“काजल”

“काजल”

हरी प्रसाद जी जब गांव से शहर आये तो कुछ भी खास नहीं नहीं था उनके पास। पर  धीरे-धीरे उनकी मेहनत और कुछ चालाकी ने उनको आम आदमी से खास बनादिया। बाबू पुरवा कालोनी में  अच्छा खासा दबदबा कायम हो गया था। वे राम लीला तथा दुर्गापूजा में बड़ी रकम चन्दे में देते थे इस कारण भी वहां के लोग उनकी बहुत इज्जत किया करते थे। अब वे कई संगठनों के अध्यक्ष पद पर भी सुशोभित थे।

        हरी प्रसाद जी बहुत ही नेकदिल इंसान थे किन्तु अपने बढ़ते रुतबे के अनुसार वे अब स्वयं को बहुत  बड़ा  आदमी समझने लगे थे ।वे अब स्वयं को बाकी लोगों से अलग करके देखा करते थे।उनकी पत्नी गायत्री देवी एक कोमल स्वभाव की महिला थीं। उनके दो बेटे और एक बेटी थी । बेटे भी पढ़ लिखकर अच्छी अच्छी जगहों पर लग गये और उन दोनों की शादियां भी अच्छे घरों में हो गयी।

            हरी प्रसाद जी की सबसे छोटी लड़की काजल इण्टर कर रही थी । काजल को अपने भाइयों और पिता पर बहुत ही घमंड था। उसे लगता था कि उसके सारे ही जायज और नाजायज मांगों को उसके भाई व पिता अवश्य पूरा करेंगे। किसी से भी लड़ जाना और किसी को भी पीट देना उसकी आदत में शुमार हो गया था।  कालेज की सभी लड़कियां उससे बच के रहना पसन्द करती थीं। विद्यालय से काजल की शिकायत ज्यादातर उसके घर जाती रहती पर उसके मां पिता भाई सभी हंसकर टाल दिया करते थे।

   “मैडम , काजल अभी बच्ची है , धीरे धीरे उसे अक्ल आ जायेगी।”

    “आप देख लीजिए , और उसे समझाइए । मैंने उसे बहुत समझाया पर वह मानती ही नहीं। मैं भी मजबूर हूं।अन्यथा मैं आपके पास इसकी शिकायत नहीं भेजती।”

  “जानता हूं मैम, अच्छा बताइए अबकी बार आपके आॅफिस के लिए कुर्सियां भिजवा दूं?”

  “अरे इसकी क्या जरूरत है आप तो विद्यालय के लिए कुछ न कुछ करते ही रहते हैं।”

   “वो तो मेरा कर्त्तव्य है । ठीक है तो मैडम जी मैं कल बारह कुर्सियां भिजवा रहा हूं।” कहते हुए काजल का भाई विशाल मुस्कुराते हुए आफिस से बाहर निकल गया। उन्होंने एक बार भी काजल को डांटने या समझाने की जहमत नहीं उठाई। और काजल‌ की हरकतों में और भी इजाफा हो रहा था ।

             काजल के चाचा-चाची उसके घर से चार किमी दूर रहा करते थे। काजल हर शनिवार को छुट्टी के बाद चाची जी के पास चली जाती थी और फिर सोमवार को वह वहीं से ही विद्यालय जाती और वहां से अपने घर। चाची जी के घर इसी

बीच उनके दूर का भाई सुरेश नौकरी की तलाश में आया।           

         काजल को देखकर उनके मन में खोट उत्पन्न हो गया। उसे यह भी नहीं लगा की वह रिश्ते में उसका मामा लगता है । पहले तो धीरे-धीरे उसने काजल की तारीफ करनी चालू की।

      काजल  कितनी अच्छी है , पढ़ने में भी तेज़ बात करने में भी तेज़। प्राय: वह काजल को सुनाते हुए अपनी  बहन से जान बूझ कर कहता। वह मन ही मन डरता तो था कि अगर काजल का मूड खराब हुआ तो वह उसे पीटपाट देगी पर था वह बहुत ही ढीठ टाइप का इंसान।

     धीरे-धीरे उसने काजल को अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से बहला ही लिया।अब वह उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने लगा।कभी कैरम खेलने के बहाने तो कभी उसे वह

स्कूटी सिखाने  , कभी कोई जगह दिखाने के बहाने तलाशता ही रहता।

      “काजल चल तुझे स्कूटी चलाना सिखाता हूं। साइकिल तो तू चला ही लेती है, स्कूटी तो दो दिन में सीख लेगी।”सुरेश ने काजल से कहा

