डेढ़ माह का जीवन

कुश्लेन्द्र श्रीवास्तव (वारिष्ट पत्रकार एवं साहित्यकार), गाडरवारा, मध्य प्रदेश

अस्पताल के जनरल वार्ड में आई तब उसकी नजर वार्ड के नए पेशेन्ट पर पड़ी थी। बेड नम्बर 8 पर एक दस साल का बालक आँख बंद किए लेटा था पास में ही एक कम उम्र की महिला बैठी थी जिसके चेहरे पर उदासी थी। उसने अनुमान लगाया कि वह उस बालक की माँ होगी। उसने अपनी दिनचर्या के हिसाब से एक-एक बेड के मरीज से मिलने का काम शुरू कर दिया था। वह रोज ही ऐसा करती थी। वह मरीज के पास जाकर उनका चार्ट देखती फिर पता करती कि उसने चार्ट के हिसाब से दवा आदि ली हैं की नहीं। वह उन्हें दिलासा देती। उसकी वाणी में मधुरता होती थी इस कारण सारे पेशेन्ट उसका सम्मान भी बहुत करते थे। सिस्टर मारिया की पूरी जवानी इसी अस्पताल में मरीजों के साथ बीत गई थी। अब तो खैर उसके काले बालों ने सफेदी ओढ़ना शुरू कर दी थी। उसके चेहरे पर तेज था और बात में माधुर्यता। वह जब बेड नं. 8 पर पहुंची तब भी नन्हा सा पेशेन्ट आँख बंद किये सो रहा था। उसने प्रश्नवाचक निगाहों से पास में बैठी महिला को देखा फिर उत्सुकता के साथ चार्ट उठाकर पढ़ने लगी। उम्र 10 साल नाम हर्षित बीमारी …… वह चैंक गई भला इतनी कम उम्र में यह बीमारी इसे कैसे हो सकती है उसने एक बार फिर चार्ट को ध्यान से पढ़ा बीमारी का नाम तो यही लिखा है। उसकी निगाहें बरबस पेशेन्ट की ओर उठ गई गोल मटोल चेहरा रंग एक दम साफ झकाझक आँखों में अजीब सा सम्मोहन होंठों पर खामोशी के बावजूद मीठी मुस्कान उसका मन हुआ कि उसका माथा चूम लें।

”अरे!….. आंटी….. ऐसे क्यों देख रही हैं मुझे…..“ जाने कब हर्षित ने आँखें खोल ली थी। उसके चेहरे पर मुस्कान दिख रही थी। एकाएक किए गए ऐसे प्रश्न से वह घबरा गई उसने अपनी निगाहें दूसरी ओर घुमा लीं।

”आंटी….. आप….. सिस्टर हैं… यहाँ… मुझे दवाई बगैरह देगी और इंजेक्शन लगायेंगी… है… न…. आंटी मुझे इंजेक्शन से डर लगता है….“ हर्षित ने अपनी आँखें बंद कर ली मानो उसे अभी इंजेक्शन लगाया जा रहा हो।

”नहीं… बेटा… मैं इंजेक्शन… थोड़ी न लगा रही हूँ… मैं तो… बस देखने आई हूँ…“ मारिया की आवाज़ में मधुरता ज्यादा बढ़ गई थी। हर्षित ने लेटे-लेटे ही अपनी आँखें खोल कर उसकी ओर दया भाव से देखा।

”आप….. बहुत अच्छी आंटी हैं…..“।

दिन भर उसके कानों में हर्षित की आवाज गूंजती रही थी ”आप बहुत अच्छी आंटी है।“

राउंड पर डॉक्टर आये थे तब उन्होंने ही बताया था कि हर्षित बस महीने डेढ़ महीने का ही मेहमान है। उसे जो बीमारी है उसका कोई इलाज नहीं है दवा तो केवल उसका दर्द कम करने के लिए दी जा रही है। हर्षित के माता-पिता को यह बात बताई जा चुकी है। उसके सामने हर्षित की माँ का उदास चेहरा झूल गया था। उसके मन में हर्षित के लिए प्यार उमड़ आया था। उसके कोई संतान नहीं थी इसलिए उसका मातृत्व हर्षित पर बरसने बेताब था। वह दिन में कई-कई बार हर्षित के पास जाती और उससे बातें करती रहती। हर्षित उस के सामने खुल चुका था। दूसरे दिन से ही हर्षित का बालपन सारे वार्ड में धमाचैकड़ी मचाने लगा था। वह अपने बेड से उठकर किसी भी मरीज के पास चला जाता और उससे बातें करने लगता

