“मां का फैसला”

“मां का फैसला”

मां को सोया जान कर बड़ी बहू नीनू ने अपने पति कपिल  समझाते हुए कहा अजी सुनते हो । आज निखिल ( छोटे देवर) का फोन आया था मां के पास अपने साथ रहने की बात कर रहा था।

लेकिन आप मां को जाने मत देना जी ,समझ रहे हो ना क्या कह रही हूं?

निखिल की नजर मां के उस मकान पर है जो पिताजी  वसीयत में उन के नाम कर गए हैं।

वह मां को बहला फुसलाकर मकान अपने नाम करवाना चाहता है काम पूरा होते ही मां को हमारे पास वापस भेज देगा। हां जनता हूं तुम चिंता न करो कल फिर बात करता हूं मां से।

मां दूसरे कमरे में बहू की बातें सुनकर शांत लेटी सोच रही थीं , चालाकी तो तुम दोनों की समझ आती है मुझे।

तुम भी तो यही चाहती हो,तभी घुमाफिरा कर थोड़े थोड़े दिनों में तंगी का बहाना कर मकान बेच कर पैसा हमें देदो का गाना सुनाते रहते हो।

मै बेवकूफ़ नहीं हूं।

हां दुख होता है अपनी सन्तान को मां के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए देख कर।

जानती हूं जिस दिन तुम्हारे बाबू जी का मकान बेच दिया मेरी किंजा रही सारी सेवा कदर हवा हो जायेगी। क्या पता घर से ही निकाल दो मुझे।

मां सोचते सोचते रो रही  थी।

तभी कुछ सोचते हुए एक निश्चय के साथ अपने पति के फोटो की ओर देखते हुए हाथ जोड़ कर कहने लगी । सुनो जी मुझे माफ़ कर देना पर मेरे पास भी और कोई रास्ता नहीं है।

जब तक जीवन है मुझे स्वार्थी होना ही होगा । मै संपत्ति से मोह ना होते हुए भी अपने जीते जी किसी को नहीं देने वाली।  दिल से नहीं दिमाग से काम लेना होगा । झांसा दे कर दोनों बेटों को खुश रखना ही होगा ।

 आज की सच्चाई है यही है जब तक पैसा है तभी तक रिश्ते नाते, मान सम्मान है।

मां अब चैन से सो रही थी।

मंगला रस्तोगी

दिल्ली।

कविता और कहानी