‘पलकों पे मोतियों को पिरो लें

‘पलकों पे मोतियों को पिरो लें

‘पलकों पे मोतियों को पिरो लें, तो फिर चलें |

दामन में इन लम्हों को सँजो लें, तो फिर चलें |

अबकी जुदा हुए तो जाने कब मिलेंगे फिर,

तुझसे लिपट के ख़ूब हम रो लें, तो फिर चलें |

सहरा के सफ़र में भला दरिया कहाँ मिलेगा,

आँखों को आँसुओं में डुबो लें, तो फिर चलें |

इक-दूसरे के वास्ते अब तो तरसना होगा,

इक-दूसरे का आजभर हो लें, तो फिर चलें |

बेरंग ज़िन्दगी ये तुझ बिन ‘आवारा’ होगी,

कल के लिए भी रंग कुछ घोलें, तो फिरचलें |’

महेन्दर ‘आवारा’

(महेन्द्र कुमार मौर्य)

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