”आपको क्या बीमारी है अंकल…?“

”कुछ नहीं….. बेटा… बुखार आ गया था… बस“

”आप… जल्दी… ठीक… हो जायेंगे… आपको कुछ चाहिए तो मुझे बताना।“

वार्ड के नम्बर 1 पर एक पेशेन्ट पिछले कुछ महीनों से कोमा की हालत में भर्ती थे। हर्षित उनके पास भी जाता।

”आंटी… ये दिन भर सोये हुए क्यों रहते हैं…“ वह साथ में बैठी बूढ़ी महिला से सवाल करता। अपनी आँखों की नमी पोंछकर वह इतना ही बोल पाई थी –

”इन्हें सोने की बीमारी है न बेटा… इसलिए“

”मैं जगा दूँ… उनसे… ढेर सारी बातें करूँगा…।“ हर्षित ने प्यार से उनके माथे पर हाथ रखा था।

डॉक्टर ने कह दिया था कि चूंकि हर्षित अब ज्यादा दिन नहीं जी पायेगा इसलिए उसे जो करना है करने दिया जाए। इस कारण पूरे वार्ड में उसे घूमने दिया जाता था। वार्ड में वह हर एक से मिलता और अपनी बालसुलभ क्रियाओं से उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता। वार्ड के सारे लोग उससे प्यार करने लगे थे। आँख खुलते ही मरीज से लेकर उनके साथ वाले तक हर्षित को खोजते नज़र आते ”मैं यहाँ छिपा हूँ दीदी…“

वह पलंग पर लेटे-लेटे चादर से अपने आपको ढक लेता।

”अरे! भाई हर्षित… कहाँ छिप गये… हमें तो दिखाई ही नहीं दे रहे हो…“ उसका मन बहलाने के लिए उसके साथ लुक्काछिपी का खेल खेलते।

वार्ड के ज्यादातर लोग हर्षित की बीमारी के बारे में जान गए थे इसलिए उनके मन में हर्षित के प्रति दया के भाव जाग चुके थे। वे हर्षित को बेहद प्यार करते और मन ही मन उसकी लम्बी आयु की प्रार्थना करते और प्रयास करते कि हमेशा प्रसन्न रहें।

”अंकल… आपकी… खिचड़ी आ गई क्या… मुझे भी खाना है…“

वह दो चम्मच खाकर रख देता।

”देखो हर्षित… हम तुम्हारे लिए क्या लाए।“

मरीज के रिश्तेदार बाजार जाते तो उसके लिए कुछ न कुछ लेकर ही आते।

हर्षित दौड़कर वहाँ पहुँच जाता।

”ये देखो… चश्मा।“

”पर अंकल… माँ कहती है, मेरी आँखें बहुत सुन्दर है… चश्मा लगाऊँगा तो… आँखें ढक नहीं… जायेंगी… फिर मेरी माँ मेरी सुन्दर आँखों को कैसे देखेगी…“

कमर पर हाथ रखकर जब खेलता तो एक सम्मोहन सा छा जाता।

”चलिए… आप… लाए हैं तो… थोड़ी देर के लिए पहन ही लेता हूँ“ उसने चश्मा पहन लिया। वह बहुत सुन्दर लग रहा था।

हर्षित दिन में कम से कम दो बार बेड नम्बर 1 पर जरूर जाता और गहरी नींद सो रहे अंकल के माथे पर हाथ रखता।

