प्यासे पंछी

प्यासे पंछी

***प्यासे पंछी***

वो भी तो एक ज़माना होता था
घर में हमारा चहचहाना होता था
अन्न के दाने और जल भी जब
हमारे लिए भी घर में होता था….

घर में घोंसला भी बन जाता था
तिनकों का महल सज जाता था
नन्हें नन्हें बच्चों के कलरव से
घर गुंजायमान हो जाता था…..

पर आह..!! मनुष्य ये क्या किया
वृक्ष काट के हमें बेघर-बार किया
अन्न तो देना दूर है बहुत हमें तो
जल तक के लिए तरसा दिया….

मासूम परिंदों को भी जीना भाता है
उन्मुक्त उड़ान को जी ललचाता है
हमसे आएंगी तुम्हारे जीवन में खुशियां
मानवता के कारण हमसे तुम्हारा नाता है..

ए मनुष्य कुछ सीख लो तुम हमसे भी
छीनने को तैयार दूजे की थाली से भी
हम बेजुबां एक दूजे की प्यास बुझाएं
कुछ तो तुम भी सोचो हमारे जैसे भी…..

        —“नीलोफ़र”—

कविता और कहानी