“खुशी के आंसु”

“खुशी के आंसु”

गायत्री देवी की जिन्दगी पिछले एक साल में बिल्कुल बदल गई थी। गायत्री देवी एक सरकारी विद्यालय में अध्यापिका थी और उनके पति एक सेवामुक्त अभियंता थे। पिछले वर्ष उनके पति को अचानक ही दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे। गायत्री देवी इस घटना से एकदम टूट गई। अक्सर बीमार रहती। उनका एक ही बेटा था। बेटा अपने परिवार के साथ दूसरे शहर में रहता था। बेटा और बहू दोनों ही नौकरी करते थे। अपने पिता के जाने के बाद बेटा हर महीने अपनी मां से मिलने आता रहता था। फिर धीरे धीरे उसका आना कम होता गया। एक दिन आया तो गायत्री देवी को अपने साथ अपने घर ले गया। गायत्री देवी ने भी कुछ नहीं कहा, चुपचाप बेटे के साथ चली गई। घर का ताला लगाते समय उनकी आंखों में आसूं छलक आए। जिस दिन से घर बना था, एक दिन के लिए भी वो घर को अकेला छोड़कर नहीं गई थी। बेटा और बहू भी अपनी छुट्टी में उनके पास ही आकर रहते थे। बड़े घर में बच्चों का भी मन लगता था। भारी मन से उन्होंने बंद घर की तरफ देखा और बेटे के साथ चली गई। मन इसी बात से परेशान था कि जाने वापिस आ भी पाएंगी या नहीं फिर से अपने घर पर रहने के लिए।

गायत्री देवी के आने पर बहू ने छुट्टी लेने के लिए कहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। बेटा बहू सुबह आठ बजे घर से निकल जाते और रात को आठ बजे ही घर वापिस आते। उनके पीछे गायत्री देवी खाना बना देती और घर के बाकी काम निपटा देती। बेटा और बहू दोनों ही खुश थे कि मां ने कितनी जल्दी उनकी दिनचर्या के साथ सामंजस्य बिठा लिया था। कुछ दिनों में ही गायत्री देवी ने महसूस कर लिया कि वो अधिक दिनों तक उनके साथ नहीं रह पाएंगी। पूरा दिन उन्हें अकेले ही गुजारना पड़ता। पास पड़ौस में भी किसी को नहीं जानती थी। तभी संयोग से उनके विद्यालय से फोन आया कि वो सूचित करें कि कब तक विद्यालय वापिस आ जाएंगी। उन्होंने बेटे के सामने बताया। बेटे का कहना था कि उन्हें अपना स्थानांतरण इसी शहर में करवा लेना चाहिए। सब लोग साथ ही रहेंगे। उस मकान को बेचकर यहीं कोई बड़ा मकान खरीद लेंगे। गायत्री देवी जानती थी कि बेटे का सुझाव अच्छा है लेकिन वो उसी विद्यालय से सेवामुक्त होना चाहती थी, जिसमें इतने वर्षों तक उन्होंने काम किया था। सेवामुक्त होने में दो वर्ष का समय बचा था। बेटे ने उनकी बात मान ली लेकिन एक शर्त पर कि वो हर महीने उनके पास आती रहेंगी। गायत्री देवी अपने घर वापिस आ गई। बच्चों को पढ़ाते पढ़ाते दो वर्ष कब गुज़र गए पता ही नहीं चला। अब उन्हें चिंता रहने लगी कि एक दिन बेटा आकर उन्हें अपने साथ ले जाएगा, अब उनके पास वापस लौट आने का भी कोई बहाना नहीं था।

एक दिन उनके विद्यालय के प्रधानचार्य अपनी पत्नी के साथ उनसे मिलने आए। बातों बातों में पता लगा कि उनकी पत्नी गरीब बच्चों के लिए शाम को एक विद्यालय चला रही थी। वे बच्चे दिन में काम पर जाते और शाम को दो घंटे उनके पास पढ़ते। लेकिन कुछ समस्याओं के चलते उनकी पढ़ाने की जगह अब उन्हें नहीं मिल रही थी। उनके घर में इतनी जगह नहीं थी कि बच्चों को बुलाकर पढ़ाया जा सके। उनके बच्चे अभी पढ़ रहे थे इसलिए उनके पास ही रहते थे। उन्होंने गायत्री देवी से पूछा कि क्या वो उनका सहयोग करेंगी ? गायत्री देवी पहले तो कुछ नहीं बोली लेकिन फिर उन्होंने अपने मन को दृढ़ करते हुए कहा कि उन्हें बहुत खुशी होगी उन बच्चों को पढ़ने की सुविधा देकर। वो खुद भी उन बच्चों को गणित विषय पढ़ा देंगी। प्रधानाचार्य जी की पत्नी बहुत प्रसन्न थी। गायत्री देवी ने रात को बेटे को फोन करके पूरी बात बता दी। ” बेटा मैंने अपनी अब तक की जिंदगी में तुम्हारी और तुम्हारे पिताजी की खुशी को अपनी खुशी माना है। लेकिन अब मैं अपनी खुशी के लिए कुछ करने जा रही हूं। जीवन में पहली बार मैंने खुशी का मोल पहचाना है। मैं यहीं रहकर अपना बाकी जीवन, इन बच्चों का भविष्य संवारने में लगाऊंगी। तुम्हारे घर नहीं आ सकती।” बेटा हंस पड़ा। ” मैं जानता था मां तुम अपने समय का एक एक पल महत्वपूर्ण बनाना जानती हो। पिताजी के जाने के बाद खुद को भूल गई थी, बस। मुझे तुम्हारी खुशी चाहिए, उसका कोई भी मोल हो।” गायत्री देवी आज अपनी आंखो से आंसुओं को बहा देना चाहती थी। इसके बाद तो उन्हें खुश ही रहना था।

अर्चना त्यागी

कविता और कहानी