दीया

दीया

मिट्टी ढ़ो ढ़ो कांधे-सिर भार
कुम्हार का जुटा परिवार ;
गढ़ेंगे दिया भरूकी चाक पर
खभारू यापन जीवन संसार!

रौशनी दूर से टिमटिम झांके
अनुरागी आगत को मनाने,
हांथ बांध कमर कस तैयार
जीवन अंधस तिमिर भगाने!

फोड़ती माटी का ढ़ेला
उदह पानी माटी फुला रही,
पैरों से रौंद रौंद कर वह
गारा लोंदा का बना रही!

मुर्गा बागते डटता कुम्हार
चाक पे लोंदा मिट्टी को नचाता,
अंगुठे के दाब इशारे से
घड़िला दिया नवदीप बनाता !

सजा रहे पकने को आंवा
कोयला भूसा ईधन लकड़ी,
तपकर काला फिर लाल
कुम्हार की जल रही भट्टी!

फूटपाथ नुक्कड़ पर सजे हैं
माटी के नाजुक दीया- बर्तन;
होगी मोल मोलाई, परख
ठोक पीट आवाज टनटन!

नजरें पसार करता इंतजार
कोई ग्राहक तो आ जाता,
मिट्ट-पानी धरती माँ की छोड़
बस श्रम का कीमत दे जाता!

नजरें बारम्बार देखतीं अम्बर
पुष्पक विमान उतरने की ले आश;
मर्यादा पुरुषोत्तम राम थाम लेते
श्रमिक जीवन के हांथों को काश!
⭐ ⭐ ⭐
-अंजनीकुमार’सुधाकर’

कविता और कहानी