नारी तू नारायणी

नारी तू नारायणी

नारी शक्ति का परिचय इस देश को आदि काल से होता रहा है।वेदो पुराणो और ग्रंथो से लेकर इतिहास और आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी देखने को मिलता है।आदि काल में सती, दुर्गा, सरस्वती, पार्वती और अनेक सती की कहानी का वर्णन है तो इतिहास में रानी लक्ष्मी बाई सरोजनी नायडू मदर टेरेसा आदि का जिक्र है वही आज के आधुनिक युग में जीवन के हर क्षेत्र में उनकी अदम्य साहस और सफलता का जिक्र है तभी तो कहा जाता है “नारी तू नारायणी” ।
फूलवती एक साधारण परिवार की महिला है। उसकी शादी के बारह वर्ष बीत चुके हैं इन बारह वर्षो के दरम्यान उसने जीवन के कई उतार चढाव देखे इस दौरान उसके दो पुत्र और दो पुत्रियां भी हुई ।फूलवती का पति दिलावर जो साधारण सी नौकरी करता है नौकरी क्या करता जितना कमाता नही उससे ज्यादा का पी जाता है।फूलवती को परिवार चलाने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।इसलिए फूलवती ने निश्चय किया कि वह खुद कोई काम करेगी और बच्चो को अच्छी शिक्षा भी देगी ।उसने अपने पति से बात की पति राजी तो नही हो रहा था लेकिन फूलवती अपने निश्चय पर अडिग होकर पति के इच्छा के विपरीत कार्य करने लगी। फूलवती खूब मेहनत करने लगी उसने बच्चों को अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाया और उन पर ध्यान देने लगी । धीरे- धीरे समय बीतता गया और फूलवती का संसार संवरता गया । बच्चे अच्छे शिक्षा प्राप्त कर बड़े शहर में गये बच्ची भी शिक्षित होकर नौकरी करने लगी उधर दिलावर ने बच्चों की खुशी की खातिर पीना छोड़ दिया । कुछ समय पश्चात बच्चो की भी नौकरी लग गयी । सभी बच्चे अच्छी तरह सेटेल हो गये तो उन्होने अपनी माँ से कहा! माँ तुम अब काम छोड दो ? माँ ने सभी के विचार जानने के उपरांत बोली ! बच्चों आज तुम सब इस मुकाम पर पहुँचे हो वह इसी काम की बदौलत है यह काम हमारी हैसियत है जो हमें हर पल यह बताता है कि इंसान को अपनी हैसियत में रहना चाहिए।जब कष्ट भरे दिन में यह काम हमारा सहारा बना तो आज सुख भरे दिन में मै इसे कैसे छोड दूँ यह मेरे जमीर के खिलाफ होगी मै इसे नही छोड सकती । तुम लोग भी अपने काम के प्रति वफादार बनोगे तो वह भी तुम्हारे साथ वफा अवश्य करेगी।ये बाते सदैव याद रखना।बच्चे माँ की बात सुनकर उनके चरणों को प्रणाम कर अपने अपने काम में लग जाते हैं।
कहने का मतलब शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नही है कदम-कदम पर वास्तविकता और आदर्शों के प्रति परिचय कराना भी शिक्षा है।ताकि संस्कृति सुरक्षित रह सके फूलवती ने अपने बच्चो को काम के प्रति वफादारी करने का ही नही बल्कि कठिन समय में ईमानदारी पूर्वक संस्कृति की रक्षा करते हुए संघर्ष करने की शिक्षा अपने बच्चो को दी थी ताकि कठिन परिस्थितियो में उनके पांव न लड़खड़ाये और कर्त्तव्य के प्रति वे जागरूक रहे हैसियत के मुताबिक।

कहने का तात्पर्य है कि नारी ही परिवार की वो शक्ति होती है जिससे सिर्फ बच्चे ही नही उनके संस्कारो का भी जन्म होता है वह पलता है बढता है और समाज में अपने विचारो को रखता है । जीवन रूपी धूरी है नारी जिस पर अनंत आवश्यकता इच्छा आकांक्षा और सपने पलते हैं और एक दिन यही धूरी रफ्तार देकर जीवन की सभी आवश्यकता को पूरा करते हैं ।कोई भी घर हो कोई मजहब लेकिन इस जीवन रूपी धूरी से सभी को गुजरना होता है जिनकी धूरी मजबूत इरादो संस्कारो और कर्त्तव्यपरायण होते है उन्ही का जीवन रफ्तार पकड़ता है,जो खोखले, द्वेषयुक्त लोभयुक्त और जलनशील होते है वो वक्त से पहले गुमनाम हो जाते हैं।तभी तो नारी को नारायणी कहा जाता है।

आया सावन

सावन की काली घटा
देखो छा रही है
बारिस की बूँदे
नित बरसा रही है।

पूरवईया की शीतलता
और प्राणीयों की चहचहाट
हर तरफ हरियाली
गजब ढा रही है।

मांझी की नाव
और नदी का किनारा
कल-कल करती धारा
मनोरम दृश्य विखरा रही है।

किसानो की खुशी
कीचड से सने खेत पर
पानी का छलकना
छोटे छोटे पौधों से फसल लगा रही है।

शाम की धटा और घूप अंधेरा
टर्र टर्र करते मेढक
बादलो से अठखेलियाँ करती चाँदनी
सबको बता रही है कि आया सावन।

बम बम की पोशाक और कामर
भोले की गूँज से सराबोर है
गेरूआ वस्त्र में पूरे भोले की नगरी
में बोल-बम बोल-बम का शोर है।

सावन आते ही सनातनीयों का
पावन पर्व शूरू हो जाता
विभिन्न त्योहारो के माध्यम से
भारतवर्ष भक्तिमय हो जाता।

है भाषाएँ अलग अलग
पर है मान्यताएँ एक
परम शक्ति है भक्ति में
तभी तो पूरा देश कहता
ब्रह्मा,विष्णु महेश।

                      आशुतोष
                   पटना बिहार
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कविता और कहानी