मध्यमवर्गीय

मध्यमवर्गीय

जब जब भी तुम्हें ये लगने लगे मैं तुम्हारे करीब हूँ

बात बतला दूँ, इश़्क तो धनवान है मैं बहुत गरीब हूँ ।

दुनिया घुमाने की ख़्वाहिश पूरी नहीं कर सकता हूँ

अटूट वादा कर पूरी ज़िन्दगी बाहों में भर सकता हूँ ।

तुम्हारे हर छोटे बड़े फैसले में जरूर अपनी राय दूँगा

सुबह अलसा कर तुम उठना, बनाकर तुम्हें चाय मैं दूँगा ।

खाना तो नहीं बनाना आता पर सब्ज़ी मैं काट लूँगा

तुम्हारी छोटी मुस्कान के लिए हर दुःख मैं छाँट लूँगा ।

तुम खाना बनाना रसोईघर में हमेशा साथ मैं रहूँगा

तुम्हारी बकबक सुन कर अपनी हर बात मैं कहूँगा ।

छुट्टी वाले दिन हम दोनों बाहर कहीं घूमने जायेंगे

सिनेमा देखेंगे तुम्हारी पसंद की कुल्फ़ी भी खायेंगे ।

रात को मेरे कंधे पर ही सर रख कर तुम सो जाना

हर सुख दुःख सांझा करेंगे तुम ख़्वाबों में खो जाना ।

“मध्यमवर्गीय” हूँ पर हर ख़ुशी देने का इरादा रखता हूँ

धन दौलत नहीं ख़ूब मोहब्बत देने का वादा करता हूँ ।

प्रफुल्ल सिंह (बेचैन कलम)

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

कविता और कहानी