खिसक रही है ज़मीं पाँव तले से

खिसक रही है ज़मीं पाँव तले से

खिसक रही है ज़मीं पाँव तले से

और खौफ ज़रा नहीं जलजले से ।

अजीब दौर है आ गया अब यारों

खुदगर्जी फैल रही अच्छे भले से ।

न किसी को मतलब है किसी से

न कोई लगाता किसी को गले से ।

वो तो नफरत से देगा हर जवाब

पूछ रहे हो हाल गर दिल जले से ।

तू भी अजय किसे समझा रहा है

बात उतरेगी ही नहीं इनके गले से ।

-अजय प्रसाद

कविता और कहानी