”आंटी… देखना… मेरे हाथों का स्पर्श पाकर अंकल… को अपनी नींद से जागना ही पड़ेगा… मैं अपनी माँ को भी ऐसे ही तो नींद से जगाता हूँ… वे तो हाथ रखते ही जाग जाती है और मुझे गोद में भर लेती है… अंकल भी जागेंगे और मुझे गोद में उठा लेंगे…“।

दिन में एकाध बार वह स्टॉफ रूम भी पहुँच जाता। रंगबिरंगी दवाओं को देखकर कहता ”ये मीठी हैं क्या?“ कानों से स्टेथोस्कोप लगाकर वह डॉक्टर साब के दिलों की धड़कनों को पढ़ने का प्रहसन करता।

”अरे… आपका… दिल तो बहुत तेज धड़क रहा है… आपको दवाई देनी पड़ेगी…“ वह कागज पर कुछ लिखता और नर्स को दे देता।

”आंटी… अंकल को ये दवाई दे दो… पर इंजेक्शन नहीं लगाना… उन्हें डर लगता है न।“

स्टॉफ रूम का एक-एक सदस्य मुस्कुरा पड़ता। हर्षित सभी के साथ खेलता और ढेर सारे प्रश्न करता ”अरे… भाई मुझे परेशान नहीं करो…“

”मैं परेशान नहीं कर रहा हूँ… सिस्टर… मुझे बताओ न“

सिस्टर उसे गोद में लेकर उसके हर प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करती।

हर्षित के पिताजी दिन में कम रहते थे। ऑफिस जाने के पहले वे हर्षित से मिलने आते और शाम को ऑफिस से लौटकर फिर वे देर रात तक उसके साथ रहते। पर माँ लगभग हमेशा हर्षित के साथ रहती केवल खाना खाने घर जाती बस। हर्षित को देखते ही उनकी आँखें बरसने लगती। हर्षित उनकी इकलौती संतान था। हर्षित का जन्म गम्भीर ऑपरेशन के बाद हुआ था। डॉक्टर ने बोला था कि यदि हर्षित का जन्म होता है तो वे फिर कभी माँ नहीं बन पायेंगी वे चाहें तो एबार्शन करा लें…। पर माता-पिता दोनों ने निर्णय कर लिया था कि एक संतान ही हो जाए तो फिर उन्हें दूसरी संतान की जरूरत नहीं है। हर्षित का जन्म हो गया और उसकी माँ की बच्चेदानी निकाल दी गई। इकलौती संतान को माँ-बाप ने क्षमता से अधिक प्यार दिया। बच्चे की आँखों से एक बूँद आँसू तक नहीं बहने दिया। पाँच साल का हुआ तो शहर के सबसे बड़े स्कूल में उसका नाम लिखा दिया गया। माँ स्वयं उसे छोड़ने जाती और स्कूल की छुट्टी होने के पहले उसे लेने पहुँच जाती। वे उसे गोद में उठाती और प्यार करती। हर साल उसके जन्म दिन पर ढेर सारे खिलौने लाये जाते और बड़ा सा केक काटा जाता। हर्षित पढ़ने में होशियार था। स्कूल का सारा स्टॉफ उससे प्यार करता उसके साथ वाले बच्चे भी उससे स्नेह करते। वह शुरू से ही चंचल था। उसकी चंचलता मासूमियत लिए होती थी। इस कारण सभी के मन भाती थी। वह खेलकूद की गतिविधियों में भी भाग लेता उसे बैडमिंटन खेलना भाता था। अंग्रेजी की पोयम उसे याद थी जब भी कोई कहता तो वह धाराप्रवाह सुनाने लगता था।

