धोबीघाट

धोबीघाट

एक अँधेरी गुफामें खिंची जा रही है वह—घिरनी की तरह घूमती हुई।घोर अँधेरा—आँखें फाड़ फाड़कर देखने की कोशिश कर रही है वह-,पर कुछ दीखता नहीं –काला –गहरा अँधेरा बस।घूमता हुआ शरीर जैसे तिनके तिनके हो बिखर जाएगा—कितना लम्बा अँधेरा है—एक किरण ही रोशनी की दिख जाए गर! और –और  –अचानक जैसे रोशनी का विस्फोट है यह तो! गुफा फैलने लगी है-और शरीर का नर्तन भी धीमा होता जारहा है।पैर जमीन पर टिकने लगे हैं।सामने घास का मैदान दीखता है—दूर तक फैला हुआ।दो पशु घास चर रहे हैं—हाँ—गदहे ही हैं।–आकार में छोटे, रंग में मलिन।वैसे हीजैसे गदहों  के होते हैं।वे मुड़ते भी नहीं सिर नीचे ही झुके हैं- बस घास पर केन्द्रित।रोशनी फैलती जा रही है,तीखी भी होती जा रही।आँखें अचानक चुँधियाने लगी हैं।दूर पर कोई नदी है शायद।पानी भी झिलमिल कर रहा है।बड़े से पत्थर पर कोई कुछ पटक रहा है।हाँ कपड़े हैं ,धोबी है ,गट्ठर है।और नजदीक वह जा रही है।अपना अस्तित्व इतना हल्का प्रतीत होता है जैसे पैरों में हवा की थैलियाँ लगी हों।धोबी कुछ पटक रहा है।  हाँ कपड़े हैं।और उनसे छितरकर जो आसपास फैल रहा है,वे हैं चमकते सिक्के।और भी कोई पास है जो इन चमकते सिक्कों से खेल रहा है। धोबन है वह।उसने सिर में राजकुमारियों से पंखों के मुकुट पहन रखे हैं।सिक्कों से वह खेल रही है।सिक्के स्वर्ण से चमकते हुए।खेल खेलकर वह उन्हें नदीमें फेंकती भी जा रही है।मुझसे रहा नहीं गया ।मैं पूछ रही हूँ –सिक्के फेंक रही हैं आप –मुझे दे दें।

–नहीं बहुत हैं, फेंकना ही है।यही नियति है इनकी। देखो ढेर हैं सिक्कों के–।मैने देखा सचमुच ढेर हैं सिक्कों के।ढेर का आकार बढ़ता ही जा रहा है।चमकते सिक्के खनक नहीं रहे,ढब ढब कीआवाज से गिर रहे हैंऔर नदी के जल मे गोल –गोल घेरे बना रहे हैं।

   धोबी बार –बार पेशानी पर आएपसीने को ऊँगलियों से काछता है,फेंकता है।फिर नंगे बदन झुककर कपड़ों कोपत्थर पर पटकता है,कपड़े साफ नहीं हो रहे, लगातार सिक्के ही निकलते जा रहे हैं।वह अवश सा निढाल हो  बैठ जाता है,मुड़कर बगल में पड़े सिक्कों केढेर कोदखता है।नजरें उठा धोबन के श्रृगार एवं सिक्कों को धड़ाधड़ फेंका जाना भी उसकी दृष्टि में अनायास आ जाता है।पर वह निर्लिप्त सा उस और से दृष्टि हटा  पत्नी से पानी माँगता है।पर पत्नी –वहतो नकार देती है।

–खुद पी लो। सामनेतो पानी ही पानी है”।– वह हँसती भी है।उसे तो सिक्कों के खेल से मतलब है।धोबी लंगड़ाकर उठता है।एक कपड़े में बँधी रोटी निकालता है।खाने के लिए हाथ बढाते ही कोई हाथों को पकड़लेता है।

