“बैंक मैनेजर का चरित्र”

“बैंक मैनेजर का चरित्र”

पंजाब नेशनल बैंक के चीफ मैनेजर बरियार साहब अनुशासन के मामले में कोई, किसी प्रकार से समझौता नही कर सकते थे या नहीं करते थे।अनुशासन के पक्के होने के कारण पूरे राज्य के सभी बैंक के लोग(कर्मी)उन्हें जानते थे।किसी भी शाखा में पदस्थापना होने पर उनके योगदान करने से पूर्व ही उस बैंक के सभी पदधिकारी एवम कर्मी पहले ही सतर्क हो जाते थे।

       बरियार साहब का स्थान्तरण बेतिया जिला मेन ब्रांच(मुख्य शाखा) में हो गया।बारह  सितम्बर को उन्हें योगदान देना था।उनके अनुशासन एवम समय के पाबंद होने की सूचना सबको किसी न किसी माध्यम से मिल  गयी थी।

       ठीक  साढ़े नौ बजे वो ब्रांच पहुंच गए।आते ही अपने चैंबर गए।चैंबर पूर्व से ही साफ सुथरा मिला। चैंबर रूमफ्रेसर से सुगंधित था।

घँटी बजाकर आदेशपाल को बुलया पुनः सहायक प्रबंधक को बुलाकर योगदान से सम्बंधित प्रक्रिया पूरी की। इतना करते करते

सावा दस बज गया।सहायक प्रबंधक के साथ में हॉल में पहुंचे।अभी एक-दो ग्राहक ही बैंक आये थे।

      उन्होंने सभी अधीनस्थ पदाधिकारी एवम कर्मचारियों को अपने कार्य कलाप के सम्बंध में बता दिया तथा प्रेम से समझा दिया कि पहले जैसे भी रहते थे या कार्य करते थे उससे उनको कोई सरोकार नहीं,परंतु आज दिन से किसी प्रकार की शिकायत नहीं मिलनी चाहिये।उसी समय राजन सिंह प्रबंधक महोदय सेआंख बचाते हुए अपनी सीट पर जा रहा था। बरियार साहब की तेज नजर से वो बच नहीं पाए।बैरियर साहब ने उन्हें बुलाया और सचेत किया।साथ ही बोले “जब वेतन आप पूरा लेते हैं तो बैंक को भी अपने कार्य से संतुष्ट रखेंऔर समय से बैंक आयें।

       बरियार साहब ने दो चार दिन में ही शाखा का रूप रेखा बदल दिया।जिस भी टेबुल की जो जरूरतें थीं सभी अद्यतन कर दिए। शाखा में हर जगह की निगरानी की जा सके साथ ही मुख्य दरवाजे (गेट) से कौन आ-जा रहा है इस पर भी उनकी पैनी नजर रहे, इसके लिए सी सी टी वी कैमरा अपडेट करा दिए।अब बैठे-बैठे ही अपने चैम्बर से हर जगह के कार्य की निगरानी आसानी से कर लेते थे।

       एक दिन उन्होंने  जिस टेबल से किसानों के लोन की प्रक्रिया की जाती थी वहाँ काफी भीड़ देखा। वो अपने टेबुल से उठकर वहां पहुँच गए।

              उन्होंने देखा किसानों के साथ कुछ दलाल भी है।जो बैंक की कुर्सी हथियाकर कागजी कारबार कर रहा है और बैंक कर्मचारी बगल के टेबल पर बैठ दांत खिसोर रहा है। इन्हें(बरियार साहब को) देखते ही कर्मचारी उठ खड़ा हो गया तो वहां उपस्थित सभी खड़े हो गए।किसानों के अलावा जो भी अन्य ब्यक्ति थे उन सभी को सख्ती से परिसर के बाहर करवाये और दूसरे दिन से वो लोग कभी दिखाई न दें। धमकी के लहजों में उन्होंने उक्त कर्मचारी को भी समझा दिया।

  पुनः बैंक के सभी कर्मचारियों को कड़ी हिदायत दी।उस दिन से बैंक के सभी कर्मचारी और भी सतर्क हो गए।बैंक में ग्राहकों का सारा काम आसानी से होने लगा था।प्रत्येक काउन्टर पर

उस काउंटर से निपटाने वाले कार्यो का बोर्ड लगा दिया गया जिस कारण ग्राहक को बौखना नहीं पड़े।सम्बन्धित काम के लिए उसी खिड़की पर जायें और काम हो जाय। ग्राहक काफी खुश और सन्तुष्ट रहने लगे।

        वहीं कुछ कर्मचारी भीतर से  असन्तुष्ट भी थे।ये वैसे कर्मचारी थे जो मनमानी सुविधा का उपभोग न कर पाते थे।

           एक दो महीने में ही ग्राहकों के बीच बारियार साहब गुणगान होने लगा और बैंक के पदाधिकारी एवम कर्मचारी उन्हें कठोर दिल इंसान समझने लगे थे चूंकि अपने कार्य मे शिथिल कर्मचारी से बहुत ही सख्ती से पेश आते थे।

        चार दिसंबर का दिन था।कड़ाके की ठंड थी।ग्यारह बजे तक कुहासा पूरी तरह छँटा न था बरियार साहब ने अपने चैम्बर से ही देखा करीब नब्बे-वेरानबे वर्ष का एक बूढ़ा गर्म कपड़े से पूर्ण रूप से अपने बदन को ढके एक दूसरे उम्रदराज के साथ बैंक की सीढ़ियां टोह टोह कर चढ़ रहा था।उसकी लाठी तथा उम्रदराज का सहारा भी उनको सहज नहीं कर पा रहा था। बरियार साहब अपने चैम्बर से लगभग दौड़ते हुए आये।उन्होंनेअपना सहारा देकर इज्जत से दोनो को हॉल में लगे सोफे पर बैठाया।तुरंत उनके लिए व्हील चेयर की व्यवस्था की।उन्हें खुद से खड़े रहकर पानी एवं चाय पिलाये।पुनः उनसे बैंक आने का कारण पूछा।

उन्होंने बताया “दोनो पिता-पुत्र हैं और दोनो  पेंशनधारी हैं।इसी बैंक से उन्हें पेंशन मिलता है। पिछले महीने लाइफ प्रमाणपत्र नहीं दे पाए थे।बेटे ने बताया इसी कारण पिताजी को लेकर आना पड़ा।”।         बरियार साहब दस मिनट में ही उनका सारा काम खुद से कर रोड तक व्हील चेयर पर बिठाकर विदा किये।

         उसी दिन उन्होंने आदेश निकाला बैंक के अंदर जो भी बुढ़ा,लाचार अथवा  विकलांग ग्राहक बैंक में आये तो सम्बन्धित बैंककर्मी उनके पास खुद जाकर उनकी समस्या का हल करेंगे।उसी दिन से बरीय नागरिक के लिए एक अलग से खिड़की खुल गया।

 उसके बाद के बाद से बैंक के सभी पदाधिकारी एवम कर्मचारी बड़ी श्रद्धा एवम मानवता भरी आदर की निगाहों से बरियार साहब को देखने लगे।

      नन्हें,10.10.20

      भागलपुर।

कविता और कहानी