आदमी रोज़ इम्तेहानो में

आदमी रोज़ इम्तेहानो में

हथेली में छुपा लो हसीन चेहरा
बहार आई है मेरी पनाह में

बीते लम्हों की कसक सुन लो
घुंघरू बजे रुठी सी खनक में

सुन सको जज्बात जरा सुन लो
अंधेरा छाया रहा गलियारों में

बैठे हो तानकर सर पर चादर
ज्वाला बरसती रही बयानों में

आपके पास सभी कुछ है बाकी
ढूंढें खुद को क्यूँ खाली जेबो मे

लुट गई चैन की दौलत कब की
कैद दिल आपका खजानों में

हौंसलों को रखियेगा बुलंद यूँ भी
परों की जरूरत होगी उड़ानों में

समंदर की गहराई से लो जज़्बा
उड़ सकेंगे दूर कहीं आसमानों में

ढह गई इमारते,ख्वाब टूटे
कैद है’ लोग, यू’ मकानो’ मे’,

अश्क आंखों में अब भी ठहरे
मछलिया’ जैसे मर्तबानो’ मे’।

बढ रही जुर्म की फेहरिस्त
आदमी रोज इम्तिहानों में

कहीं धुआं कहीं आग लगी
चैन गायब है आशियानों में

ज़ख्म पाए हुए फसाने हैं
दिल के अश्शार मिटाने में

दरिया में डूब रही कश्ती
दर्द अब भी दिखे निशानों में

हमी से वफा औ बेवफाई भी
कुछ न बदलाव है जमानों में।

दबी चिंगारी कहीं ठहरी रही
उठ रहा है धुंआ मकानों में।

लेने निकले हैं बारूद बाहर
पर पटाखे नहीं दुकानों में।

चल रहीं आज भी कैंची सी।
तलवारे कुछ मयानो में

रूह कटती नहीं आरी से
धार अब तेज है जुबानों में

खिड़कियाँ चुप हैं चुप हैं दीवारें
गूँजे कैसे शहनाईयाँ कानों में

ना मिट्टी की दीवारें, जहन पक्के
गुफ्तगू हो न अब मकानों में

आहटें धड़कनों में आहों की
एहसास दिखे किताबो में

लिए फिरते हैं दिया हथेली पर
सिसकियों का धुआँ फसाने में

ख़ार ही ख़ार दिख रहे यारो
इश्क रहा कहां जमाने में

दिलकश बहारें करती है नखरा
खिजाँ छाई है अब गुलस्तानों में

डॉ अलका अरोड़ा
प्रोफेसर -देहरादून

कविता और कहानी