—नहीं ये मेरे हैं।तुम कपड़े धोओ।

धोबी अनिश्चय से कपड़ों को देखता है। चकित हो सोचता है –येतो कपड़े हैं ही नहीं ये तो सिक्के हैं।

      मैं– मुक्ति ,देखते देखते विस्मय की दुनिया से वापस आने की कोशिश करती हूँ।उलट कर देखती हूँ—वह रास्ता कहाँ है जिससे वह यहाँ आई।?वह घास भीसूखी हुयी है।गदहे भी नहीं दीखते।कहाँ गए सब?। और धोबी!—वह वापस कैसे जाएगा?।वह—कैसे जाएगी?अँधकार का रास्ता नहीं।रोशनी में रास्ता ढूँढ़ना होगा शायद।मस्तिष्क भन्ना उठता है।

आँखें खुल जाती हैं।वह बिस्तर पर पड़ी है। कई करवटें ले चुकी है।अब उठना आवश्यकहै।क्या यह सब स्वप्न था –अर्धस्वप्न।समस्याएँ तो हैं। अँधेरी दुनिया से निकलना भी आवश्यक है।आकाश में फिर काले बादल घिर आए हैं।तीन दिनों से रह रह कर बारिश हो रही है।अजीब मौसम है। खुलता है तो ठंढ की दुनिया फुर्र हो जाती है।बादलों के बीच से झाँकता है एक चेहरा।तेजतर्रार –मोटे मोटे गाल। व्यक्तित्व के शेष पहलू भी उभर कर सामने आते जाते हैं। कमर के नीचे का भाग अप्रत्याशित रूप से भारी। किन्तु चाल मे एक मनोहर मादकता ।हाँ वह एक नारी है।अब सब स्पष्ट हो रहा है। तो—यह वह है जो कल धड़धड़ाते हुए कमरे मे प्रवेश कर गयी थी।मुझे –मुक्ति को अपना परिचय इतनी हड़बड़ाहट में दे गयी कि सब विस्मृत हो गया।हाँ, वह मुक्ति से मिलने आई है और उसका मनोरंजन करने भी।वह जानती है कि उसका मन नहीं लगता होगा।वह आ जाया करेगी।क्या मुक्तिजी को डाँस करना अच्छा लगता है—वह उनके साथ डाँस भी करेगी।मुक्ति अकचकाकर उसे देखती रह गयी।यह कैसा प्रस्ताव।?उसने यह क्यों नहीं पूछा कि वह क्या विशेष खाने में रुचि रखती है-वह बना कर लाएगी।!अचानक डाँस।—डाँस से क्या सम्बन्ध है उसका! डीलडौल देखकर तो नहीं लगता कि उसने डाँस भी किया होगा!

अचानक उसे बैठकर बातें करने का प्रस्ताव देना मुक्ति को अच्छा नहीं लगा। जब वह अगले दिन आएगी तभी बातें करेगी।

विनीता—नाम क्यों रखा था माँ –बाप ने उसका।नामानुरूप व्यक्तित्व के बड़े सपने पाले होंगे।वह विनीता होगी।सँभालेगी घर –बार,सास ससुर, दुनिया के रिश्तेऔर बनेगी दिलों पर राज करनेवाली महारानी।राज अन्यदिलों पर करे या नहीं अपने दिल पर तो कर ही रहीहै वह।हाँ ,अपने नाम को सार्थक करती तो वह कहीं से दिखती नहीं।

