पथिक

पथिक

ना आसमान में उड़ने का शौक है,
ना जमीन पर बैठने का ख्वाब है,
बस मंजिल से अत्यंत प्यार हैं,
चलता हूं हर वक़्त पथ पर
अपनी मंजिल के लिए।

अपनी जान अर्पण कर दूंगा,
खून का कतरा कतरा बहा दूंगा,
अपनी हर स्वांस लूटा दूंगा,
अपनी मंजिल के लिए इसलिए,
चलता हूं हर वक्त……….2

ना मंजिल दिखाई देती है,
ना पथ का अंत दिखाई देता है,
कठिनाइयों का सामना करता हूं,
उम्मीदों के साथ चलता हूं, हर वक्त
पथ पर अपनी मंजिल के लिए।

स्वरचित- इन्द्र कुमार तवंर, बाड़मेर

कविता और कहानी