ठंडा प्रतिशोध  (कहानी)

ठंडा प्रतिशोध (कहानी)

–डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

मुसहर टोला में अपना बसेरा बनाने से पहले धनीराम मिसिर को हालात ने गिरगिट की तरह रंग बदलना सिखा दिया था। बम्हरौली गांव के काइएं ब्राह्मणों को चकमा देकर वे सपरिवार जान बचाकर भाग तो निकले थे; पर, पूरी तरह ठन-ठन गोपाल थे। कुर्ते की ज़ेब में और बटुए में एक दमड़ी भी न थी। उस समय तो उन्हें जान बचाने की अफ़रातफ़री में कुछ सूझ ही नहीं रहा था। पाखंडी गांववालों ने उन्हें सपरिवार जिंदा जलाने के लिए उनके घर को घेरकर आग के हवाले कर दिया था। उन्होंने भागते हुए पीछे मुड़कर देखा तो वे भय से काठ बन गए थे; आग की लपटों के बीच उनका घर दिखाई ही नहीं दे रहा था। मतलब साफ़ था कि अगर वे अपने परिवार के साथ अलहदी बन, घर में ही बैठे होते तो सभी जल-भुनकर राख में तबदील हो गए होते; रामघाट जाने का तो सवाल ही नहीं उठता।

कोई दो घंटे-भर बाद वे हाँफते हुए झिंझरी रेलवे ब्रिज़ पर आ गए। तभी वे पलभर को रुक गए और अपनी लुगाई–मिसराईन के आगे फफक पड़े, “अब हमलोग कहाँ जाएं? कोई ठौर-ठिकाना तो है नहीं। रिश्तेदारों ने भी हमें कुजात मानके हमसे मुंह फेर लिया है।”

जब मिसराईन ने तसल्ली देने के लिए उनके सिर पर हाथ फेरा तो उन्होंने अपना मुंह मिसराईन के कान से सटा दिया, “हमारे पास एकठो जोजना है जिससे हमारी सारी चिंताएं ख़त्म हो जाएंगी। हमलोग इसी झिंझरी पुल से सरजू नदी में कूद कर सपरिवार अपनी इहलीला की इतिश्री कर देते हैं।”

उनके इस हताशापूर्ण निर्णय से मिसराईन तनिक भी विचलित नहीं हुई। उसने झट मिसिरजी के मुंह पर अपना हाथ रख दिया और उनकी हौसला-आफ़जाई करने लगी, “आप ही तो कहते रहे हैं कि इस जिनगी पर केवल ऊपरवाले का हक है, वही इसे छीन सकता है, वही इसे कायम रख सकता है। फिर, आप ईश्वर के रास्ते में क्यों आते हैं? सब कुछ उसी परमात्मा पर छोड़ दीजिए ना!”

मिसराईन लंबा भाषण देती रही। मिसिरजी के पास कहने को एक भी लफ़्ज़ नहीं था। वे बात बदलकर बोले, “अगर बम्हरौली के ब्रह्म राक्षसों को हमारे घर की राख में से हमजनों का जला हाड़-मांस न मिला तो वे सभी हमें भूखे भेड़िए की तरह जोह रहे होंगे। हो-न-हो वे इधर ही आ रहे होंगे।”

उनकी बात सुनकर मिसराईन के होठ भी फड़फड़ाने लगे, “हाँ जी, आप ठीक कह रहे हैं।”

फिर जब उसने पीछे-पीछे आ रहे अपने तीनों बच्चों–बड़कू, छोटकू और छोटकी को देखा तो मिसिर जी ने डपटकर कहा, “तनिक तेज-तेज चलो; नहीं तो बम्हरौली के आदमख़ोर बांभन अभी हमारा पीछा करते हुए आएंगे और हमसभी को ज़िंदा कच्चा चबा जाएंगे।”

उनकी डाँट सुनकर, बच्चों के मन में भय का भूत भाँय-भाँय करने लगा। तब, उन्होंने भागते हुए पुल पार किया। रेलवे लाइन वाले उस पुल पर इतनी पतली पगडंडी बनी थी कि मिसिरजी को अपने छोटे-छोटे बच्चों के ठोकर खाकर, पुल से नीचे नदी में गिर जाने का डर सताए जा रहा था। लेकिन, वे कर भी क्या सकते थे? सिर पर पैर रखकर भागकर ही तो आसन्न ख़तरे को अंगूठा दिखाया जा सकता था।