   ” चलो फिर मैं पापा से स्कूटी खरिदवा लूंगी।”

चार दिनों में ही काजल को स्कूटी चलाना आ गया पर इन्ही दिनों में वह सुरेश की तरफ भी आकर्षित हो चुकी थी।

  “काजल तू मुझे बहुत अच्छी लगती है।” उसने काजल को अपनी तरफ आकर्षित होते देखा तो अपनी चाल चल ही दी।

     “पर तुम तो मेरे मामा लगते हो।”काजल ने मासूमियत से

कहा।

        मामा ,अरे नहीं , मैं इनका कोई सगा भाई थोड़े ही हूं।

 मैं तो इनके बहुत ही दूर की रिश्तेदारी में आता हूं। हमारी तो शादी भी हो सकती है।

     ‌‌सुरेश ने जब यही बात अपनी बहन से कहा तो उन्होंने पहले तो उसको समझाया और जब उसकी  समझ में नहीं आया तो अपने घर से जाने के लिए कह दिया।

                  सुरेश वहां से तो चला गया लेकिन अब वह बीच-बीच में कानपुर आकर काजल से स्कूल के गेट पर आकर  मिलने लगा।

     काजल अपने घर में सबकी लाडली थी पर चाची जी की बात सुनने के बाद समझ गयी थी की उसकी जिद यहां काम नहीं करेगी। उसने ‌अपनी चाची से यह सब बातें मां को नहीं बताने के लिए राजी कर लिया था। यहां तक कि उसके चाचा जी को भी यह सब बातें नहीं पता थीं। धीरे-धीरे सुरेश ने

काजल को अपने साथ घर से भागने तथा रुपए पैसे लाने के लिए भी राजी कर लिया।

      मां की आलमारी की चाबी और उसमें रखे सारे रुपये -पैसे ,जेवरात सब कुछ काजल के हाथों में ही रहता था। एक दिन जब घर में सभी लोग सो रहे थे काजल ने एक बैग में रुपये-पैसे और जेवरात रखे तथा सुरेश के साथ आगरा भाग

गयी। सुबह जब काजल घर में नहीं मिली तो सभी परेशान हो उठे।

   आखिर यह लड़की गयी कहां? मां परेशान थीं।

    कहीं चाचीजी के घर तो नहीं गयी है?भाभी ने कहा।

  “अरे जाती तो बता के जाती ऐसे चुपचाप कैसे चली जायेगी । फिर भी चाचाजी से पता किया गया तो उन्होंने इन्कार कर दिया। वे उसी समय अपने जेठ के घर पहुंची। वहां जाकर उन्होंने काजल और सुरेश की पूरी कहानी उनको सुना

दी।

  “फिर तुमने इतनी बड़ी बात मुझसे क्यों नहीं  बताई?”

    “क्या करती दीदी काजल ने कसम खायी थी कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी और मैंने सुरेश को तो उसी समय अपने घर से निकाल दिया था।”

  काजल की मां ने जब अपनी आलमारी खोली तो और भी सन्नाटे में आ गई। आलमारी के सारे जेवरात और पैसे गायब थे। सबने आपस में सलाह किया की अगर कोई काजल के बारे में पूछे तो यही बताना है कि वह अपनी नानी के यहां गई है और वहीं से बी.ए. कर रही है।

  सबने वैसा ही किया। कोई रिपोर्ट नहीं की गई उन लोगों ने उसे मृत ही समझ लिया।

       करीब दो साल बाद जब सारे रुपए पैसे और जेवर खत्म हो गए तब सुरेश ने काजल से कहा ,”चलो अपने मां बाप से कहो की वे हमारी शादी कर दें। ऐसे हम लोग भला कब तक रहेंगे?”