काम्या और विनीता में अच्छी मित्रता है।सिद्धांतों में दोनों के प्रगतिवादी दृष्टिकोण समान हैं पर व्यवहार मेंवह समानता नहीं है।बड़े बड़े सिद्धान्तों में उलझनों के निदान खोजना बड़ी बात है पर कभी –कभी ये सिद्धान्त आत्मघाती भी हो जाते हैं।नारी स्वातँत्र्य एक महत् सिद्धान्त है।नारी को सामाजिक यंत्रणाओं सेमुक्त होनाआवश्यक है। घरेलू मशीन बनकर जीवन खेना उसका उसकी नियति नहीं होनी चाहिए।उसे सिर्फ रोटियाँ ही नहीं थापनी।घर की दीवारें ही उसकी सीमाएँ नहीं। कार्यक्षेत्र विस्तृत होना ही चाहिए।कम से कम –एडुकेशन ,सर्विस और जीवन ,देश दुनिया में अपने कोस्थापित करने केप्रयत्नों कीआज़ादी तो होनी ही चाहिए।हाँ किसी मिशन को लेकर जीना अवश्य अच्छा है।काम्या भी सिद्धान्ततः इन बातों का समर्थन करती हैबहसों में हिस्सा भी ले ही सकती है। मित्रता की नींवइसी पर टिकी है।

   विनीता आज आ गयी थी। मुक्ति नेआज उसे बैठकर बातें करने के लिए सहमत किया। कहा—

  –आइये–  कुछ धीमी गति मेबातें करें।

–ऐसा क्यो?

–मुझे बातें समझने में आसानी होती है।आपने मुझसे डाँस की बातें की थीं।क्या डाँस करनाआपको बहुत पसंद है?।

–हाँ!-मेरी हॉबी है ।पर मुझे” आप” न कहो।दूरी लगती है।

मुक्ति हँस पड़ी।उसका हाथ पकड़ कर कहा—

—ठीक है।मुझे ही कहाँ अच्छा लग रहा था।पर,बात तो रह ही गयी।

–हाँ डाँस मुझे पसन्द है। अंगों के साथ मन के भाव भी नृत्य करते हैं।

अवश्य। पर क्या क्लासिकल डाँस–?

—अरे नहीं क्लासिकल भावनाओं में बँधकरहाथों पैरों को गति देना,आँखों को नचाना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं।

–तो—?

–वेस्टर्न म्यूजिक, वेस्टर्नडाँस।उन्मुक्तता, विचारों की स्वच्छन्दता।बँधकर रहना मुझे पसन्द नहीं।

–गृहस्थी-?

–गृहस्थी का स्वतंत्र जीवन मेंलेश स्थान ही है।सामाजिक बंधन ही हम नारियों का अभिशाप है।

–पर आप भी तो अपनापा खोजती हो।

–हाँ वह तो मानवमात्र को चाहिए।

–पर, जीवन कैसे कटेगा।?

–जीवन को बस एक लक्ष्य चाहिए और पैसा।

मुक्ति का मन रात्रि के अर्धस्वप्न की गुहाओं में पुनःभटकने लगा था।धोबी कपड़े धो रहा अबतक  । मुद्राएँ पीछा नहीं छोड़ रहीं।और धोबन यूँ ही सिक्के फेंकती ही जा रही ।

–या पैसा और पैसे से जुड़ा कोई एक लक्ष्य?

–जो समझ लें आप।–

वह अन्यमनस्क होती जा रही थी पर प्रश्नों को स्वीकार करना उसकी विवशता थी मानो।

–और वैवाहिक मिलन?

—बस जीवन की वैध शारीरिक आवश्यकता –मन का मेल हो तो ठीक अन्यथा —

–मन के मेल में क्या स्थायित्व की आवश्यकता नहीं-?

–अस्थायित्व भी ग्राह्य हो सकता है।

–ओह।मुक्ति को लगा धोबी का स्थान धोबन ने ले लिया है।धोबी मुक्त हो गया है।धोबन थक नहीं रही, सिक्के बटोर रही है।धोबी निर्लिप्त है।–कोई दूसरा घाट मिल जाए ,सिक्के न निकलें—कपड़ों की गंदगी निकल जाए बस। वही ठीक है।

–आप कहाँ चली गयी हैं मुक्ति ?