थोड़ी देर में शाम के ऊपर रात की काली चादर पसरने वाली थी। थी भी वह कृष्णा पक्ष वाली रात। पर, मिसिरजी मन ही मन लखई मुसहर को धन्यवाद देते जा रहे थे। उसे पता नहीं कहाँ से बम्हरौली के बांभनों के षड़्यंत्र की भनक मिल गई थी और उनके घर को आग की खुराक बनाए जाने से पहले वह सीधे मिसिरजी के घर के अंदर भूत की तरह प्रकट हो गया? आख़िर क्यों उसने उनकी और उनके बाल-बच्चों की जान बचाई? चाहता, तो वह भी इनका ज़िंदा दाह-संस्कार देखकर मजे लेता। पर, उसने ऐसा नहीं किया। उसमें सचमुच दया का समंदर उमड़ रहा था। वे सोच-सोच कर गदगद हो रहे थे कि नीच जात में भी भगवान का वास होता है।

लखई मुसहर अहाते से उनके घर में ऐसे दाख़िल हुआ था कि किसी को कानो-कान ख़बर तक न हुई। उसने सामने आते ही उन्हें भय की मनःस्थिति से उबारकर चेताया, “पंडिज्जी! ये समय आपकी रामकहानी सुनने का नहीं है। सारे जिला-जवार को पता है कि तुम्हारी बहिन किसी तेली के साथ भाग गई है जिसके लिए आपको आपके ही टोले में कुजात छांटकर बाल-बच्चों समेत जलाकर मारने की साज़िश खेली जा रही है। पर, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। हम आ गए हैं। हमारे रहते आपका बाल बांका न होगा। हम ऐसा करते हैं कि बाहर जाकर इन पाखंडियों को अपनी बातचीत में उलझाकर उनका ध्यान बंटाते हैं। इधर आप पिछवाड़े से छिपते-छिपाते नौ दो ग्यारह हो जाइए। हाँ, फटाफट कीजिए; नहीं तो आप जानते ही हैं कि अंज़ाम कितना ख़तरनाक होने जा रहा है!”

सो, इंसान के रूप में इस भगवान के रहमोकरम से वे बच निकले। हाँ, बाल-बाल बच गए। दस मिनट का भी हेरफेर हुआ होता तो वे और उनके बीवी-बच्चे इस धरती पर नहीं होते। लखई राम! हम तुमको दिल से शुक्रिया कहते हैं।

जब वे झिंझरी पुल पार करके नीचे उतरे तो देखा कि चारो और उजाड़ रेत का मैदान है। कोई सवा-सौ फीट नीचे सरजू नदी हाहाकार मचाते हुए बह रही है जबकि पच्छिम की तरफ़ रुख करने पर बस, सूखी रेत की नदी बह रही है जिस पर से चल पाना टेढ़ी खीर है क्योंकि जैसे ही वे एक कदम आगे बढ़ाते हैं, उनके पैर रेत में धंसकर उनके भाग निकलने के मंसूबे पर पानी फेर देते हैं।

उन्होंने अपनी लुगाई का कंधा पकड़कर जोर से दबाया और कहा, “अगर हम मलेच्छ कायथ-ठाकुर होते तो आज इस सरजू नदी से मछली पकड़के, भुनके खा लेते और अपनी भूख मिटा लेते। पर, हमजने ऐसे पाखंडी बांभन हैं कि हमारे यहाँ मांस-मछरी का नाम तक लेना पाप माना जाता है। वैसे जीते-जागते इंसान का मांस खाने में हम बांभनों का कोई सानी नहीं है।”

बेहद थककर वे घुटने पकड़ते हुए अचानक कुछ सोचने लगे। तब उन्होंने ऊँची-ऊँची झरबेरियों की झाड़-झंखाड़ के नीचे कुछ समय तक सुस्ताने की बात कही तो सभी मान गए। फिर, वे कोई आठ बजे तक वहीं बैठकर बतकहियाते रहे। कृष्णपक्ष की रात वाले उस बियांबे में किसी को कुछ भी नहीं सूझ रहा था। बस, फुसफुसाकर बातचीत करके और एक-दूसरे को टटोलकर एक-दूसरे की मौज़ूदग़ी का सुकून पा रहे थे।

