पराया घर पराये बोल

पराया घर पराये बोल

शमिता के ससुराल मैं कोहराम मचा हुआ था। जो कोई आता सहानुभूति के साथ-साथ दो टूक शब्द ऐसे कह जाता जो कलेजे को अंदर तक चीर जाते। शमिता के आँख के आँसू तो अब जैसे सूख गये थे, बस मूर्तिवत आने-जाने वालों को देखती रहती। कोई कहता” अरे पहाड़ सी जिंदगी पड़ी है कैसे कटेगी” तो कोई कहता “जाने कैसे भाग लिखा कर लाई है” पर शमिता के भीतर तो अलग ही कोलाहल मचा हुआ था। असहनीय पीड़ा,  चिंता उसे सताये जा रही थी। बस छह महीने की नन्ही सी जान को सीने से लगाये रहती। पति के निधन पर क्रिया-क्रम के सारे संस्कार हुए और ज्यों ही घर रिश्तेदारों से खाली हुआ ससुराल मे सभी के तेवर बदल गये। अपने पीछे हो रही काना-फूसी को बस नजर अंदाज कर रही थी। एक दिन तो कहर ही हो गया जब सास ने स्पष्ट शब्दों मे कह दिया” देखो बहुरिया बेटा तो हमारा रहा नही और बेटी से तो घर का वंश नही चलता, आखिर हम कब तक तुम्हे और तुम्हारी बेटी को पालेंगे”. शमिता बस अँगूठे से फर्श कुरेद रही थी बिना कुछ बोले।”अरे हम तुम से बतिया रहें हैं कान मॅ क्या घी-तेल डाले बैठी हो” सास की आवाज मे कठोरता और आक्रोश दोनो ही थे।” पर अम्मा हम तो …..शमिता इतना ही कह पायी थी कि सास की फिर आवाज कानों मॅ पड़ी “अब तुम्हे पीहर मॅ वो दूध-घी से नहलायें या सूखे रखें उनकी जवाबदारी, कल तड़के भानु छोड़ आयेगा। शमिता समझ गयी निर्णय हो चुका है। सुबह-सुबह ही दूसरे दिन अपनी बेटी को कलेजे से लगा शमिता पीहर पहुँच गयी। जैसे ही आंगन मॅ पैर रखा सब कुछ परिचित सा लगा। वही नीम का पेड़, तुलसी और कोने मे छोटा सा हौद।अपने भीतर उसे अपनी बेटी की परछाईं दिखने लगी। कुछ पलों के लिये उसे लगा ठीक नीम के पेड़ तले उसकी बेटी खेल रही है। हौद से पानी उड़ा रही है, और तुलसी के गोल चक्कर उसके पीछे-पीछे लगा रही है। उसने चैन की सांस ली। मा-बापू, भाभी-भाई दौड़े चले आये पर शमिता को देखर सबके चेहरे के भाव बदल गये।अजीब सी खामोशी छा गयी थी। आखिर बापू ने ही खामोशी तोड़ने की कोशिश की “और बिटिया कैसे आना हुआ? सब कुशल-मंगल” शमिता के पावों तले जमीन खिसक गयी। पल भर सब कुछ पराया लगने लगा।”बस यूं ही मिलने चली आई घड़ी-दो-घड़ी मॅ चली जाऊँगी” शमिता के गले से बड़ी मुश्किल से शब्द निकले। और थोड़ी देर बाद उसके कदम अपनी प्रिय बचपन की सखी के घर ओर चल पड़े जो कुछ वर्षों पहले विधवा हो चूकी थी…… अजीब सी कश्मकश थी …..कैसे वक्त के साथ सब कुछ पराया हो गया था। पराया घर पराये बोल……

उज्जवला साखलकर

कविता और कहानी