गुल्ली”

गुल्ली”

 जानकीनाथ जी के घर आज सुबह से ही चहल-पहल हो रही थी।उनकी पत्नी ने एक पुत्र

रत्न को जन्म दिया था। कई वर्षों की भगवान के पूजा पाठ तथा विनती के बाद अब जाकर

भगवान ने उनकी प्रार्थना सुनी थी।पूरे गांव भर

में मिठाई बंटवाई जा रही थी। तभी एक गिल्ली

छिटकर जानकीनाथ के पिता रामसिंह के पैरों में आ लगी। इसी बात को लेकर के दोनों ही परिवार के लड़के भिड़ गए। खुशी का सारा वातावरण बोझिल होने लगा । तभी गांव के ही कुछ बड़े लोगों ने मिलकर दोनों ही परिवार को शांत कराया। शांत ही नहीं कराया बल्कि बेटे

होने पर जो मिठाई बंटवाई जा रही थी उसमें से

उन लोगों को भी खिलाया और समझाया की

छोटी छोटी बातों पर लड़ाई नहीं करनी चाहिए।

          आज शहरों में कोई भी कट मर जाये किसी को कोई परवाह नहीं होती है। गांव के जैसा बीच-बचाव का काम शहरों या महानगरों में नहीं दिखता है। कई बार यह बीच बचाव का

काम कितनी ही जिंदगियों को अस्त होने से

बचा ले जाती हैं। गांवों में अभी भी भाईचारे की

भावना जीवन्त है। शहरों की तरह गांव में एक

भी घटना नहीं मिलती की कोई भूखा मर गया।

 कोई भी कार्य प्रयोजन हो सभी एक जुट होकर

हंसी खुशी व मिलजुलकर काम निबटा लेते हैं।

            कुछ समय बाद बच्चे के नामकरण का

दिन आया। दादाजी के मुख से अनायास ही

निकल गया ” गुल्ली “। बस उनकी यही बात

सबने पकड़ लिया और बच्चे का नामकरण कर दिया गया। पंडित जी ने जोर से कहा,”आज से

इस बच्चे का नाम गुल्ली है।” दादा जी लाख मना करते रहे पर जो नाम रख उठा सो रख उठा ।

          छोटे में तो सब ठीक-ठाक था यह नाम

चल गया पर जैसे जैसे बच्चा बड़ा होने लगा

उसे यह नाम बिल्कुल नहीं अच्छा लगता था।

जब विद्यालय में नाम लिखवाया गया तब

वहां भी उसके पिता ने उसका नाम गुल्ली ही

रखा। फार्म भरकर जब उसने अध्यापक को

थमाया तो वे चौंक पड़े। वे एक समझदार इंसान थे उन्होंने पूछा , “”गुल्ली ” यह क्या नामरखा है आपने ? घर का नाम घर पर ही रहने दीजिए

विद्यालय में कोई दूसरा नाम रखिए।” मगर

जानकीनाथ को तो अपने पिता के द्वारा रखा

गया नाम ही चाहिए था।

  “नहीं सर ,यह इसके दादाजी के द्वारा रखा गया नाम है।इसका नाम यही रहेगा।”

अध्यापक ने भी इससे अधिक बहस करना उचित नहीं समझा।

               विद्यालय में जब अन्य बच्चे उसको चिढ़ाते तब वह घर पर आकर रोता था और

पिता जी से जिद करता की वे उसका नाम बदल दें पर पिता भी सच्चे पितृभक्त थे भला

उनके पिता जी द्वारा रखा गया नाम कैसे बदल

सकता था। बच्चा मन मसोस कर रह जाता फिर धीरे धीरे उसने उस नाम को स्वीकार कर लिया।

        प्राइमरी , हाईस्कूल फिर इण्टर की पढ़ाई

पूरी हुई। हाईस्कूल की तरह ही  इण्टर में भी

उसके औसत नम्बर ही आये थे पर पास तो था वह भी सांइस लेकर। पिता ने पूरे गांव भर में मिठाई बंटवाई। मां सीता देवी के खुशी का कोई

ठिकाना ही नहीं था। दादा दादी तो भगवान

को बार बार धन्यवाद दे रहे थे कि उन्हें इतना

समझदार और होशियार नाती मिला। इकलौता

होने पर भी गुल्ली में कोई ऐब नहीं था ,वह

बहुत ही संस्कारी लड़का था । गांव में सभी की

मदद हेतु सदैव तत्पर रहता था।

        अब आगे की शिक्षा के लिए सोच-विचार

आरम्भ हुआ। गुल्ली बी टेक करना चाहता था। सरकारी कॉलेज के लिए भी कोशिश की पर

सफल नहीं हो सका।अन्तत: पॉलिटेक्निक कॉलेज में एडमिशन ले लिया। वहां पर भी वह

अपने अच्छे व्यवहार और सभ्य स्वभाव के कारण सभी अध्यापक व अध्यापिकाओं को

हमेशा ही प्रिय रहा।

        प्रथम वर्ष की प्रैक्टिकल की परीक्षा चल

रही थी। केमिस्ट्री लैब में प्रैक्टिकल के दौरान

उससे गलती से ब्यूरेट टूट गया। गुल्ली जोर से चीख पड़ा । सभी उसकी ओर दौड़ पड़े। वहां

गुल्ली छटपटा रहा था। केमिकल पड़ने से उसके शरीर का कुछ हिस्सा झुलस गया था।

कुछ केमिकल उसके मुंह में भी चला गया था।

कॉलेज प्रबंधन ने उसे तत्काल हॉस्पिटल भेजा।

कुछ दिनों बाद वह ठीक-ठाक होकर वापस आ

गया।

     धीरे-धीरे समय बीतता गया ,गुल्ली ने दूसरे

तथा तीसरे वर्ष की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली

थी। सभी बच्चों की तरह गुल्ली भी अपने घर

चला गया। उसे एक कम्पनी में नौकरी भी मिल

गयी । नौकरी मिलने पर उसके लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आने लगे ।

