चलो आज कुछ कह लेती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूं

मैं भी अपने अंतर्मन से

कुछ बातें चुन लेती हूँ

चलो आज कुछ कह लेती हूं।

मैं वही हूं जिस मिट्टी ने

नूतन आकार लिया है

मैं वही हूं जिसके अपनों ने

सहर्ष स्वीकार किया है

मैं अपने अंतस की गर्मी को

आज हवा देती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूं।

तोड़ने आए थे एक रोज मुझे

जिन्हें दोस्त मैं कहती थी

आगे बढ़ गई हूं आज मैं

उन्हें छोड़ देती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूँ।

एक साथी मिला था सरे राह मुझे

जिसे हमराही अपना बना लिया

उम्मीदों का एक घड़ा अब

रोज ही भर लेती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूं।

एक वह है जिसने जन्म दिया

एक वह है जिसने समझ लिया

दोनों के एहसान तले

मैं खुद को रख लेती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूं।

मौन रहूं मैं जब कभी

अर्थ नहीं मैं निशब्द हूं

ताने-बाने जीवन के मैं

चुप रहकर भी बुन लेती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूं।

समझ नहीं सकोगे तुम

उतने किस्से हैं जीवन के

कुछ तोड़े कुछ जोड़े

ना जाने कितने हिस्सों से

जो हुआ अच्छा हुआ

इसे सोच रह लेती हूं

चलो आज कुछ कह लेती हूं।

— जयति जैन “नूतन” —

कविता और कहानी