जिन्दगी की शाम

जिन्दगी की शाम

चलो आसमाँ पे दास्ताँ लिखते है

तुम हमे देखो, हम तुम्हें देखते हैं

सितारे जो खलल बीच में डाले ।

इशारो इशारो में  चलो गुफ्तगु करते है

हमने बांधी द्वार पर चमकीली तोरण

सजायी इस तरह महफिल जैसे दुल्हन

मुस्कान चेहर पे खिला कर अपने

इक मुलाकात का इन्तेजाम करते हैं।

एक कतरा ही लिया खुशी का हमने

सागर बहता रहा नजरों में सभी

काश भर लेते दामन में मोती सभी

इस तरह भी चलो जिन्दगी की शाम करते हैं

डॉ अलका अरोडा

प्रो० देहरादून

कविता और कहानी