–कहीं नहीं।सोचती थी,–कल धोबी कपड़े खँगाल रहा था।कपड़ों से गंदगी निकल नही पा रही थी। पर अभी लगा उसने नहीं ,अब धोबन ने कपड़े धोने शुरु कर दिये हैं और सिक्कों को देख वह बेहद खुश है।धोबी मुक्त और निश्चिन्त भी है।कपड़ों के लिये वह अन्यत्र घाट की खोज में है।

—अरे!आप विजन भी देखती हैं।?

–हाँ कभी कभी।

–वेरी इन्टेरेस्टिंग।पर मुझे अब जाना है।

काम्या अबतक बैठी बातो का आनंद ही लेरही थी।अब उस कॉफी पीने पर विवश किया पीकर अगले दिन आने का वादा कर विनीता चली गयी।काम्या गृहकार्यों में लगी रही।मुक्तिने लक्ष्य किया—काम्या गम्भीर थी।

मुक्ति काम्या के साथ गोआ आ गयी है।कुछ दिन अपने कार्यस्थल से बाहर रहकर निश्चिंन्तता के साँ स लेने।पर  गोआ—वही समुद्र तटें , वही बेचैन ख्वाहिशों की बेचैन जिंदगी।वही बेचैन करनेवाली गंध,–हर कहीं। रोज रोज की एक ही उन्मुक्त जीवनशैली।देखते और महसूस करते वह तंग आ गयी थी।पर नवीनता के एहसास को कुछ दिन अपने शुष्क विचारप्रधान जीवन से वह जोड़ना भी चाहती थी।सैलानियों की रंगविरंगी कल्पनाएँ ,जीवन्त होती स्वच्छन्दता ,और पुर्तगाली सभ्यता के अवशेष। दूर सेदेखना तो अच्छा लगता है पर उसमे रमकर जीना मुश्किल है उसके लिए।

                काम्या भी नारी स्वातंत्र्य की पक्षधर है।पर,अनामंत्रित खतरे का आभास है उसे।अकेलेपन की जिंदगी अधिक दिन मन-रंजन नहीं कर सकती।गृहस्थी के अन्दर ही नारी स्वातँत्र्य का आनन्द वह लेना चाहती है।निश्चिंतता का जीवन भी तो चाहिए।उसका पति पियूष उसके अधिकारों में बाधक नहीं बनना चाहता।फिर भी—

–आज आलू की रसेदार सब्जी बनाओगी क्या?

–किन्तु कितने आलू खाओगे। कार्बोहाइड्रेट—

पियूष मुँह बनाकर रह जाताजब उसके सामने लौकी की सब्जी और रोटी रख दी जाती।बाजार जाकर वह ढेर सारी चीजें लातीजिनमे श्रृगार-प्रसाधन की बहुलता होती।आइसक्रीम, वेस्टर्न फ्रूट्स और एक दो नये ड्रेस।अपने पुत्र के पसंद की चीजें लाना भी नही भूलती।एकाध नए ढंग की पर्स औरपियूष के लिए अपने पसंद की कोई शर्ट।घर आकर आराम से सोफे पर लेट जाती।मुक्ति को यह एहसास था कि वह अब रेडिमेड चीजें ही खाएगी और खिलाएगी भी।

–मुक्ति चलो आज कोई पिक्चर देख आते हैं।

–पर—पियूष के आने का समय भी तो हो जाएगा।

–फिक्र मत करो वह दिन भर फैक्ट्री मे मस्त रहता है ,मै एक पिक्चर भी न देखूँ !

–फैक्ट्री में मस्ती-?

–और क्या उसे कोई मजदूरी करनी पड़ती है?”—पियूष किसी फैक्ट्री मे उच्चपदस्थ ऑफिसर है।

–फिरभी।

–कुछ नहीं ।चलो।

काम्या पूरे प्रसाधन के साथ सिर पर रंगीन कैप डाल,अँग्रेजी वेशभूषा में किसीफिल्म की नायिका की भाँति ही निकल जाती.।और लोटने पर पियूष ब्रेड परबटर लगाकर  स्वयं बनायी चाय की चुस्कियाँ लेता नजर आता।

–हेलो डॉर्लिंग –पिक्चर कैसी लगी?