   “कब से तो कह रही हूं चलो कोर्ट में शादी कर लेते हैं पर तुम तो सुन ही नहीं रहे हो। न तो कोई काम-धंधा ही कर रहे हो । अब तो तीसरा सदस्य भी आने वाला है।”

     “इसीलिए तो कह रहा हूं की अब तक तुम्हारे मां -बाप और भाइयों का गुस्सा ठंडा हो गया होगा चलो उनसे कहो कि अब हमारी शादी कर दें।”

  “मम्मी पापा के पास नहीं चाचीजी के घर पर चलेंगे और वहीं पर मम्मी पापा और भाई को भी बुला लेंगे।”काजल ने

कहा।

    काजल सुरेश के निकम्मेपन से भी तंग आ चुकी थी। उसे अपने किए कार्य पर भी बहुत ही पछतावा हो रहा था। फिर भी वह मन मसोसकर शादी के लिए तैयार थी।

               लाल-लाल साड़ी ,मांग में सिंदूर ,माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी , हाथों में चूड़ियां ,गले में मंगलसूत्र पहने एक दिन काजल सुबह-सुबह ही अपनी चाचीजी के दरवाजे पर खड़ी थी और उसके पीछे सुरेश अटैची पकड़े  खड़ा था । मुहल्ले के लोग उसे और सुरेश को दोनों को ही पहचानते थे। उनकी आपस में खुसुर फुसुर चालू हो गई।

           चाचीजी ने दरवाजा खोला तो काजल को देखते ही उसे और सुरेश को तुरंत घर के अन्दर कर लिया । और फिर जल्दी से दरवाजा बन्द करके उन दोनों पर बिफर पड़ी,”अब क्या करने के लिए यहां दोनों आये हो , वहीं जाओ जहां दोनों अब तक रह रहे थे।”

      काजल चाची जी के पैरों को पकड़ कर रोने लगी तथा अपने किए पर माफी मांगने लगी। उसके चाचाजी ने अपने भाई भाभी को खबर दी तो उन्होंने वहां आने से मना कर दिया तथा बड़े बेटे को वहां पर भेज दिया। यहां सुरेश ने अपने घरवालों को भी बुला लिया था। उसके घरवाले भी वहां पहुंच गए।सभी ने मिलकर यही हल निकाला की दोनों की शादी कर दी जाए।

         किसी तरह दिल पर पत्थर रख कर उन दोनों की शादी करने पर काजल का भाई राजी हुआ। अब सुरेश ने फिर दांव खेला।वह बोला,”यह शादी तो मैं तभी करूंगा जब आप लोग मुझे पांच लाख रुपए दहेज में दोगे।” काजल का भाई खून के

घूंट पी कर रह गया।

      काजल ने जब यह सुना तो वह तुरंत बाथरूम में गयी। उसने सारा सिंदूर धो डाला। बिंदी छुड़ाकर फेंक दी और बिछुआ पायल मंगल सूत्र सब निकाल कर टेबल पर रख दिया। वह सूट पहनकर तथा चाचाजी के चमड़े के चप्पल को

पहनकर दनदनाती हुए सबके बीच बैठक में पहुंच गई।वहां उसका भाई दहेज देने से मना कर रहा था तथा सुरेश दहेज पर अड़ा हुआ था।

               काजल ने अपने पैरों से चाचाजी की बाटा वाली चप्पल निकाली और दनादन सुरेश के मुंहपर लगाना चालू कर दिया। जब तक कोई कुछ समझ पाता पच्चीसों चप्पल सुरेश के मुंह पर पड़ चुके थे।

       “दहेज़ लेगा ,ले दहेज  और  क्या सबूत है कि तेरे साथ मेरी शादी हुई है। अब तू भाग जा यहां से ‌मेरे भाई तुझे चवन्नी भी नहीं देंगे। भाग जा और कभी दुबारा यहां दिखाई भी मत पड़ना। ” काजल के भाईयों के मन की मुराद पूरी हो गई । उन्होंने भी उसकी जम कर धुलाई की । सुरेश तथा उसके परिवार वालों को वहां से भागने में ही अब भलाई नजर आ रही थे। वे सब वहां से भाग खड़े हुए।

     काजल फिर से अपने मां बाप के पास आ गई। लोगों से कहा गया कि काजल नानी के यहां से पढ़ाई पूरी कर के आ गई। इधर काजल अपने आप डाक्टर के पास जाकर आने वाले सदस्य से भी छुटकारा ले लिया। कानाफूसी तो चलती पर बोलने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी।उसी साल उसकी शादी एक विदेश में रहने वाले इंजीनियर लड़के से धूमधाम से हो गई। अब वह लंदन में रहती है और दो तीन साल में एक बार अपने मायके भी घूमने आती रहती है। उसके चेहरे पर किसी प्रकार की परेशानी की रेखा नहीं दिखाई दी।

 डॉ सरला सिंह स्निग्धा

दिल्ली

कविता और कहानी