” सेवाराम”

” सेवाराम”

अर्चना त्यागी (जोधपुर , राजस्थान )

अपने गांव गए हुए दो साल से अधिक समय हो चुका था। काम की व्यस्तता के चलते जा ही नहीं पा रहा था। रह रह कर गांव की पगडंडी जैसे पुकार रही थी मुझे। आम के बाग, खेत खलिहान सभी जैसे आवाज लगा रहे थे। घर से बहुत दूर नौकरी करते हुए कई साल हो चुके थे। लेकिन इतना लंबा समय, अपने गांव से मिले हुए पहली बार हुआ था। गांव की हर चीज याद आने लगी थी। वो छोटी सी दुकान। कोई मेहमान घर पर आता तो पैसे लेकर दुकान पर पहुंच जाते। पेंट की जेब में डालकर लाते, बिस्कुट और नमकीन। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले सुरीले लोकगीत। चमक दमक से नहीं, मन से मनाए जाने वाले तीज त्यौहार। इन सबसे बढ़कर अपनापन। पगडंडी पर पहुंचते ही राम राम शुरू हो जाती। घर पहुंचे नहीं कि मिलने के लिए सब अा जाते अपना काम धंधा छोड़कर। घर वालों को पीछे छोड़ देते मेरे गांव वाले आवभगत में। मेहमान सबका मेहमान होता।

बहुत कुछ पाया जीवन में लेकिन वो अपनापन पीछे छूट गया। वो प्यार, दुलार और सहयोग किसी भी मॉल में नहीं मिला। क्योंकि वो मेरे गांव के लोगों की धरोहर है। बाजार में बिकने वाली कोई चीज नहीं। आखिरकार मैंने अपने जाने का बहाना ढूंढ ही लिया। एक सेमिनार थी मेरे गांव के पास शहर में। अपना नाम उसमे दिया और मैं उड़ चला अपने गांव की ओर। हवाई जहाज के साथ साथ मेरे मन को भी पंख लग गए थे। जैसे ही शहर पहुंचा अपने गांव की बस पकड़ ली। गांव की पगडंडी पर पहुंचते पहुंचते शाम हो गई। पगडंडी पर मैं ऐसे ही चल रहा था जैसे कोई हाथी मस्ती में झूमता है जंगल में। पगडंडी पर काफी दूर तक पैदल ही चलना पड़ता था। कुछ लोग और भी दिख रहे थे। वो मुझे पहचानते नहीं थे इसलिए मेरी और देखे बिना आगे बढ़ रहे थे।

मैं बात करना चाहता था। परन्तु उनमें से कोई ट्रैक्टर पर था, कोई स्कूटर पर तो कोई कोई मोटरसाइकिल पर। एक दो साइकिल पर भी जा रहे थे। मुझे देखकर खुशी हो रही थी कि मेरा गांव प्रगति कर गया है। साथ ही साथ आश्चर्य भी हो रहा था कि मुझे पैदल चलते देखकर किसी ने भी अपने साथ आने के लिए नहीं कहा। अपने वाहन पर नहीं बिठाया। आखिरकार मैंने खुद ही एक स्कूटर वाले को रोका। मुझे बिठाने के लिए कहा। उसने स्कूटर रोककर मुझे बिठा लिया। मैंने उसका नाम पूछा। उसने भी पूछा किसके घर जाना है। बातचीत आगे बढ़ाते हुए मैंने उसके घर में बड़े लोगों के नाम पूछे। उसने बताया वह सेवाराम का भतीजा है। सेवाराम, नाम सुनते ही मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट अा गई। कलयुग का श्रवण कुमार। यही परिचय उचित है सेवाराम का।

और बातचीत करने पर पता लगा कि दो महीने पहले सेवाराम इस दुनिया से चला गया है। एक धक्का सा लगा मुझे। तभी घर अा गया और मैं उदास मन से घर में दाखिल हो गया। मेरा सारा उत्साह सेवाराम के चले जाने की खबर से ठंडा पड़ गया। उसके घर की ओर देखे बिना ही मै घर के अंदर चला गया।

घर में सब मुझे देखकर हैरान थे। मेरे आने की खबर किसी को नहीं थी। नहाने के बाद खाना खाया और फिर सब आकर बैठ गए मेरे पास। बतियाने के लिए। शहरों में इतना समय ही नहीं होता किसी के पास। इतनी रुचि ही नहीं होती एक दूसरे के बारे में जानने की। सबने पत्नी और बच्चों के बारे में पूछा। परन्तु मेरा मन तो सेवाराम में ही अटका हुआ था।

