पाने की जिद्द

पाने की जिद्द

देख रहे हो ना आजकल इंसान-इंसान में तकरार बहुत है।

जान सको तो जान लो, हकीकी के दिल में प्यार बहुत है।।

साहिब  जानता है, जो जैसा-कैसा भी  है बस मेरा ही है।

लोग जानते हैं कि, उसे अपने बालकों से दुलार बहुत है।।

सब जानते कि, उस इलाके में रहना खतरनाक बहुत है।

फिर भी, काफ़िरों की बस्ती में, रहने को तैयार बहुत हैं।।

अक्सर, रात भर तकते रहते हैं वो, चांद  को चकोर-सा।

उन्हें चांद से नहीं, उसकी उजली चाँदनी से प्यार बहुत है।।

यूँ तो जमाने में, हमारे मिलने-जुलने वाले दोस्त बहुत  है।

कुछेक हैं,जो हमें खूबसूरत किताबों से भी प्यारे बहुत हैं।।

कैसे छोड़ दूँ, मैं, तुम्हें  राहों में चलते-चलते अकेले कहीं भी।

तुम्हें मंज़िल तक ले जाने की, किसी ने दी जिम्मेदारी बहुत है।।

कलियों का दामन बात रहा है कि, खिलने वाले फूल बहुत हैं।

बागान की हवाओं के झौंकों में, उनकी खुशबू भरी बहुत है।।

“मन” ने उन्हें पाने की जिद्द को ठान लिया है, बहुत ही शिद्दत से।

दोस्त,आसाँ नहीं राह इश्क़ की, इस पर भी मारा-मारी बहुत है।।

©डॉ. मनोज कुमार “मन”

कविता और कहानी