काम्या इस स्वतंत्रता को  हाथों से जाने नहीं देती।पियूष और काम्या के सम्बन्धों मे काम्या का पलड़ा हमेशा भारी ही होता।पियूष मुख पर मुस्कान लाकर काम्या का स्वागत करने को विवश ही होता।

विनीता अपने वादे के अनुसार अगले दिन आ ही गयी।पर वह थोड़ी खिन्न सी दिखी।उसके पूर शरीर में दर्द था।उसने विगत दिवस कुछ ज्यादा ही ड्रिंक ले ली थी।

—आज मैं डाँस का प्रस्ताव नहीं दे सकती।

–पर आज तो मैं प्रस्तुत हूँ।एकाध उल्टे सीधे स्टेप तो ले ही लूँगी।पर तुम्हें क्या हुआ।

–कल कुछ ज्यादा ही ले ली थी।

–यह तो तुम्हारी ईच्छापर ही निर्भर रहा होगा।

–कभी कभी ईच्छाएँ भी बन्धन की माँग करती हैं।

–तो क्या स्वतंत्रता में बाधा नही होती?

–कल किसी ने रोका नहीं ।अगर रोका होता—तो शायद आज मैं—

–मेरे साथ नृत्य कर सकती है न।?

–हाँ शायद।

–रोकने की उम्मीद किससे है विनीता—

–पता नहीं ।मित्र—कोई और भी।

–पति? पति नहीं?

–शायद नहीं वह तो परतंत्रता है

–माफ करो ।पर मैं कुछ कहूँ?।

–हाँ ।

–यह परतंत्रता नहीं जिससे आप डरती हो।ये वे मुक्त इच्छाएँ है,जो तुम्हें किसी बन्धन मे बँधने नहीं देतीं । पर ऐसे कैसे चलोगी।और समाज?

–समाज की कल्पना बेमानी है।वह व्यक्ति के लिए है। व्यक्ति समाज के लिए नहीं।

–और अगर आपके पास पैसों के स्रोत न हों तब?

–तब? तब नहीं टूटूँगी।

–फिर उदासी कैसी।कम या अधिक पीना कोई मायने नहीं रखता।

पियूष आज फैक्ट्री से जल्दी आ गया ।विनीता को देख उसने प्रसन्नता जाहिर की।

–हेलो विनीता।

–हाय पियूष।

–आज उदास क्यूँ हो। चलो कोई पिक्चर देख आते हैं।

–आप क्या इसलिये जल्दी आ गये हो?हमारी स्वतंत्रता छीनने।?

–नहीं उसे बल देने।काम्या ने कल देखी है पिक्चर। वह तो आज जाएगी नहीं।आज आप चल सकती हो।

काम्या स्तब्ध थी।मुक्ति मात्र दर्शक की भूमिका मेथी।विनीता उठ खड़ी हुई।उसने पिक्चर जाना स्वीकार कर लिया।काम्या ने चुपचाप चाय की ट्रे लाकर रख दी।पियूष ने निर्लिप्त भाव से चाय तैयार की और पी।विनीता स्थिर भाव से काम्या और पियूष को दे खती रही।

–काम्या तुम भी चल सकती हो क्या।

–नहीं आप जाओ।

विनीता के ओठों पर हल्की सी मुस्कुराहट आकर चली गयी।

दोनो बाहर निकल गये। ड्राईंग रूम में अप्रत्याशित सन्नाटा छा गया।पुत्र अशेष की क्रीड़ाएँ भी प्रफुल्लित करने मे असमर्थ थीं।संध्या होने वाली थी ।दोनों कं मन अशांत हो गए थे।ये कैसी प्रतिक्रियाएँ!!—काम्या क्या स्त्री स्वातंत्र्य का सही प्रयोग कर रही थी ?या विनीता–?मुक्ति हतप्रभ थी। काम्या अचंचल पर उद्विग्न मन से बिखरे सामानों को यथास्थान रखने का प्रयत्न कर रही थी।मुक्ति ने उसउद्वेलन कोपढ़ने की कोशिशकरते हुए काम्या को सम्बोधित किया।