मेरे पूछने से पहले ही सूचनाओं का आदान प्रदान आरंभ हो गया। छोटी बहन ने बताया कि मरने से पहले सेवाराम दो महीने तक बीमार रहा। लेकिन उसके घरवालों ने किसी अच्छे डॉक्टर को नहीं दिखाया। गांव के प्राथमिक चिकित्सालय के डॉक्टर को ही दिखाता था। दिखाने भी अकेला ही जाता था। उस हालत में भी पशुओं का चारा पानी भी वही करता था। मैंने दुःखी होकर मां से प्रश्न किया ” पर ऐसा क्यूं किया इन्होंने उसके साथ ?” मां भी उदास हो गई। फिर बोली ” बेटा सौतेली मां, सौतेला भाई और उसका परिवार। उनसे उम्मीद भी क्या कर सकते हैं।” मुझे बहुत दुख हुआ। सेवाराम का चेहरा आंखों के सामने अा गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है अपने परिवार के किसी सदस्य के साथ।

और वो भी उस इंसान के साथ जो अपने लिए कभी जिया ही नहीं। छोटी बहन को फिर से कुछ याद आया। ” एक और बात भैया, जमीन के कागजों पर भी दस्तखत करवाए उस बीमार आदमी से। लालची कहीं के।” मां ने उसे चुप रहने का इशारा किया। और बात को खत्म करना चाहा। ” बेटा कों गलत है, कोन सही है ? सब भगवान जानता है। वो सब देखता है चुपचाप और समय आने पर सज़ा भी देता है। उसकी अदालत में इंसाफ होता है। ” मां चुप हो गई परन्तु मेरा मन अशांत था। मैंने फिर एक प्रश्न किया। तब तक पिताजी भी आकर हमारे पास बैठ गए थे। “इन्होंने ऐसा किया क्यूं ? सेवाराम तो विवाहित नहीं था। उसकी कोई औलाद नहीं थी। जमीन तो इनको ही मिलनी थी। फिर भी अमानवीयता क्यूं दिखाई ? ” पिताजी मुस्कुराए और मेरी ओर देखकर बोले।

बेटा तुम पढ़ाई के कारण हमेशा घर से बाहर ही रहे हो इसलिए इन सब बातों से दूर रहे हो। सेवाराम के पिता ने अपनी जमीन दोनों बेटों के नाम कर दी थी। जिससे सेवाराम का अनादर न हो। उसी के लिए इतना नाटक किया उसके भाई ने। उसके जाने के बाद इन्हें कोई समस्या नहीं हो इसी कारण बीमारी की हालत में ही उससे हस्ताक्षर करवा लिए जमीन के कागजों पर।

अब मुझे सब समझ अा रहा था। सेवाराम के छोटे भाई और उसके परिवार से नफ़रत सी हो गई थी मुझे। क्या ऐसे भी लोग मेरे गांव में रहते हैं ? मन उद्विग्न था। मां ने फिर मुझे समझाया कि मुझे सेवाराम को लेकर इतना परेशान नहीं होना चाहिए। कोन सा अपने घर का सदस्य था। और फिर अब वो वापस लौट कर नहीं आने वाला है। सही मायने में तो इन लोगों से उसका पीछा छुड़ाकर अपने पास बुला लिया है भगवान ने।

” पिताजी सेवाराम तो पढ़ा लिखा था फिर उसने नौकरी क्यूं नहीं की ? उसके समय में तो पढ़े लिखे लोगों को आसानी से नौकरी मिल जाती थी।” मैं सब कुछ जानना चाहता था सेवाराम के बारे मे।” तुम सही कह रहे हो नरेंद्र। नौकरी उसे मिल जाती परन्तु खेती में उसके पिता का हाथ बंटाने वाला कोई नहीं था। उसका भाई तो उससे बहुत छोटा है। इसीलिए उसके पिता ने बारहवीं के बाद उसे खेती के काम में लगा लिया। उसका दुर्भाग्य ही था। बारहवीं में जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया था उसने। लेकिन उसके अनपढ़ बाप ने कुछ नहीं सोचा  उसके बारे में। घर से 16 किलोमीटर दूर रोज पैदल चलकर जाता था विद्यालय में। घर आकर खेती का काम देखता और रात में पढ़ाई करता। मां के देहांत के बाद वह भी अपने पिता को दुःखी नहीं करना चाहता था। इसलिए उसने पिता की बात मान ली।”

सुनकर और भी दुख हुआ मुझे। एक प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने सेवाभाव के कारण जीवनभर कष्ट में रहा। समय से पहले, अमानवीय व्यवहार के कारण उसका जीवन समाप्त हो गया। अभी भी एक और प्रश्न था जो मुझे बहुत परेशान कर रहा था। सेवाराम की शादी। क्या कारण रहा होगा जो एक सज्जन व्यक्ति विवाह के बंधन में नहीं बंध पाया। मेरे पूछने से पहले ही पिताजी ने बोलना शुरू कर दिया। ग्रहण में पैदा हुआ था सेवाराम। जिसके कारण उसके हाथ, पैर यहां तक कि मुंह भी सामान्य लोगों के जैसा नहीं था। कोई उसे देखता तो पहली बार में तो मजाक ही बनाता। उसका व्यवहार देखकर ही कोई उससे प्रभावित होता। पिताजी को बीच में रोककर इस बार मां बोली ” सबसे बड़ा कारण तो उसकी सौतेली मां ही थी। उसने कभी चाहा ही नहीं कि सेवाराम का भी अपना कोई परिवार हो। परिवार होता तो उसके बेटे को पिता का पूरा हिस्सा कैसे पाता। इसीलिए उसने सेवाराम की शादी नहीं होने दी।”

