” दीपोत्सव”

” दीपोत्सव”

रघु मिट्टी के खिलौने और बर्तन बनाने वाला एक कुम्हार था। उसके बनाए सामान की खूब बिक्री होती थी। हर साल दिवाली पर रघु दिए और खिलौने बनाता था। मिट्टी के दियों को जोड़कर अलग अलग दिखने वाले झूमर भी बनाता था। त्यौहार पास आता तो उसके पास बिल्कुल भी समय नहीं होता था। रात में दिए बनाता और सुबह बाज़ार में उन्हें बेचने निकल जाता। दीवाली पर इतनी कमाई होती की पूरे साल की कमाई से भी दो गुनी आमदनी होती और हंसी खुशी दिन निकलते।

इस बार कोरोना के कारण वर्ष भर उसका काम अच्छा नहीं चला। लोग ज़रूरत होने पर ही बाज़ार जाते। खरीदारी भी कम ही करते। रघु के लिए जीवन यापन करना मुश्किल हो रहा था। हर रोज़ वह सोचता कि इस काम को छोड़कर किसी दूसरे काम में लग जाना चाहिए। उसके पड़ोस के सभी कुम्हार दूसरे धंधों में लग चुके थे। कोई कुछ महीनों के लिए, कोई हमेशा के लिए। रघु को अपने पुश्तैनी काम से बहुत लगाव था। इसीलिए पैसे की किल्लत होते हुए भी उसने बर्तन और खिलौने बनाना जारी रखा। करवाचौथ पर छोटे छोटे करवे भी बनाए। दो चार बिके भी। अब दीवाली पास आ रही थी। वह दिन रात दिए बनाने में लगा था। उसे पूरी उम्मीद थी कि दीवाली का त्यौहार उसके घर में भी खुशियां लेकर आएगा। दिए और दियो से बने झूमर बेचकर इतनी आमदनी तो हो ही जाएगी कि उसका परिवार भी खुशी खुशी दीवाली मना सके। उसकी पांच साल की बेटी दीपमाला नया फ्रॉक पहने, फुलझडियां चलाए और घर में लक्ष्मी पूजन हो तथा मिठाई आए।

रघु की पत्नी भी दिए बनाने में उसके साथ लगी रहती। रात में दोनों जागकर दिए बनाते और दिन में दुकान लगाते। दीवाली आ गई थी लेकिन दिए इतने नहीं बिके, जितने रघु ने सोचा था। रघु उदास था। उसे लग रहा था की दीवाली के बाद उसे मिट्टी के खिलौने बनाना बंद करके दूसरा काम शुरू करना पड़ेगा। उसके गांव के दूसरे लोगों की तरह, मजदूरी का काम। आज का दिन और बचा था दिए बेचने के लिए। कल ही दीवाली थी। रघु ने अपने बनाए सभी खिलौने, दिए, झूमर और बर्तन उठाए और बाज़ार में आ गया। सड़क के किनारे जहां रोज़ बैठता था वहीं अपनी दुकान लगा ली और ग्राहकों का इंतजार करने लगा। ग्राहक आते, थोड़ा ही सामान खरीदते और वापस लौट जाते। दोपहर को रघु की पत्नी भी उसका खाना लेकर वहीं पर आ गई। दीपमाला थोड़ी दूरी पर खेल रही थी। रघु और उसकी पत्नी सड़क पर चलने वाले लोगों से दिए खरीदने का आग्रह कर रहे थे। देखते ही देखते शाम हो गई। रघु सामान समेटना चाहता था लेकिन उसकी पत्नी ने रोक दिया।,” थोड़ी देर और ठहरते हैं। कामकाजी लोग हैं, देर से ही बाज़ार आते हैं। फिर कोरोना ने तो सबको ही बेहाल किया है इस बार।” मन न होते हुए भी रघु पत्नी का मन रखने के लिए रुक गया। तभी दीपमाला दौड़ती हुई आयी। ” बाबा मेरा हाथी दिखाओ ना, घोड़ा भी लाओ ना,और वो घूमर जो आपने कल बनाया था, वो भी दे दो।”

रघु की पत्नी ने उससे सवाल किया,” पर क्यूं?” उसने झूमते झूमते हाथी उठाया और  भाग गई। दोबारा आकर झूमर उठाया और फिर से भाग गई। कुछ देर बाद वापस आई तो उसके साथ एक छोटी बच्ची और उसके माता पिता थे। दीपमाला ने अपने सभी खिलौने उस बच्ची को दिखाए। रघु की पत्नी ने बाकी का सामान भी दिखाया। इतने सारे रंग बिरंगे खिलौने देखकर बच्ची बहुत खुश थी और अपने माता पिता से उन सबको लेने की ज़िद कर रही थी।” क्या क्या लेना है साहिब?” रघु ने विनम्रता पूर्वक पूछा। “सब कुछ दे दो यार, इतने सालों बाद अपने देश में दीवाली मना रहे हैं। इस बार मिट्टी के दियों से ही मनाएंगे।” आदमी ने खुश होकर जवाब दिया।,” झूमर भी कितना सुन्दर है। ये भी दे दो। घर को भी तो सजाना है।” औरत ने अपना उत्साह दिखाते हुए कहा।,” मम्मा, पापा, मेरे खिलौने भी तो लो,मैंने कभी इतने सुंदर खिलौने नहीं देखे हैं।” बच्ची ने जिद करते हुए कहा। दीपमाला खिलौने उठाकर उसे देने लगी। रघु की पूरी दुकान उनकी गाड़ी में आ गई। रघु की पत्नी ने गिनकर ग्यारह दिए घर में जलाने के लिए बचाए। आदमी ने रघु को पैसे दिए और गाड़ी की ओर चल दिया। ” आपने एक कलाकार को मजदूर बनने से बचा लिया है साहेब। भगवान आपके व्यापार में बरक्कत दे।” रघु ने हाथ जोड़कर उस आदमी से कहा। कहते कहते उसकी आंखें भर आई। उसने दीपमाला को गोद में उठा लिया। तभी वह आदमी वापस आया। ” रघु मेरा कार्ड रखो। मिट्टी के खिलौनों की एक फैक्ट्री लगा रहा हूं। नए साल पर उद्घाटन समारोह है। मेरी भारत की फैक्ट्री तुम ही संभालना। खूब दिए बनाएंगे और संसार को रोशनी से भर देंगे।” रघु ने आसमान में टिमटिमाते तारों को देखा और कार्ड अपने पास रख लिया। अब अपने सभी साथियों को वापस अपने साथ, अपने काम में लगा दूंगा। रघु यही सोच रहा था।

अर्चना त्यागी

कविता और कहानी