मिसराईन ने कहा, “आज की रात, रेत फाँककर और दियरे की गंध सुड़ुककर हमें गुजारा करना पड़ेगा…”

मिसराईन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वे आसपास किसी के होने की आहट से डर के मारे चिहुंक गए। बच्चे तो बिलबिला उठे जैसेकि कोई जंगली जानवर उन्हें साबूत निगलने आ रहा हो। छोटकी बड़बड़ा उठी, “हॉय रामजी, कौनो भूत-परेत आ गया है क्या?”

तभी सचमुच एक जोरदार भुतही हंसी सुनकर सभी के बदन का खून सूख-सा गया। पर, पीछे से एक आवाज़ आई, “अरे, मिसिर जी! हम हैं–लखई राम। हम कब से बम्हरौली टोला से इहाँ आके आपजने की राह देख रहे हैं? हम भी तो इधरे भागके आए थे कि आपजने की जान बचाने के बाद आपकी परवरिश का ज़िम्मा भी तो हमें ही लेना पड़ेगा।”

मिसिर जी उसकी मौज़ूदग़ी से खुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे। उन्होंने सारे भेदभाव को एक किनारे रखकर घुप्प अंधेरे में लखई को टटोला और जैसे ही वह पकड़ में आया उसे सीने से चिपका लिया। कहने लगे, “हम सारी उमर इतना पूजा-पाठ और कर्मकांड किए जिसका फल आज जाके मिला है। तुम साच्छात भगवान बनके आए हो और हम पाँच मज़बूर जनों की ज़िंदगी बचाई। हमारा तो मन कह रहा है कि हम तुम्हारे पाँव छू लें…”

उनके आलिंगन से अलग होते हुए लखई राम बोल पड़ा, “हमें नरक में क्यों ढकेल रहे हो, पंडिज्जी! हम ठहरे मलेच्छ मुसहर जात के। ऐसे में पवित्र बांभन से पाँव छुआने का पाप हमारे सिर पर क्यों मढ़ रहे हैं? हमें नरक में भी कोई स्थान नहीं मिलेगा।”

“लखई भाई! स्वर्ग-नरक कुछ भी नहीं होता। इस धरती पर जो लोग चिंतामुक्त होकर बिन-मांगे सारी सुख-सुविधा भोगते हैं, वे ही असल में स्वर्ग-सुख भोग रहे हैं। इसके अलावा, नारकीय जीवन का एक मिसाल तो तुम्हारे सामने ही है। मतलब, हम पाँच जने नरक भोग रहे हैं। लेकिन, ये नरक अपनी कुकर्मी बहिन मधुरिया के पापों के कारण भुगत रहे हैं। पहले पता होता तो बुजरी का गला घोंटकर, दबाकर उसकी इहलीला समाप्त कर देते। साथ में, उसके प्रेमी रमई तेली के पीछे जहरीला पोसुवा नाग छोड़ देते।” मिसिर जी बदले की भावना से पागल हुए जा रहे थे।

पर, लखई राम ने उनकी बाँह सहलाते हुए उन्हें तसल्ली दी, “पंडिज्जी, गुस्सा थूक दीजिए। बदले की आग में कब तलक जलते रहेंगे?”

“जब तक कि अपनी बहिन और उसके आशिक की लाश नहीं देख लेते, हमें चैन नहीं पड़ेगा।” वे बुरी तरह ताव खाने लगे।

“लेकिन, जब आप अपनी बहिन का मरा मुंह देखेंगे तो आपकी ममता जाग उठेगी और आप उसके लिए तड़प उठेंगे।”

“ऐसा हरगिज़ नहीं होगा। बस, एक बार दोनों हमारे सामने आ तो जाएं। देखना, उनका क्या हाल करते हैं?”

तब, लखई उनके एकदम पास आकर फ़ुसफ़ुसा कर बोला, “हम एक राज की बात बताते हैं।”

“क्या?”

“तुम्हारी बहिन अब मलेच्छ रमई के साथ नहीं रह रही है।”

“क्या बात करते हो, लखई?”

