दो पल

दो पल

         मिले दो पल जीवन की आपाधापी में से…और दो मैंने चुरा लिए।

       सघन गर्मी में तपते हुए प्यासे को जैसे मेघों की हल्की सी रिमझिम फ़ुहारों ने भिगो कर मन को हर्ष और संतोष प्रदान कर दिया हो…कुछ ऐसा रहा आज का प्यारा सा, दुलारा सा, मनमोहक संगीत सुनाता सा अलबेला दिन।

        कुछ मिले…. और कुछ चुराए पलों को जब जीने का अवसर हाथ आता है तो उनसे मिली खुशियों की रंगीनियों का अनुमान लगाया नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है….और उसमें साथ पति का हो तो सोने पे सुहागा।

        बहुत दिनों से अपने स्वास्थ्य के चलते घर में ही थी, तो जैसे मन का आकुल पंछी उड़ान भरने को अवसर की खोज में था। कड़वा पानी के हरि ओम शिक्षण संस्थान देखने की बात चली तो चंदबरदाई की कविता पंक्ति के अंश…मत चूके चौहान …के अनुसार मैं भी तैयार हो ही गई।

         कड़वा पानी के हरि ओम शिक्षण संस्थान को, जो हरिओम आश्रम कड़वापानी न्यास के द्वारा चलाया जाता है, देखा। अनुपमानंद गिरी और शिवोSहम बाबा जी अपने प्रयासों से 130 बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करते है, कुछ दानदाताओं से प्राप्त होता है। वहाँ का सुरम्य वातावरण और व्यवस्था देख कर अच्छा लगा। अब पुनः देखने तो जान ही पड़ेगा।

        वहाँ से थोड़ी ही दूर मानक सिद्ध का मंदिर था, जो मेरे लिए बोनस के समान हुआ। कब से जाना चाह रही थी,और यूँ अचानक मिले अवसर ने मन की इच्छा इस तरह पूरी कर दी कि बस मन से यही निकल पाया….धन्यवाद पतिदेव!…क्योंकि जाने की योजना तो उन्होंने ही बनाई थी।

       आमतौर पर किसी भी मंदिर में जाओ तो भीड़-भाड़ के रेले में धक्के-मुक्के ही हिस्से आते है…दर्शन भी ढंग से नहीं हो पाते। लेकिन आज हमने ढंग से दर्शन भी किए, मन भर चित्र भी लिए और वहाँ के शांत वातावरण को मंदिर के प्रांगण में काफी देर बैठ कर जिया भी।

         आज की मिली इस खुशी से फूली-फूली मैं स्मृति में जीते हुए कई दिन यूँ ही मन ही मन मुस्कराती रहूँगी।

डा० भारती वर्मा बौड़ाई

कविता और कहानी