–चलो अशेष के साथ समुद्र तट पर थोड़ा टहल आएँ।

अशेष ने भी थोड़ी जिद की।काम्या जैसे आविष्ट सी चल पड़ी।उसकी नजरें फिश मार्केट पर थोड़ी अटकी थीं।मुक्ति ने लक्ष्य किया और प्रश्नात्मक दृष्टि से उसे देखा।

–पियूष के लिए थोड़ा फिश तैयार करना चाहती हूँ।उसे पसन्द है और अशेष को भी।

–पर वह तो शायद लंच करके आया हो।

–हाँ पर दिन भर थकता तो है।

मुक्ति ने लक्ष्य किया—काम्या गम्भीर थी। वे तीनों वापस चले आए।

रात होनेवाली थी।निस्तब्धता व्याप्त होने लगी थी।मुक्ति अपने आगे के कार्यक्रम के विषय में गम्भीरता से विचार कर रही थी।उसकी उपस्थिति में काम्या की गृहस्थी में उथल पुथल शायद उसे अच्छा नहीं लगेगा।वह कल की फ्लाइट पकड़ वापस मुम्बई जाना चाहेगी।

   समुद्र तट पर लोगों की व्यस्तता-आधुनिकता का नग्न नृत्य  जारी हो चुका होगा।आकाश में तारे झिलमिल कर रहे थे।उसे वह अपना पुराना गृहस्थ जीवन याद आया जब सम्पूर्णतः वह परिवार के प्रति समर्पित होती थी।उसने अपनी स्वतंत्रता से बड़े बड़े समझौते किये थे।आज समझौता नहीं चाहिए।

   अचानक बाहर हलचल सी सुनायी पड़ी।कालबेल की आवाज, दो तीन व्यक्तियों की मिली जुली ऊँची नीची आवाजों ने उसे चौंका दिया।काम्या दरवाजा खोल चुकी थी।लड़खड़ाते कदमों से विनीता के कन्धे पर हाथ रखे पियूष अन्दर आते ही लुढ़क सा गया।

–अरे पियूष?—विनीता?

यह काम्या थी।

–ओह—यह तो मानता ही नहीं था।रोकना बेअसर था । मैं—

काम्या चंचल हो उठी।उसने विनीता की ओरअजनबी निगाहों से देखा।विनीता तेजी से बाहर चली गयी।बाय तक नहीं किया।

मुक्ति हतप्रभ मूक द्रष्टा सी खड़ी थी।नारी स्वातंत्र्य ने किस किसको कहाँ लाखड़ा किया था!दो ध्रुवों के बीच गोल गोल घूमना ही पड़ता है शायद।अपने निश्चयों को बल देते हुए कमरे में जा वह सो गयी।

फिर वही गहरा अँधेरा।लम्बा टनेल।वह चलती जा रही है—घोर अँधेरा।रास्ता नहीं दीखता पर जैसे किसी नेएकसिरे से दूसरे तक पहुँचने के लिए प्रक्षेपित कर दिया हो।सामने से हलकी रोशनी आती दिख रही है।वह सम्हलकर पैरों पर खड़ी हो जाती है।वही नदी तट,–वही घास का मैदान।कपड़े धोता हुआ वही धोबी।पर अब स्वर्ण छिटकते से नहीं दीख पड़ते।हतप्रभधोबी कपड़ेधोता ही जा रहा।थक गया। पीछे से रोटी की पोटली निकाली।पर—किसी ने हाथ थाम लिए।पोटली खोली।रोटी और मछली के भुने टुकड़े।उलट कर देखा –स्वर्ण मुकुट से जगमग करती धोबन थी यह तो।—————— आशा सहाय  

कविता और कहानी