“हम सोलह आने सच कहते हैं। हम तेलिया टोला जाके कई बार उसके घर से हो आए हैं।”

“अच्छा?”

“असल में, रमई तेली का तो बचपन में ही ब्याह हो गया था। बस, उसकी लुगाई का गौना नहीं हुआ था, जो अब हो गया है।”

“अरे रामजी! इतना गड़बड़झाला?”

“हाँ, बात ये है कि अब रमई अपनी लुगाई के गौना के बाद तुम्हारी बहिन के साथ न रहके, अपनी लुगाई के साथ रह रहा है।”

“लेकिन, हमारी बहिन मधुरिया ख़ैरियत से तो है, ना?” उनका गला भर आया।

“अरे, हम आपको बताए ना कि उसका कहीं अता-पता नहीं है। हरामज़ादे रमई ने या तो उसे मरवा दिया है, या शहर के किसी कोठे पर बेच आया है। रमई तो दिनभर दुकान में कोल्हू का तेल बेचता है और रात को घर की कोठरी में घुसा रहता है–अपनी लुगाई संग। हम सच बताते हैं, आपकी बहिन का कुछ बुरा हो गया है।”

“अरे राम रे राम! ये क्या हो गया? हमारी भोली-भाली बहिन कहाँ और किस हालत में होगी?” वे घों-घों करके रोने लगे।

माहौल को ग़म का पाला मार गया। मिसिर जी की दशा तो अत्यंत दयनीय हो गई। वे अपनी बहिन की याद में भल्ल-भल्ल आँसू बहाते हुए हिचकियाँ ले रहे थे। मिसिराईन भी मधुरिया के ख़्यालों में डूबकर सिसकने लगी। ऐसे में तीनों बच्चे भी ख़ुद ही बूआ-बूआ कहते हुए बिलखने लगे। तब कुछ मिनट के बाद लखई ने ही ख़ामोशी तोड़ी।

“मिसिर जी, चूंकि हमारा आपके प्रति बड़ा श्रद्धा-प्रेम रहा है, इसलिए हम सहर जाके सारे रंडीखानों में भी बबुनी को ढुंढवा चुके हैं। लेकिन, वो तो ऐसे ग़ायब है जैसेकि गधे के सिर से सींग।”

उसके उवाच पर मिसिरजी के चेहरे का भाव बदलने लगा जो उगते चंद्रमा की रोशनी में साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने झट गमछे से अपने आँसू पोंछे और खख़ारकर गला साफ किया; फिर, कृष्णपक्ष के अंधियारे में पूरब से कछुए की तरह गरदन निकालकर, झाँक रहे चाँद का बेडौल मुंह देखकर बड़े ही रूखे स्वर में बोल पड़े, “लखई भाई! हमारा एक ठो काम करोगे?”

“काहे नहीं, पंडिज्जी! आपके लिए तो हमारा जान हाज़िर है।” बेशक, उसकी खुद्दारी में कहीं भी खटास का जायका नहीं आ रहा था।

“अब हमें रमई तेली की बलि चाहिए।” उन्होंने गुस्से में अपना सीना अकड़ाकर सीधा किया।

“ई कौन बड़ी बात है? हमारे पास खूंख़ार मुसहरों की सेना है जो कच्छा-बनियान वाले गिरोह के कर्मठ कार्यकर्ता भी हैं। उनके जरिए रमइया को पलक झपकते ही तेलिया टोले से उठवा लेंगे।”

“ठीक है।” मिसिरजी के चेहरे पर प्रतिशोध का भाव साफ झलक रहा था।

“लेकिन, पंडिज्जी! हमें तो इस निचाट में अभी ये चिंता खाए जा रही है कि इस अंधियारे में आप इन नन्हे-नन्हे बच्चों के साथ रात कैसे और कहाँ गुजारेंगे?”

“रामजी कोई-न-कोई बदोबस्त करेंगे ही। अब तो हम उन्हीं के आसरे हैं।” उन्होंने उर्ध्वमुख होकर कहा।

“तो समझ लीजिए कि रामजी ने आपकी प्रार्थना सुन ली है।”

“क्या सचमुच?”

