मातृभूमि

मातृभूमि

देखो मदान्ध हो ड्रैगन ने,

फिर हमको ललकारा है।

स्वर्गादपि गरीयसी इस मातृभूमि,

का कण कण हमको प्यारा है।।

आत्मनिर्भर हो भारत अपना ,

अखंड राष्ट्र का नारा है ।

चीनियों का बहिष्कार हो ,

राष्ट्र धर्म हमारा है ।।

मानसरोवर का खौलता जल ,

हिम बना धधकता अँगारा है ।

बच्चे- बच्चे का अंग फड़कता,

देशभक्ति का जज्बा उमड़ता ।।

शांति सत्य के समर्थक,

जन्मजात अहिंसा पुजारी हैं ।

पर कायर ना समझना मूर्ख,

हम ही कृष्ण अवतारी हैं ।।

चुनौती देता दुर्दांत आततायी

क्या भूल गया इतिहास अन्यायी।

युद्ध का आमंत्रण देता ,

क्या प्रभुता बहुत गरूर छाई ?

नहीं चुप रहेंगे आज,

भारत भाल पहनेगा ताज ।

महाकाल का भैरव नाद,

खड्ग, गदा बजाते साज।।

ये मानवता के शत्रु चीनी,

यदि हम से टकराएँगे ,

इस बार वसुधा से अपनी ,

पहचान पूरी मिटायेंगे।।

प्रलयकाल का सागर तूफानी जगे,

शिवालय में डमरूधारी जगे ।

क्रांति की नाद रणभेरी बजे ,

झंकृत वीणा, चंडी, काली जगे।।

भारत सिरमौर रहे, संपूर्ण वसुधा का,

भाल ऊँचा इसका ,स्वाभिमानी रहे ।

पूरे ब्रह्मांड में वंदना होवें सर्वत्र ,

इसका सानी विश्व में ना रहे अन्यत्र।।

अंशु प्रिया अग्रवाल

मस्कट ओमान

कविता और कहानी