ये भी एक रास्ता

ये भी एक रास्ता

अनिल बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहा है।आखिर आगे ढींगू मंदिर की खड़ी चढ़ाई है, पहुंचना भी बौद्घ गोंपा तक है।पिता जी ने किसी जमाने में यहां शिमला में सस्ते में ज़मीन ले ली थी फिर गांव छोड़ यहीं के हो कर रह गए  थे। अनिल अब नौकरी के सिलसिले में चंडीगढ़ ज़्यादा रहता है चढ़ाई की आदत नहीं रही, बुरी तरह हांफ़ रहा है। एक तो पांच पांच भारी थैले ऊपर से ये चढ़ाई। हर पांच दस सीढ़ियों के बाद रुक जाता है।

हाथों में थैले बदलता है। पीठ वाला सही करता है नज़रों से बचा हुआ रास्ता मापता है। इत्ते में बगल से कोई गुज़रा पसीने की बू का एक झोंका नाक में घुसा चला आया देखता क्या है एक खान भाई दो सिलेंडर पीठ पे बांधे सधी चाल से चढ़ाई चढ़ रहा है। बिना हांफे।अनिल को हौसला बंधा। समान उठा खान की चाल की नकल करता चल पड़ा। थोड़ा ही चला की फोन बज उठा उफ्फ इस समय फोन… देखा तो चंडीगढ़ से बीवी का था नहीं उठाया तो आसमान टूट पड़ेगा और वो चाहेगा धरती फट जाए और वो इस में समा जाए।जब जब काम के वक्त बीवी की कॉल आती ऐसी बातें उस के मन में हमेशा आती, फिर एक बार आसमान को देख एक बार धरती को ताक कोई सूराख ना पा आखिर वो फोन उठा ही लेता। इस बार भी किसी तरह हाथों में झोले एडजस्ट कर फोन उठा ही लिया।

जैसे तैसे कान और गर्दन के बीच

फोन चिपका कर के दम समेटते हुए बोला अभी मैं बहुत सा सामान उठाए हूं , आटा दाल चावल चीनी मां पापा की दवाइयां भी हैं… दूसरी तरफ से चिर परिचित तेज तर्रार आवाज़ आना शुरू हुई और आती ही चली गई…काफी देर परेशान सा दूसरी तरफ का

कर्कश लहज़ा कानों से निगलता हुआ अनिल

बेचारगी में बोल उठा

तुम विश्वास क्यों नहीं करतीं, मेरी बात का…

ओहो नहीं कर रहा मां-बाप के नाम पर ऐय्याशी…

आख़िर तुम मानती क्यों नहीं।

अनिल जो बड़ी हिम्मत से टुकड़ों-टुकड़ों में पहाड़ चढ़ रहा था, अचानक टूट सा गया और झोले किनारे रख सीढ़ीनुमा रास्ते पर बैठ ही गया। इतने में खान भाई की आवाज़ आई बाबू जी संभल कर, बंदर आप का सामान ले जाएगा । खान, सिलेंडर लोगों के घर पहुंचा कर वापस आ रहा था।

अनिल को होश आया। एक मन हुआ खान को सामान घर ले जाने के लिए कहे। फिर हिम्मत जुटाई। पहाड़ी है वो पहाड़ से कैसा हारना।

पहाड़ उस का घर है और हिम्मत भी पहाड़ ही…ढींगू मां को याद कर वो बस एक बार और सब समेट चल ही पड़ा…

क्या यही जीवन कुछ और हो सकता था??????

अनिल सोच ही तो रहा था… उसी समय में उसी शहर में एक और जीवन चल रहा था…

लगभग वही कद काठी नाम भी वही जी हां

अनिल। दृश्य मगर शिमला के मॉल रोड का है। प्रेमिका का हाथ पकड़े जनाब चले जा रहे हैं के इतने में फोन बजता है। कॉल पर कौन है देखते ही अनिल का मुंह बन जाता है।वही अंदाज़ फोन का कान और गरदन  के बीच फसा, लगभग धमकाने वाले लहज़े में कॉल उठाते ही हावी हो जाता है। बड़ी बदतमीज हो इतनी बार बताने पर भी कभी भी कॉल कर के परेशान करती हो, कितनी बार कहा तुम को काम के वक्त कॉल मत किया करो अब क्या बार बार बताना पड़ेगा बिजनेस दौरे पे दिल्ली आया हूं।यहां मैं पैंतालीस डिग्री की धूप में झुलस कर काम करवा रहा हूं और तुम को जासूसी सूझ रही है। जब वापस आना होगा एक दिन पहले बता दूंगा । दूसरी तरफ से दबी सहमी सी आवाज़ आती है। माफ करना यहां पापा की तबीयत अचानक बिगड़ गई है मगर कोई बात नहीं आप अपना खयाल रखना मैं यहां घर बाहर सब संभाल लूंगी। आप यहां की फिक्र बिल्कुल ना करना। चंडीगढ़ के उस मैदानी क्षेत्र में, अंदर ही अंदर वो स्त्री बहुत ऊंचा पहाड़ चढ़ने की हिम्मत जुटा रही थी। ढींगू मां उसे हिम्मत दे।

जीवन किसी एक का

संघर्षरत रहे आजीवन

ऐसा ज़रूरी सा होता है क्या

ज़िन्दगी जाना है बहुत दूर…

कुछ तो रहम खा

बेहतर मेरे जीवन को

पसंदीदा कोई राह दिखा।

निकाल बाहर कर इसे

किसी एक का हो के कब रहा,

ऐ ज़िन्दगी, सुन मेरी बात

ये संघर्ष भी तो बेईमान है बड़ा।

                          दीप्ति सारस्वत।

कविता और कहानी