“क्या आप हमारे मलेच्छ टोले में रहना चाहेंगे? हम मुसहरों के साथ सारी जिनगी गुजर-बसर करना चाहेंगे?”

“काहे नहीं, लखई भाई? मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव करना हमने त्याग दिया है। अब हमारे आश्रयदाता तुम ही हो। तुम जहाँ चाहो, हमें ले चलो। हम तुम्हारे टोले में रहकर, तुम सबका सारी उमर भला करते रहेंगे। लेकिन कल सूरज ढलने से पहले रमइया का धड़ उसके सिर से अलग करने के बाद ही, हम अन्न-जल ग्रहण करेंगे। हम बांभन हैं और हमारी प्रतिज्ञा कभी बिरथा नहीं जाएगी।”

“तो चलिए, मुसहर टोला। वहाँ, हम आपके गुजारे का सारा बंदोबस्त कर देंगे–बस, अपने आशीर्वाद से हम मुसहरों की जिनगी सुधार दीजिए…”

“लेकिन, तुम्हारे टोले में पहुंचते ही हमें एक गड़ांसा चाहिए और साथ में रमइया की गरदन।”

“आप तनिक भी चिंता मत कीजिए। हम दोनों का बंदोबस्त कर देंगे।”

गले दिन, इधर पौ फटा, उधर मुसहर टोले के मुसटंडे लौंडे रमई तेली को बकरे की तरह घसीटते हुए चंडिका देवी के मंदिर के नीचे रखे उस पत्थर पर लाकर पटक दिया जिस पर मुसहर आए दिन सुअरों की बलि चढ़ाकर उसका मांस प्रसाद-स्वरूप अपनी-अपनी झोपड़ियों में ले जाया करते थे।

रमई का सिर जैसे ही उस पत्थर से टकराया, वह बिलबिलकर घिघिया उठा और मिसिरजी के हाथ में गड़ांसा देखकर पल भर को काठ बन गया; फिर, लहू-लुहान सिर को सहलाते हुए बोल पड़ा, “हम तो आपके बहनोई हैं और दमाद-बहनोई बांभन-सरीखा होता है। ऐसे में अगर आपने हमारी बलि चढ़ाई तो आपको ब्रह्म-हत्या के बराबर पाप लगेगा…”

अभी वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि मुसहर लौंडों ने उसके उठने से पहले उसे फिर से उसी पत्थर पर पटक दिया।

मिसिर जी ठठाकर भद्दी हंसी हंसते हुए गरज उठे और माँ-बहिन की गाली देते हुए बोले, “कमीने, अब चाहे ब्रह्म हत्या का पाप लगे या देव हत्या का। तुझे तो मारकर ही हमारी छाती  को ठंडक मिलेगी। अरे, तुझे मारकर ही तो हमें भारी पुण्य मिलेगा। तूं तो आस्तीन का साँप है। अब तेरी जान बख़्शेंगे तो तूं मुझे ही डस लेगा।”

तब वह मुसहर लौंडों से ख़ुद को छुड़ाते हुए उनके पैरों पर साष्टांग गिर पड़ा। “नाही-नाही, पंडिज्जी! हमें माफ़ी दे दीजिए। हमसे भारी गलती हो गई है।”

वह उठा तो लौंडों ने उसे चारो तरफ़ से जकड़ लिया और ज़बरन पत्थर पर बैठा दिया। उसकी आँखों में मौत का ख़ौफ़ साफ़ झलक रहा था।

मिसिर जी बोले, “सपोले, तूं ये बता कि जब तूं पहले से शादीशुदा था तो हमारी बहिन के साथ ये प्रेम-लीला, रास-लीला क्यों खेला था?”

“पंडिज्जी, ई बात तो हमें भी नहीं मालूम था कि बाऊजी ने हमारे जन्मते ही हमारा ब्याह अपने एक दोस्त की उस बेटी से कर दिया था जो अभी दुनिया में आई ही नहीं थी। हाँ, इस बारे में हमें भी तब पता चला जबकि हम आपकी बहिन को भगाकर अपने घर ले गए।”

“पर, तूं तो इश्क़ में अंधा हो गया था। फिर, हमारी बहिन को भगाने के बाद उसे मौत के घाट क्यों उतार दिया? आख़िर, उस भोली-भाली लड़की का कुसूर क्या था?”

