लघुकथा  “षड्यंत्र”

लघुकथा “षड्यंत्र”

जगदीश बाबू अपनी पत्नी सुधा के साथ स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर एक पर तेजी से हड़बड़ाते हुए पहुँचे।अभी सात बजकर पच्चीस हो रहा था।7.40 में उनकी गाड़ी थी।वो दोनों प्लेटफार्म पर बने एक बेंच पर स्थान देखकर बैठ गए।उसी समय रेलवे से सूचना प्रसारित हुई “पूरब को जाने वाली गाड़ी विलम्ब से चल रही है।अभी कहाँ पर है इसकी कोई सूचना नही है।”

     पुनः 8.30 बजे सूचना प्रसारित हुई पूरब को जाने वाली 3256 no की गया/हावड़ा ट्रेन जमालपुर आ चुकी है।जल्द ही आने की सूचना दी जाएगी।

     जगदीश बाबू ने सुधा से कहा”अभी ट्रेन आने में एक घंटा और लगेगा क्यों न हमलोग खाना खा लें।जबतक ट्रेन भी आ जायेगी।”

  सुधा ने नजर से हामी भर दी और जगह बना कर खाना निकलने के लिये तैयारी करने लगी।जैसे ही खाने का झोला से खाना निकाली, सामने पंद्रह-सोलह वर्ष एक गरीब सा लड़का उनकी हर हरकतों को एकटक कातर नजर से देख रहा था। बगल में उसके एक कुत्ता भी जीभ लपलपाता हुआ बैठ गया और खाना की ओर ही देखने लगा।ऐसा लगा मानो दोनो ने पहले से तय कर आया हो।

     सुधाजी कनखियों से दोनों को देख कर जगदीश बाबू की ओर प्रश्न की नजर देखा तो जगदीश  बाबू बोले”हम लोग खा लेते तो उन्हें दे देंगे।”और दोनों उनकी ओर देखे बिना खाने लगे।

       खाना खाने के बाद पहले दो रोटी कुत्ता को दिए। कुत्ता तो तुरन्त दोनो रोटी अपने दाँत तले दबाया और वंहा से चलता बना जैसे कोई आकर उसके हिस्से से ले न ले।

       पुनः सुधाजी ने एक पत्तल में श्रधा से चार रोटियां, सब्जी,एक मिठाई सजाकर उस लड़के को बड़े प्यार से देते हुए बोली लो बेटा खाओ।

    तभी गाड़ी के सम्बंध प्रसारण हुआ” यात्रीगण ध्यान दें,3256 no की पूरब की जानेवाली गाड़ी सुल्तानगंज से खुल चुकी है प्लेटफार्म no एक पर आएगी।ये सुनकर सुधाजी और पति जगदीश जी अपना सामान समेटने में लग गये।

         उसी समय देखे जो लड़का उनसे खाना लिया था एकाएक जमीन पर चित लेटकर हाँथ-पाँव छितरा रहा लोट-पोट रहा है और उसके मुँह से झाग जैसा निकल रहा है।अब तो दोनों का मुँह सूख गया।दोनों एक दूसरे को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगे।

      तभी प्रसारण हुआ “यात्रीगण ध्यान दे 3256 no की पूरब की ओर जाने वाली गाड़ी एक नम्बर प्लेटफार्म पर आ रही है।जिन यात्रियों को पूरब की ओर जाना हो प्लेटफॉर्म no एक पर आ जायें।”

    ये दोनों लड़के से नजर बचते हुए अपना सामान लेकर तेजी से निकलना चाह रहे थे तभी एक हट्टा-कट्ठा 30-35 वर्ष का मुसटंड से आदमी आकर इन्हें  रोक लिया और बोला “इसे जहर वाला खाना देकर कहाँ जा रहे हैं पहले इसके इलाज के लिए पांच हजार रुपये दीजिये नही तो पुलिस को बुलाता हूँ।दोनो ने कहा “हमलोग भी तो वही खाना खायें हैं जो उसको दिए।पहले तो हम ही लोग खाये फिर गरीब जानकर उसे दिया और वही रोटी तो एक कुत्ता को भी दिया है।”

   “अब कुत्ता खोजने कहाँ जाए साब।आप पैसे दे नहीं तो पुलिस को बुलाना पड़ेगा।”आवाज उसकी तेज हो गयी। इसी बीच गाड़ी भी प्लेटफार्म पर आने लगी ।

 जगदीश बाबू पत्नी से बोले “तुम स्लीपर एस-2 की तरफ बढ़ो मैं तुरंत आता हूँ।”पर पत्नि रुकी रही।

 वह आदमी बोला “आप पैसे नही देंगे तो गाड़ी छोड़नी पड़ेगी।चलिये पांच हजार नही तो दो हजार ही दे दीजिए।बेचारा गरीब लड़का है रेलवे अस्पताल में ही इलाज करा लेगा।”

     “बोले ठीक है पहले मुझे अपनी सीट तक तो चलने दो।” सुधाजी प्रार्थना के लहजे में बोली।

   वह लड़का जो छटपटा रहा था एकटक से इन्ही लोगों को देख रहा था।मुँह से झाग आना कम हो गया था।वह मुस्टंड सा आदमी जगदीश बाबू को एस-2 के लगने का स्थान बताकर उन्ही के साथ प्लेटफार्म पर चलने लगा। जगदीश बाबू अपनी पत्नी के साथ जगह पर बैठ गए ।सामने वह पहलवान खड़ा बोल रहा था”जल्दी कीजिये साब नही तो उतार कर ले जाऊंगा।”

      गाड़ी सिटी देने लगी थी। उन्होंने देखा खिड़की के पास थोड़ी दूर में एक पुलिस खड़ी है।गाड़ी भी खुलने को थी।

   जगदीश बाबु “आ बैल मुझे मार”सीरियल याद करने लगे।वे पेशोपेश में पड़ कर लाचारी में उसे एक हजार रुपया दिए और बोले इतना ही दे सकता हूँ।वह आदमी पैसे लिए और उतर गया।गाड़ी धीरे से प्लेटफार्म पर सरकने लगी।उन्होंने खिड़की से देखा वह आदमी, पुलिस और वह लड़का तीनो एक जगह खड़े थे। गाड़ी निकल गयी।जगदीश बाबू सुधाजी से बोले “कान पकड़े अब सफर में किसी गरीब पर दया नहीं करनी है।किसी को कुछ खाने का सामान तो बिल्कुल ही नहीं देना चाहिए। कितना बड़ा षडयंत्र अब तक नही देखा था।”

राथेन्द्र विष्णु ‘नन्हे’ ,11.1.20

कविता और कहानी