हर्षित को जन्म के बाद से कभी कोई बीमारी नहीं हुई थी। वह एकदम स्वस्थ और प्रसन्न रहता था। एक दिन उसे स्कूल में ही चक्कर आ गए थे। वह कुर्सी पर बैठे-बैठे बेहोश हो गया था। माँ-पिता जब तक स्कूल पहुँचते स्कूल वाले उसे हॉस्पीटल ले जा चुके थे। इलाज के बाद उसे आराम जरूर लगा पर माता-पिता के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई। वे उसे लेकर देश के सबसे बड़े अस्पताल पहुंच गए थे। करीब एक सप्ताह तक उसकी गहन जाँच होती रही थी। कई किस्म की जाँचे कराई गई और अंत में जब उन्हें बीमारी का नाम बताया गया तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। डॉक्टर खुद हैरान थे ऐसी बीमारी तो ज्यादातर बड़ी उम्र में होती है इसे कैसे हो गई। उन्होंने विदेशों में डाॅक्टरों से सलाह मशविरा किया था। यह वह बीमारी थी जिसका कोई इलाज नहीं था।

माता-पिता हाथ जोड़े खड़े थे।  

”नहीं… डॉक्टर साब आपको मेरे बच्चे को कैसे भी बचाना ही पड़ेगा…“

डॉक्टर साब स्वयं ही हताश और निराश थे। वे मौन ही हे। हर्षित के माता-पिता की आँखों से आँसू गिर रहे थे। उस अस्पताल में कुछ दिनों तक इलाज चला भी। डाॅक्टरों ने हर सम्भव प्रयास किया कि वे बीमारी को कम से कम बढ़ने से तो बचा सकें। पर उनके हर प्रयास विफल हो रहे थे। उन्होंने हताश होकर उसे ले जाने को कह दिया था।

”हर्षित का जीवन ज्यादा नहीं है… महीने-डेढ़ महीने में कोई घटना हो सकती है, आप इसे ले जायें और इसे प्रसन्न रखने का प्रयास करें।“

हर्षित को घर तो ले आए थे पर मन नहीं माना था इसलिए उसे इस अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था। वे हर रोज कैलेण्डर देखते और हर्षित के कम हो रहे दिनों से विचलित होते रहते।

हर्षित की कम होती ज़िन्दगी से अस्पताल का वॉर्ड ही नहीं पूरा अस्पताल चिंतित था। डॉक्टर दिन में कई बार आते और उसकी नब्ज़ टटोलते। उन्हें अब भी किसी चमत्कार की उम्मीद थे। माता-पिता से लेकर जान पहचान वाले तक भगवान के सामने खड़े होकर हर्षित के लिए प्रार्थना करते। मारिया की आँखों की नींद उड़ चुकी थी। उसका मातृत्व जोर मारने लगा था।

”हे जीसस… मैं आपके सामने खड़ी हूँ। आप मेरा… जीवन ले ले… पर इस बच्चे को… नया जीवन दे दें…“ उसकी आँखों से आँसू बहते रहते।

सुबह के राउण्ड पर डॉक्टर निकले थे… हर्षित की नब्ज़ हाथ में लिए थे… नब्ज़ उन्हें बता रही थी कि हर्षित का जीवन हर पल कम होता जा रहा है वे नर्स को कुछ हिदायत दे रहे थे… उनके माथे पर चिंता की लकीरें थी।

”डॉक्टर अंकल… मैं… मर… जाऊँगा… क्या…“

हर्षित की आवाज ने चारों ओर निःशतब्धता फैला दी थी। मारिया की आँखों से आँसू झलक गए थे। डॉक्टर ने भी अपनी निगाहें घुमा ली थीं।

”मैं… मर… कर कहाँ जाऊँगा… अंकल…“ हर्षित की जिज्ञासा शांत नहीं हो रही थी।

”कहीं… नहीं… जायेगा… मेरा बेटा… मेरे साथ ही रहेगा… अपनी आंटी के साथ…“ मारिया ने उसे गोद में उठा लिया।

हर्षित आवाक सा सभी को देख रहा था। उसके चेहरे पर ऐसे सारे प्रश्न उभर रहे थे। जिनके जवाब किसी के पास नहीं थे।