अब तुम सो जाओ नरेंद्र। सुबह जल्दी उठकर अपनी मीटिंग के लिए भी जाना है तुम्हे। कहकर पिताजी सोने चले गए। छोटी बहन पहले ही सो चुकी थी। मां भी लेट गई थी चारपाई पर। मेरा मन मस्तिष्क सेवाराम में उलझा था। फिर भी मैं चारपाई पर लेट गया। नींद आने की प्रतीक्षा करने लगा। सेवाराम कभी अपनी गैलरी में बैठा, किताब पढ़ते हुए मुझे याद आता। कभी पशुओं की सेवा करते हुए। कभी अपने पिता की सेवा करते हुए। जो अब मैंने सुना था उसके बारे में, उसका चित्र नहीं बना पाया मेरा अवचेतन मन। वो अभी भी नहीं मान रहा था कि इतना सज्जन व्यक्ति इस तरह निरादर करके एक दिन संसार से विदा कर दिया जाएगा। अपने पढ़ाई के दिनों में मै अक्सर घर की छत पर बैठकर पढ़ता था। वहां से सेवाराम किसी न किसी काम में लगे हुए दिखता रहता था। रात में काम खत्म करके लालटेन की रोशनी में किताब पढ़ते हुए उसका चेहरा मैं अपनी आंखों के सामने अब भी महसूस कर पा रहा था। सोचते सोचते कब नींद लगी पता नहीं चला।

सुबह मां ने जल्दी उठा दिया। शहर जाने वाली बस गांव से काफी दूर जाकर मिलती थी। मैं जल्दी जलदी तैयार होकर घर से निकला। दरवाजे तक पंहुचा तो देखा, सेवाराम का भतीजा स्कूटर लिए खड़ा था। मुझे देखकर उसने नमस्ते की। मैं उससे हुई बातें भूल गया था लेकिन उसको याद रहा कि मुझे जल्दी जाकर शहर के लिए बस पकड़नी थी। मुझे आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी। मन में उनके परिवार को लेकर नाराज़गी थी लेकिन जल्दी पंहुचना था। फिर उस लड़के के सेवाभाव को मै अपमानित नहीं करना चाहता था। इसलिए घर वालों से विदा लेकर मै स्कूटर पर उसके पीछे बैठ गया। आज उसका व्यवहार एक परिचित की भांति था। अपने विद्यालय के बारे में, घर के बारे में और सेवाराम के बारे में उसने बहुत बातें की। हम बस के आने से पहले ही स्टॉप पर अा गए। मेरे कहने के बाद भी वह मेरे साथ ही खड़ा हो गया, बस के इंतजार में।

थोड़ी देर चुप खड़ा रहा। फिर अचानक से बोला” चाचाजी आपसे मिलकर मुझे सेवाराम ताऊजी की बहुत याद आयी। बहुत बुद्धिमान थे। सबका बहुत ख़्याल रखते थे। बचपन में मुझे पढ़ाते थे। उनके कारण ही मै कक्षा में प्रथम आता था। जबसे वो गए, मेरा पढ़ने मन नहीं होता। लेकिन उनकी बात याद आती है कि पढ़ लिखकर मुझे बड़ा आदमी बनना है। आपकी तरह। उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। मैं नहीं छोडूंगा।” मैं बस उसकी बात सुन रहा था। तभी सामने से बस आती दिखाई दी।” तुम अपना नंबर मुझे दो, मैं फोन करूंगा तुम्हे।”मैंने बात खत्म करते हुए कहा। उसकी आंखों की चमक और चेहरे की प्रसन्नता ने मेरी रात की थकान मिटा दी।

बस सामने आकर रूकी और मै उसमे चढ़ गया। सीट पर बैठकर मैंने पीछे मुड़कर देखा। वो वहीं पर खड़ा हुआ बस को जाते हुए देख रहा था। मैंने बस के अंदर से हाथ हिलाकर उसे वापस जाने का इशारा किया। मेरी आंखें नम हो अाई। अब मेरा दिमाग आज होने वाली मीटिंग के मुख्य बिंदु दोहरा रहा था। एक अलग ही उत्साह था आज मेरे मन में।मीटिंग के बाद एक जरूरी फोन भी करना था। दीपक का नंबर मैंने मोबाइल सिम में सेव कर लिया था। मेरा मन निश्चय कर चुका था कि उसे दूसरा सेवाराम नहीं बनने दूंगा। मेरी कंपनी का होने वाला उत्तराधिकारी मुझे ही तैयार करना है।

अर्चना त्यागी

कविता और कहानी