             किस्मत कभी कभी बहुत ही कठोरता से पेश आती है। अचानक ही गुल्ली की तबियत खराब होने लगी। तबियत खराब होने के कारण ही उसे कम्पनी की नौकरी भी छोड़नी पड़गयी।

डॉक्टर तरह-तरह के टेस्ट करवा रहे थे।  पर

बीमारी पकड़ में नहीं आ पा रही थी। वह दिन

प्रतिदिन क्षीणकाय होता जा रहा था। धीरे-धीरे

घर परिवार वालों ने भी उससे कन्नी काटना

आरंभ कर दिया। बूढ़े मां-बाप को वह ज्यादा

परेशान करना नहीं चाहता था। अकेले ही

सरकारी अस्पतालों के धक्के खा रहा था पर

कहीं कोई सुनवाई नहीं हो पा रही थी।

    उसके सिर में घाव सा हो गया था जो ठीक

होने का नाम ही नहीं ले रहा था। प्राइवेट अस्पतालों में दिखाने पर वे इतने अधिक पैसों

की मांग करते की उन्हें वहां से हटना ही पड़ता।

          इसी तरह  अकेले ही वह एक सरकारी

अस्पताल स्वरूपरानी में इस उम्मीद से गया की

शायद अबकी बार डॉक्टर उसकी सुन ले पर

नहीं उन्होंने फिर उसे झिड़क कर भगा दिया।

उधर से गुजर रहा था कि उसे चक्कर सा आने लगा। वह वहीं पर पड़ी बेंच पर बैठ गया।फटे

हुए मैले कपड़े सिर पर बैठती हुई मक्खियां

तथा मुखपर टाइट बंधा एक मैला सा अंगोछा

देखकर वहां के सफाईकर्मी भी अपनी झाड़ू से

ठेलते हुए उसे भगाने लगे।

    मैडम सरिता भी किसी मरीज से मिलने

वहां गयी थीं। नीचे जाकर कुछ देर बैठकर फिर

घर जाना चाहती थी।तभी उनकी नजर सामने के खाली जगह पर बैठे एक सांड़ पर पड़ी जो

बहुत घायल था। या तो किसी वाहन से टकरा

कर घायल हुआ था या दो सांड़ो की आपस की लड़ाई में घायल हुआ था। उसके घाव पर मक्खियां भिनभिना रही थी और वह तड़प रहा था।बार बार सिर झटकता मक्खियां उड़तीं और

फिर आकर बैठ जातीं थीं।

             मैडम सरिता को उस सांड़ की दशा

नहीं देखी गयी उन्होंने तुरंत ही अपनी मित्र और पशु चिकित्साधिकारी डॉक्टर रचना दीक्षित को फोन मिलाया और उनसे उस सांड़ को वहां से उठाने और उसके इलाज  का समुचित प्रबंध कराने का आग्रह किया। डॉक्टर रचना एक

बहुत ही भली और नेकदिल इंसान थीं उन्होंने

तुरंत ही हामी भर दी।

        उधर से गुल्ली को भगाते हुए दोनों सफाई

कर्मी चले आ रहे थे। युवक मैडम सरिता के

सामने आते ही रुक गया। वे दोनों फिर झाड़ू से

उसे ठेलने लगे। मैडम सरिता ने मीडिया की धमकी दी तब कहीं दोनों पीछे हटे। तभी वह

युवक थोड़ी दूर पर आकर खड़ा हो गया और

मैडम सरिता को देखकर बोला,”गुडआफ्टरनून

मैम ,मैं गुल्ली हूं।” मैडम यह सुनते ही अवाक रह गयीं , उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

उन्होंने उससे कहा,”बेटा तुम यहीं बैठो, मैं देख

रही हूं कि क्या कर सकती हूं।” गुल्ली चुपचाप

कुछ दूरी बनाकर वहीं बैठ गया। उसके आंखों में एक हल्की सी आशा की किरण चमक रही थी।

             मैडम सरिता ने अब तक अपने लिए कभी किसी तरह के पोजीशन पावर  का प्रयोग

नहीं किया था परन्तु उन्होंने गुल्ली के लिए

पहली बार अपने पोजीशन पावर का प्रयोग किया । वहां के सीएमओ के मध्यम से उसे

तुरंत आई सी यू में दाखिल कराया। गुल्ली की

आंखों से कृतज्ञता का भाव छलक रहा था।

उसने उनके आगे अपने दोनों हाथ जोड़ दिए।

   करीब दो महीने तक गुल्ली आई सी यू में रहा

फिर एक दिन भोर में इस दुनिया से विदा हो गया। डाॅक्टर की रिपोर्ट के अनुसार वह किसी

घातक केमिकल के कारण कैंसर ग्रस्त हुआ था। अगर सही समय पर उसको सही इलाज

मिल जाता तो शायद वह बचाया जा सकता था। मैडम सरिता को यह पछतावा हो रहा था कि ,”काश ! गुल्ली उनको पहले ही मिल जाता तो आज गुल्ली ऐसे तो नहीं जाता।” गुल्ली को

अंत समय में ही सही , उसके सुकून भरे मौत

के लिए उसके मां बाप मैडम सरिता का हमेशा

आभार व्यक्त करते हैं।

डॉ सरला सिंह स्निग्धा दिल्ली

कविता और कहानी