हर्षित ने बेड नं. 1 के पेशेन्ट के माथे पर हाथ रखा था। इस बार उसने अपने हाथों में सिहरन को महसूस किया था ”आंटी देखो वो जाग रहे हैं…मैंने महसूस किया है“। आंटी ने कोई जवाब नहीं दिया था। निराश हर्षित दूसरे बेड की ओर बढ़ गया था। वार्ड में कई मरीज जा चुके थे। कुछ नये आ गए थे। जो नया आता था उससे सबसे पहले मित्राता हर्षित की ही होती थी।

”क्या हुआ… अंकल…“ वह बड़े प्यार से अपने नन्हें हाथों से मरीज को स्पर्श करता फिर उनके साथ घुल-मिल जाता। धीरे-धीरे नये आने वाले को भी पता चल जाता कि हर्षित किस बीमारी से ग्रसित है और कितने दिनों का मेहमान है। उनके मन में भी उसके प्रति दया के भाव उमड़ पड़ते। कई लोग तो अपने मरीज को छोड़कर हर्षित का ज्यादा ध्यान रखने लगे थे। सारे बेड़ों में जाकर हर एक से हालचाल पूछ लेने के बाद हर्षित अपने बेड पर आकर आँख बंद कर लेट जाता मानो कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।

”मम्मी… मैं स्कूल… कब जाऊँगा… बहुत सारी पढ़ाई हो गई होगी…“

”तुम पहले स्वस्थ हो जाओ… पढ़ाई मैं करा दूंगी…“ मम्मी अब उसकी बात करने की आदत से परेशान होने लगी थी। वह प्रश्न भी इस ढंग से पूछता था कि उनका जवाब देते समय उनकी आँखें बरस पड़ती थी। वे हर्षित के सामने अपने आँसू नहीं बहाना चाहती थी इस कारण वे उसके प्रश्नों को टाल जाती थी। डॉक्टर साब ने बता दिया था कि हर्षित का अंतिम दौर चल रहा है। वे उसे एकटक देखती रहती थी। हर्षित के बिना उनके दिन कैसे कटेंगे सोचना चाहती पर अपना मन भगवान जी की प्रार्थना में बहला लेती ”हे प्रभु कोई चमत्कार कर दो मेरा बेटा ठीक हो जाए“ पर वो जानती थी कि अब ऐसा चमत्कार होगा नहीं। उनकी आँखों के सामने उनकी इकलौती सन्तान पल-पल उनसे दूर होती जा रही थी और वे कुछ नहीं कर पा रही थी। हर्षित के पिताजी बहुत सारे मंदिरों में माथा टेक आए थे ”प्रभु जाने हमसे क्या गलती हो गइ है पर हमारी गलती की सज़ा इस मासूम को मत दो प्रभु।“ मंदिर में विराजी भगवान जी की मूर्ति मंद-मंद मुस्कुराती रहती, ऐसा नहीं कि भगवान जी के दर पर हर्षित के माता-पिता ही प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना के स्वर हर उस व्यक्ति के होंठों से निकल रहे थे जो एक बार भी हर्षित से मिला था। अस्पताल के डॉक्टर से लेकर अन्य स्टॉफ भी भगवान जी को मनाने में लगा था। हर कोई चाह रहा था कि कोई चमत्कार हो जाए और हर्षित मौत के चंगुल से बाहर आ जाए। जैसे-तैसे दिन कटता था माँ और पिता जी के साथ-साथ वार्ड के अन्य लोग भी रात भर जाग कर हर्षित को देखते रहते थे। वह करवट भी बदलता तो सभी सावधान हो जाते।

”माँ मैं भगवान जी के पास… अकेला जाऊँगा… आप नहीं चलेगी मेरे साथ…“ हर्षित आज कुछ ज्यादा शिथिल सा लग रहा था। वह रोज की तरह आज वार्ड में किसी के पास नहीं गया था। सुबह से ही वह सुस्त सा पलंग पर पड़ा था। सुबह की व्यस्त दिनचर्या के कारण किसी ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। पर उसके द्वारा पूछे गए इस प्रश्न ने माँ की आँखों में आँसू ला दिये थे।

