ग्रहण

ग्रहण

होती है सिर्फ़

एक खगोलीय घटना

ये सूर्य ग्रहण

या फिर चंद्र ग्रहण

किंतु हो सकते हैं

कई दुष्प्रभाव भी इनके

करते करते परिक्रमा

आता जब चंद्रमा बीच में

धरती और सूर्य के

तो ढाँप कर सूर्य को

कर देता उसे तेजहीन

रुक सा जाता है

कुछ समय के लिए

मानो जीवन ही

कहलाता है *सूर्य ग्रहण*

यूँ ही जब

घूमते घामते

आ जाती है पृथ्वी

सूर्य और चंद्रमा के बीच

पड़ती है छाया उसकी

चंद्रमा पर

और कहलाता है ये

*चंद्र ग्रहण*

कर देता है जो

चंद्रमा को काला

या श्रीहीन सा

मनुष्य भी

कुछ अजीब ही है

आते हैं कभी कभी

जीवन में इसके भी

कुछ लोग ऐसे

साबित होते हैं जो

उसके लिए

किसी *ग्रहण* सम ही

चूँकि अपनी बातों

या पैने व्यंग्य बाणों से

किसी भावुक हृदय को

छेदकर कर देते है

इस दर्ज़ा उसे

छलनी और अवसादग्रस्त

कि टूट बिखरकर

वह इंसान

हो जाता है उतारू

आत्महत्या तक

करने को भी

होता नहीं

इतना भी धैर्य उसमें

कि सोचे करने का

सामना डटकर

उस इंसान या

परिस्थितियों का

पा सके मुक्ति जिससे

जीवन मे लगे *ग्रहण* से

और एक बार फिर से

खड़ा हो निखर उठे

एक नए उत्साह की

रौशनी से

*नीलोफ़र*

कविता और कहानी