प्रश्न कुछ है जो हमें खलते रहे (ग़ज़ल)

प्रश्न कुछ है जो हमें खलते रहे (ग़ज़ल)

प्रश्न कुछ है जो हमें खलते रहे
ढूँढने हम सच को निकलते रहे …

देखकर दीवार को हैरान थे
जिसके अक्षर रोज बदलते रहे….

पड़ गये हैं पाँव में छाले मगर
लोग उम्मीदें लिए चलते रहे…

चाहते थे ख़त्म करना बेबशी
फिर भला तारीख़ क्यों टलते रहे..

न लगा अच्छा सही कहना ‘राही’
बस इसी से उम्रभर जलते रहे…

डाॅ. राजेन्द्र सिंह ‘राही’

कविता और कहानी