”माँ… वहाँ से मैं… ठीक होकर आ जाऊँगा न…“। वो अपने आपको सम्भाल नहीं पाई थी। सुबकने की आवाज़ हर्षित के कानों तक पहुँच गई थी वह ऐसा चाहती नहीं थी। हर्षित सहम गया।

”माँ… आप… रो… क्यों रही हैं… मैं आपको छोड़ कर जा रहा हूँ… इसलिए न… मुझे भी तो आपकी… बहुत याद आयेगी… मैं आपके बगैर… कैसे रह पाऊँगा माँ…“

अब शायद हर्षित की आँखों से भी आँसू गिरे थे।

”माँ भगवान जी के यहाँ मेरा ध्यान कौन रखेगा… मुझे कौन नहलायेगा… मुझे भूख लगेगी तो… मैं… किससे… कहूंगा… बताओ न… माँ“ हर्षित ने माँ की साड़ी का एक छोर ज़ोर से पकड़ लिया था।

”माँ… वो मुझे इंजेक्शन तो… नहीं लगायेंगे… मुझे बहुत डर लगता है… आप उनसे बोल देना कि… मेरे हर्षित को… कभी इंजेक्शन न लगायें… मैं दवा पी लूंगा… माँ… दवा कितनी… कड़वी होती है पर मैं पी लूंगा माँ… आप बोल देना।“ हर्षित की बातों ने उसे छलनी कर दिया था। वह अपने आँसू रोक नहीं पा रही थी। उसने हर्षित को जोर से अपने सीने से चिपका लिया था। आज हर्षित भी रो रहा था दोनों के आँसू एक-दूसरे का तन गीला कर रहे थे।

डॉक्टर ने आकर नब्ज़ देखी थी हर्षित की। उनके चेहरे पर चिन्ता के भाव थे। सिस्टर मारिया भी उनके साथ थी। हर्षित की नाड़ी आज बहुत धीमे-धीमे चल रही थी। उन्होंने हर्षित की आँखों में भी झांका था। उसकी आँखों में आज तेज नहीं था। उन्होंने मारिया को एक इंजेक्शन देने का इशारा किया था। मारिया के हाथों में इंजेक्शन देखकर हर्षित घबरा गया था।

”नहीं… आंटी… मैं… इंजेक्शन… नहीं लगवाऊँगा… आपने वायदा किया था न…“ हर्षित ने अपने आपको चादर में ढक लिया था। इतने दिनों में कभी उसे इंजेक्शन नहीं लगाया गया था। सभी जानते थे कि वो इंजेक्शन से भय खाता है किसी की हिम्मत उसे इंजेक्शन लगाने की नहीं पड़ी थी। हर्षित इतने भोलेपन से बोलता था कि नर्से हिम्मत ही नहीं जुटा पाती थीं। पर आज जब डॉक्टर ने उसकी नब्ज़ को धीमा चलते देखा तो उन्होंने एक अंतिम प्रयास करने का निर्णय ले लिया था। मारिया के हाथों में इसकी जवाबदारी थी।

दिन भर सारे वार्ड में खामोशी बनी रही। मरीजों से लेकर किसी के पेट में दाना तक नहीं गया था। हर आदमी के होंठ बुदबुदा रहे थे ”संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमिरत हनुमत बलवीरा“। इस खामोशी के बीच रह-रह कर सुबकने की आवाज आती रही। हर्षित भी पलंग से नही उठा वह सुस्त सा लेटा रहा। पिताजी सुबह-सुबह ही आए थे पर हर्षित की हालत देखकर चले गए थे। वे हनुमान जी के मंदिर में बैठे रहे दिन भर उन्हें अभी भी उम्मीद थी कि हर्षित अच्छा हो जायेगा। डॉक्टर ने आज कई बार आकर हर्षित को चेक किया था। हर बार उनकी चिन्ता बढ़ती जा रही थी। हर्षित ने शाम को बोला था।

