“मानव धर्म” :

“मानव धर्म” :

अर्चना त्यागी (जोधपुर)

दीपोत्सव के बाद शाम के समय घूमने निकला तो सायकिल रिपेयर की दुकान खुली दिखी। हमारी कॉलोनी में एकमात्र दुकान थी। पिछले बीस दिनों से  बन्द पड़ी थी। पता चला था कि दुकान के मालिक मुकुंद जी, की कोराना महामारी ने जान ले ली थी और परिवार क्वारेंटाइन था। उनका घर शहर से थोडा दूर  दूसरी कॉलोनी में था।

दुकान खुली देखकर मैं उसी और चल दिया। मन में एक जिज्ञासा थी कि पता करूं कि क्या हो गया था उनको? उनकी उम्र भी इतनी नहीं थी कि बीमारी की मार न झेल पाएं। फिर परिवार के सामने संवेदना व्यक्त करने से मन को तसल्ली हो जाती। आगे क्या होगा उनके साथ, यह भी जानना चाहता था। दुकान के पास पहुंचा तो बाहर कोई नज़र नहीं आया। अंदर झांकने पर उनका बेटा नज़र आया। वह कोई किताब पढ़ रहा था। मुझे देखकर उसने किताब बंद कर दी और खड़े होकर अभिवादन किया। ” अंकल सायकिल ठीक करनी है?” उसने पूछा। ” नहीं बेटा, आज दुकान खुली देखी तो पता करने चला आया,  मुकुंद भाई के बारे मे।” मेरी बात सुनकर उसकी आंखों में पानी के साथ साथ क्रोध भी मुझे नज़र आ रहा था। ” पापा को कोराना ने नहीं, डॉक्टर ने मारा है अंकल।” उसकी बात सुनकर मैं सकते में आ गया। ” क्या कह रहे हो बेटा?” अनायास मेरे मुंह से निकल गया। ” सही कह रहा हूं अंकल। मैं पापा के साथ ही था। उन्हें अस्थमा की बीमारी थी। कोरोना ना हो जाए इसीलिए डॉक्टर की सलाह लेने गए थे। नर्स ने उन्हें एक इंजेक्शन लगा दिया। उनकी तबीयत बिगड़ने लगी तो भर्ती कर लिया। मुझे घर भेज दिया। पूरे परिवार को क्वारंटाइन कर दिया। उसी रात वो चल बसे। क्रियाक्रम भी अस्पताल वालों ने ही कर दिया। एक पुलिस वाला दिन रात घर के बाहर बैठा रहता था। मैंने उसे भी बताया लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुनी।” उसकी बात सुनकर मुझे आश्चर्य ही नहीं, दुख भी हुआ। मैंने बात बदलते हुए पूछा ” तुम तो अभी पढ़ाई कर रहे हो, फिर दुकान कैसे चला पाओगे ?” उसने उत्तर पहले से सोच रखा था,” अभी तो स्कूल खुले ही नहीं है अंकल। दुकान में बैठकर पढ़ता रहता हूं। बाद में मम्मी और छोटा भाई मेरे पीछे से दुकान पर आ जाएंगे। छोटा भाई भी काम सीख रहा है।” उसके सकारात्मक उत्तर से मन प्रसन्न तो था लेकिन उसकी मजबूरी के बारे मे सोचकर उतना ही दुखी भी था। अगर उसकी बात में सच्चाई थी तो क्या अस्पताल और उस डॉक्टर तथा नर्स की कोई जवाबदेही नहीं है। हमारे देश में चिकत्सा व्यवस्था इतनी लचर क्यूं है ? क्या स्थानीय प्रशासन के लोग इन घटनाओं की जानकारी नहीं रखते ? कोरोना काल में भगवान का स्वरूप कहे जाने वाले डॉक्टर का यह यमराज सा चेहरा क्यूं है ? बिना कुछ कहे मैं वापिस मुड़ने लगा तो गुड्डू ने पीछे से आवाज़ लगाई,” थैंक्यू अंकल, आप मिलने आए। मैं पढ़ाई नहीं छोडूंगा। बहुत बड़ा डॉक्टर  बनूंगा। बीमारी पहचानकर दवाई दूंगा।” उसके दोनों कन्धों पर हाथ रखकर मैंने उसे होंसला दिया। उसके शब्दों ने मेरे भीतर के इंसान को जगा दिया था। मैं निश्चय कर चुका था कि एक प्रार्थना पत्र पर कॉलोनी के सभी लोगों के हस्ताक्षर लेकर, जिलाधीश महोदय के पास घटना का विवरण अवश्य प्रेषित करूंगा। मैं मानव धर्म निभाऊंगा।

मौलिक एवं स्वरचित।

कविता और कहानी