हरी बत्ती

हरी बत्ती

रोज़ ऑफिस जाते समय मेरी कार जब चौराहे से गुजरती तो हरी बत्ती होने तक रुकना पड़ता। एक छोटी सी बच्ची हाथ में फटा कपड़ा लिए दौड़कर कर साफ़ करने आ जाती। उसके शरीर पर भी पुराने फटे कपड़े ही होते। बल्कि सर्दी के हिसाब से कम ही होते। कोई स्वेटर, जैकेट कुछ नहीं पहना होता। मेरे पास कार में उस समय खाने का जो भी सामान होता उसके हाथ में रख देती। कभी बिस्कुट, कभी नमकीन तो कभी कोई फल। पैसे देकर भीख मांगने की प्रवृति को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, इसी विचारधारा के चलते।

घर आकर मैं रास्ते की सभी घटनाओं को भूल जाती। लेकिन एक दिन सुबह ऑफिस जाते समय उस बच्ची को अपने परिवार के साथ कचरा जलाकर आग तापते हुए देखा तो मन द्रवित हो उठा। मैंने फैसला किया कि आज घर जाकर सबसे पहले बिटिया के पुराने अनी कपड़े निकालकर कार में डाल दूंगी ताकि कल उस बच्ची को दे सकूं। सर्दी में पहनेगी तो दुआ देगी।

बिटिया की एक पुरानी जैकेट, उनी फ्रॉक और स्वेटर निकालकर मैंने घर आते ही कार में अपनी सीट के पास थैले में  डालकर रख दी।

अगले दिन फिर से लाल बत्ती होते ही वह बच्ची दौड़ती हुई आईं और कार का शीशा साफ़ करने लगी। मैंने अपनी तरफ का शीशा नीचे किया और थैला उसके हाथ में पकड़ा दिया। उसकी आंखों में खुशी की चमक थी। उसे पता चल गया कि आज कुछ अच्छा मिला है। मैंने उसे बता दिया कि जैकेट और फ्रॉक है।उसके पहनने के लिए। सर्दी में पहन लेना। मां मां कहकर खुशी से उछलती हुई वह एक ओर भाग गई। बत्ती हरी हो चुकी थी मैंने कार को आगे बढ़ा दिया। घर आकर फिर से उस घटना के बारे में भूल गई। रविवार वैसे भी रुके हुए कामों को निपटाने का दिन होता है।

सोमवार को ऑफिस से लौटते हुए चौराहे पर फिर से गाड़ी रोकी तो उस बच्ची का ध्यान आ गया। कहीं नज़र नहीं आई। पता नहीं क्या इच्छा जाग्रत हुई थी कि उसे मेरे दिए उन के कपड़े पहने हुए देखूं। शायद बेटी का बचपन वापस देखना चाहती थी। कई दिनों तक वह नहीं मिली। मैं लगभग भूलने लगी थी कि एक दिन फिर से ऑफिस से घर आते हुए उसी चौराहे पर उसने आकर कार का सामने वाला शीशा साफ़ करना शुरू किया।  मैंने ध्यान से देखा लेकिन उसने आज भी कोई गर्म कपड़ा नहीं पहना हुआ था। मैंने केला देते हुए उससे कारण पूछा तो उसका उत्तर सुनकर चौंक गई। “आंटी, जैकेट मां ने भाई को से दी और फ्रॉक, स्वेटर छोटी बहन पहन लेती है। मैं तो बड़ी हूं, इतनी ठंड कहां लगती है।” मुझे उसकी बात से खुशी नहीं हुई। बत्ती अभी हरी नहीं हुई थी, मैंने एक और सवाल पूछा ” तुम कहीं गई थी ?” उसने जवाब दिया ” गांव में गई थी, वो मेरी दादी को नए कपड़े पहनाने थे ना इसीलिए।” मैं समझी नहीं। मैंने फिर पूछा ” कोई त्यौहार था ?” उसने भोलेपन से हाथों के इशारे से मुझे समझाया ” दादी मर गई है। हमारे में जब कोई मर जाता है तो उसे नए कपड़े पहनाए जाते हैं। वैसे तो हम पुराने ही पहनते हैं ना।” अब मुझे समझ आ गया। बत्ती हरी हो गई थी। मैंने आज कार को मार्केट की तरफ मोड़ लिया। घर जाकर फिर से व्यस्त हो जाऊंगी, यही सोचकर। उस बच्ची के लिए उन के कुछ नए कपड़े खरीदने थे। नए कपड़े पहनने की उनकी रस्म ने मेरे दिल को झकझोर कर रख दिया था।

अर्चना त्यागी

कविता और कहानी