”माँ भूख लगी है… फल… दो… न“। माँ ने सेब फल काटकर दिया था।

”माँ… मैं अभी आता… हूँ“ कहकर वह बेड नं. 1 की ओर बढ़ गया था। उसने अपनी आदत के अनुसार उनके माथे को स्पर्श किया था।

”आंटी… मैं भगवान जी के पास… जा रहा हूँ न… मैं उनसे बोलूँगा… कि दादाजी… को नींद… से जगा दें… और फिर उन्हें ज्यादा… नींद न आये… आप रोयें नहीं…“। हर्षित आज धीमा-धीमा ही बोल रहा था। वह बेड नं. 12 के पास भी गया था। जहाँ एक आंटी बीमारी का इलाज करा रही थी। उनके छोटे-छोटे बच्चे उनसे चिपके रहते थे और वे दर्द से कराहते हुए उनकी देखभाल करती थी।

”आंटी… मैं भगवान जी… के पास… जाने वाला हूँ… मैं आपके लिए भी उनसे कहूँगा…।“

हर्षित अपने पलंग पर आकर लेट गया था। उसे थकान सी महसूस हो रही थी। सिस्टर मारिया वैसे तो आज डयूटी छोड़कर जाना ही नहीं चाहती थी। दिन भर से वह केवल हर्षित के आस-पास ही घूम रही थी पर उसका जाना जरूरी था। वह जाने के पहले हर्षित से मिलने आई थी।

”कैसे है… मेरा… लाडला बेटा..“ उन्होंने उसके माथे पर अपना हाथ रखा था।

हर्षित जोर से उनसे चिपक गया ”आंटी… मैं भगवान जी के पास… नहीं जाना… चाहता… आप… माँ को समझाओ… न.. वो मुझे वहाँ न भेजे।“ मारिया सुबक पड़ी थी। उसका मन हुआ कि वह आज कहीं न जाए केवल हर्षित के पास ही बैठी रहे। पर वह यह भी जानती थी कि यदि वह ऐसे ही बैठी रही तो उसके आँसू उसका कहा मानने से इन्कार कर देंगे वह रो पड़ेगी और फिर… नहीं उसे जाना ही होगा… उसने आज चर्च में विशेष प्रार्थना रखी थी। हर्षित के लिए… वह अंतिम क्षणों तक गाॅड से हर्षित को जीवनदान देने की अपील करना चाहती थी। उसे जाना ही होगा। उसने हर्षित को बड़ी मुश्किल से अपने से अलग किया था। उसने उसके माथे को चूमा… उसके गालों को प्यार किया और रोते हुए वहाँ से चली आई थी।

रात को डॉक्टर एक बार फिर हर्षित को देखने आए थे। आज डॉक्टर का मन भी किसी काम में नहीं लगा था। वे सारा दिन हर्षित के आस-पास ही बने रहे थे। वैसे तो इस पेशे में आने के बाद उनकी आँखों से आँसू और दिल से दर्द खत्म हो चुका था पर वे हर्षित को देखकर अपने दर्द को भी महसूस कर रहे थे और अपनी आँखों को भी नम पा रहे थे। हर्षित की नब्ज़ और धीमी हो गई थी। उसकी आँखों में रोशनी का तेज गायब होता जा रहा था। हर्षित के विरोध के कारण उसे इंजेक्शन नहीं लगाया जा सका था। उन्होंने अंतिम प्रयास के रूप में एक गोली बुलवाई थी। जिसे लेने के लिए उनका मित्रा दूसरे शहर गया था। उन्होंने उसे निर्देश दे दिया था कि किसी भी हालत में दवा रात के दस बजे के पहले आ ही जाए। तेज दौड़ती कार ने इस दूरी को मात दे दी थी। दवा उनके हाथ में थी। उन्होंने अपने हाथों से हर्षित को दवा दी थी।    

”बेटा… ये दवा… खा लो।“

”अंकल… मैं दवा… खा… लूंगा… तो आप… माँ को बोल देंगे कि वो… मुझे भगवान जी … के पास न … भेजें… मैं माँ को… छोड़कर नहीं जाना… चाहता… अंकल… बोलिए… न माँ से।“