“कौन कहता है कि हमने जिसके साथ संग मरने-जीने की कसम खाई, उसे हमने मार दिया है? ऐसा हम सपने में भी नहीं सोच सकते हैं। हम तो उसे रानी बनाके रखने वाले थे जो विधाता को मंज़ूर नहीं हुआ…”

“तूं ख़ूब कहानी गढ़ ले। पर, हम जानते हैं कि तूं तेली है। जैसे तेल में मिलावट करके उसके शुद्ध होने की तूं कसम खाता है और उसे ऊंचे दाम पर बेंच देता है, उसी तरह तूं यह झूठ भी गढ़ रहा है और उस पर सच का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश कर रहा है। कहानी गढ़ने में तूं शातिर है। मधुरिया भी तेरी तारीफ़ में तेरी झूठी कहानी गढ़ने के फ़न का ज़िक्र किया करती थी।”

“मिसिरजी, हम एकदम झूठ नहीं बोल रहे हैं। असल में मधुरिया हमारे सोते में ही चुपचाप कहीं भाग गई। उसकी लड़ाई तो उसकी सौत से हुई थी, हमसे नहीं। उसे बहुत ढूंढा; पर, नहीं मिली। हाय रे माधुरी! तूं कहाँ बिलाय गई? हम तो तुमसे वादा किए थे कि बाबूजी का घर छोड़के शहर में बस जाएंगे और वही कोई धंधे का जुगाड़ करके साथ जीएंगे, साथ मरेंगे। आख़िर, हमारा ग़ुनाह क्या था? तुम्हारी सौत का ज़बरन गौना तो बाबूजी ने किया था। पर, हमने तो बाऊजी से ऐलॉन कर रखा था कि हम ज़िंदगी बसर करेंगे तो सिर्फ़ माधुरी के साथ…”

लेकिन, इसके पहले कि वह आगे बोलता, लखई बीच में ही चिल्ला उठा, “मिसिर जी! हम राम-कसम कहते हैं कि इसी पापी ने तुम्हारी बहिन का कत्ल करके अपने रास्ते से हटाया है। आप देखिएगा, हम बबुनी की लाश भी आज शाम तक खोज निकालेंगे।”

लौंडों की भीड़ भी हुंकार कर उठी, “पंडिज्जी! इस बज्ज़ात को मार डालो…इसकी गरदन को धड़ से अलग कर दो…ये बड़ा मक्कार है…”

मिसिर जी ने आक्रोश में गड़ांसा तान लिया और जैसे ही वे उस पर वार करने वाले थे कि दूर से उन्हें मधुरिया की पास आती हुई आवाज़ सुनाई दी, “भइया, हमारे रमई की ज़िंदगी बख्श दो। देखो, हम आ गए हैं। अब हमारे मन में इसके लिए सारा मलाल ख़त्म हो गया है। हमें इसकी बीबी की नौकरानी बनकर भी इसके साथ रहना मंज़ूर है। अगर आपने इसे मारा तो यह पक्का मान लीजिए कि हम भी इसके साथ इसकी चिता में जल-मरेंगे।”

मिसिर जी ने जब अपना सिर उठाया तो सामने अपनी बहिन को देखकर हक्का-बक्का रह गए। गड़ांसे को नीचे गिरा दिया और फ़फ़क उठे, “हमसे एक बहुत बड़ा पाप होने से रह गया…”

लखई समेत वहाँ खड़ी मुसहरों की भीड़ बुत बनकर ये सब देखकर ताज़्ज़ुब में डूब रही थी। तभी रमई अपने चुटहिल सिर को सहलाते हुए उठा और मधुरिया का सहारा लेकर, लंगड़ाते हुए जाने लगा। वह उसकी हथेलियों अपना सिर छुपाकर भुनभुना उठा, “कहाँ चली गई थी, मेरी रानी?”

जब मुसहर लौंडे रमई को जाते हुए पकड़ने को झपटे तो मिसिर जी बोल पड़े, “जाने दो, दोनों को। हमारे लिए तो ये मर ही चुके हैं। पर, इनके मरने के साथ-साथ हमारा तो सब कुछ मटियामेट हो चुका है।”

कविता और कहानी