यथा सत्य

यथा सत्य

चाहे जो हो सदी है प्रमाणित यही,

आस्तीनों में ही साँप पलते रहे।

खून भी दूध भी सब पिया है मगर,

फिर भी वो तो जहर ही उगलते रहे।।

मंथरा थी कुटिल, कैकेई कोमल हृदय,

फिर भरा है जहर, कैकेई बस में हुई।

राम को वन, भरत को सिंहासन मिले,

वो अयोध्या की ही राजमाता बनी।।

खो दिया है पति, और प्रतिष्ठा गई,

इस तरह से ही अजगर निगलते रहे।।

बहना रावण की थी, भाव था बदले का,

शत्रु हैं दोनों वनवासी राम और लखन।

सोने की लंका की है उन्हें चाहना,

नाक काटी मेरी तुमसे रखते जलन।।

सोने का मृग दिखा के सीता हरी,

और पापी कुटिल स्वांग रचते रहे।।

राम के कान सुग्रीम भरता रहा,

युद्ध हो सामने आधा बल हो हरण।

सीता को लाने में, मैं करूँगा मदद,

मारो बाली को छिपकर तो होगा मरन।।

वेदों पर जो किया मैंने चिंतन मनन।

भाई के भाई ही प्राण हरते रहे।।

है रावण की नाभि में अमृत भरा,

राम को ही विभीषण बताने लगा।

भेदी घर का ही लंका को ढाने लगा,

बाण मार है नाभि में रावण मरा।।

इंसां कलयुग कैसे रहे निष्कपट।

भाई को भाई द्वापर में छलते रहे।।

श्रीमती वंदना सोनी “विनम्र”

फकीरचन्द अखाड़ा

जबलपुर मप्र

कविता और कहानी