डॉक्टर जानते थे कि यदि वे अपने आपको नहीं सम्भाल पाए तो सारे वार्ड में कोहराम मच जाएगा। उन्होंने चुपचाप रूमाल से अपने आँसू पौंछे और दवा हर्षित के मुँह में डाल दी। वे वहीं खड़े दवा की प्रतिक्रिया का इंतजार करते रहे। कुछ देर बाद उन्होंने फिर नब्ज़ देखी इस बार नब्ज़ कुछ तेज़ हुई थी। उनके चेहरे पर संतोष के भाव थे। पर वे जानते थे कि खतरा अभी टला नहीं है। वे उसी वार्ड में स्टॉफ रूम में जाकर बैठ गए थे।

पिताजी ने चरणामृत हर्षित के मुँह में डाला था। एक साधु ने उन्हें दिया था ”यह बहुत चमत्कारी है तुम्हारे बच्चे को ठीक कर देगा।“ उनके पास विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। अपने पिताजी को देखते ही हर्षित उनसे लिपट गया था।

”पिताजी… मुझे… कहीं… नहीं… जाना… मैं आपके साथ… ही रहना चाहता हूँ“ पिताजी ने उसको गोद में उठा लिया था।

”मेरा… बेटा… कहीं… नहीं… जायेगा… हमेशा मेरे साथ ही रहेगा…“ भावावेश में उन्होंने उसके माथे को चूम लिया था। आँसू उनकी आँखों से भी बह रहे थे।

पूरा वार्ड आज जाग रहा था। डॉक्टर साब ने बताया था कि आज की रात बहुत खतरनाक रात है। किसी की आँखों में नींद नहीं थी। डॉक्टर भी आज घर नहीं गए थे। वे शायद आने वाले संकट की आहट सुन चुके थे। स्टाफ रूम में बैठे वे आने वाले समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। पलंग के एक ओर हर्षित के पिताजी बैठे थे और सिराहने उसकी माँ। उनके आँसू आज रूक पाना सम्भव नहीं था। हर्षित को भी नींद नहीं आ रही थी पर उसकी आँखें बन्द थी। रात के लगभग दो बजे उसने अपनी माँ को पुकारा था।

”माँ… देखो… ये… मुझे… लेने… आये हैं माँ… मैं नहीं… जाना चाहता… माँ इन्हें रोको… माँ… पिताजी…“ उसके चेहरे पर डर के भाव परिलक्षित होने लगे थे। माँ ने उसे सीने से लगा लिया था। आवाज सुनकर डॉक्टर दौड़ कर आ गए थे। उन्होंने हर्षित की नब्ज़ को टटोलने का प्रयास किया था। नब्ज़ अब रूक गई थी। वे अपने मरीज को नहीं बचा पाए थे। डॉक्टर उदास कदमों से स्टाफ रूम की ओर बढ़ गए थे। सभी को समझते देर नहीं लगी थी कि हर्षित अब उनके बीच से जा चुका है। वार्ड में कोहराम मच चुका था। इस कोहराम के बीच एक हलचल बेड नं. 1 पर भी हुई थी ”नहीं… तू नहीं… जा सकता…“ बेड नं. 1 का पेशेन्ट अपने बेड से उठकर दौड़ा था हर्षित की ओर।

सुबह जब मारिया आई थी तब तक बैड नं. 8 खाली हो चुका था। वह इस खाली बेड को देखती रही थी बहुत देर तक वह प्रतीक्षा कर रही थी कि हर्षित पलंग से उठकर कहेगा ”आंटी… मुझे भगवान जी के पास नहीं जाना है“ पर वह तो जा चुका था सभी को रोता छोड़कर।

One thought on “डेढ़ माह का जीवन

  1. ओह !
    अंतस में छिप कर रहता
    कैसा निर्मोही है यह प्राण,
    नन्हे कलेवर पर दया न आई
    असमय कर चला निष्प्राण!

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