शक्ति स्वरूप नारी

शक्ति स्वरूप नारी

शक्ति स्वरूप नारी———————–

न क्रुंदन करती ना ही चित्कार करती

कभी न किसी को  वो तिरस्कार करती।
रूप बदलकर आती, सभी अवस्थाओ में वो तो सिर्फ हृदय से, हमें प्यार करती।
शक्ति की प्रगाढ़ता, जीवन की मौलिकताआधार बनकर जीवन में वास करती।
सच्चाई की मिशाल, विश्वास में विशालछल कपट भी, मुस्कुरा के टाला करती।
वो काया कितनी महान, जिसमें सारे गुणपर मानवता, इनका दिल तोड़ा करती।
बड़ा शर्मसार होना पड़ता देश को जब दरिंदगी भी यहाँ निवास करती।
न्याय के लिए सच और झूठ तौला जातावेतुके तर्क से इन्हें और टाला करती।
शक्ति की धरोहर की यह पीड़ा जब हद से पार हुआ फांसी पर लटका दोसंसद के दोनों सदनों से पास हुआ।
धरती हो या अम्बर जुल्म नही चलेगानारी शक्ति के आगे फांसी नहीं टलेगा।
                               आशुतोष                            पटना बिहार

कविता और कहानी