राखी के दोहे

राखी के दोहे

धागा यद्यपि सूत का,पर दृढ़ औ’ मजबूत ।

बहिन-सहोदर नेह का,बन जाता जो दूत ।।

पर्वों का यह पर्व है,जिसमें रक्षा,नेह ।

अंतर्मन उल्लास में,होती पुलकित देह ।।

धागा बस इक माध्यम,पलता है विश्वास ।

जिसमें रहती निष्कपट,मीठी-सी इक आस ।।

बचपन की यादें लिये,बिखरे मंगल गान ।

सम्बंधों में है सजा,संस्कार का मान ।।

रिश्ते वो लगते मधुर,जिनमें हो अनुराग ।

रच देते अमरत्व को,ऐसे मधुरिम राग ।।

आध्यात्ममय पर्व हर,देता पावन भाव ।

नीति,सत्य औ’ न्याय का,फिर ना कभीअभाव ।।

भाई हरदम है खड़ा,करने को बलिदान ।

बहन रहे उद्यत सदा,कायम करने मान ।।

राखी तो उत्साह है,राखी है अरमान ।

राखी की शुचिता सदा,पाती है यशगान ।।

तब राखी अनमोल है,जब रक्षित हो आन ।

राखी आविष्कार है,राखी अनुसंधान ।।

“नीलम” को राखी लगे,सचमुच नवल उमंग ।

कर-धागा देता सदा,जीवन को नव रंग ।।

                      – नीलम खरे

कविता और कहानी