हो सकता है कोई अपना मिले

संग जीने की जिस संग राह जगे

थोड़ा मरने को छोड़ देते हैं

एक साथी तलाश करते हैं

जिसके संग चलना अच्छा लगे

हो सकता है प्यार सच्चा लगे

और जिस संग हम मरना भूल जाएं

जीने के लिए जिंदगी से कुछ पल चुराए

आओ

जरा खुद भी समझाते हैं

एक मौका देकर जमाने को दिखाते हैं

कि हां मैं कमजोर नहीं

बस भटका हुआ था उलझनों में

सुलझकर देखो मुझे आराम मिला है

अब ना जिंदगी से कोई गिला है।

— जयति जैन नूतन

कविता और कहानी