गांधार की मचलती हवाएं -DR KAMINI KAMAYANI

प्रत्यंचा
गांधार की मचलती हवाएं
और /थिरकते इन्द्रधनुषी सपनों पर,
अचानक वज्रपात करते/ हे / पितामह (भीष्म)
तुझे तनिक भी हिचक न हुई ।
अपने जनक के अरमानों के लिए
स्वयं की इच्छाओं का चिता जलाने वाला
एक सामान्य अबला नारी के लिए
क्यों इतना निर्मम,
नि:क्षत्र हो गया ?
युद्ध में जीती/पराजित /नरेश की
अपराजिता कन्या/बलात्//वजाहृत बनाकर/
शत्रु पक्ष के अहंकार की
बलिष्ठ बलिवेदी पर बैडाल व्रतिक /
के आग्रह पर/
चढ़ गयी/या चढ़ा दी गयी ।
उपनाम /राज महिषी का
पर छद्म कैसा ? एक नेत्रहीन नृप की अंकशायिनी ।
यह विद्रोह था/पश्चाताप/या मौन हृदय का
अकूत नि:शब्द, क्रंदन / प्रकर्ष / प्यायित / जीजिविषा
उपरूद्ध वाणी के साथ/
अंधत्व को स्वीकार्य किया/साथ वह काली प्रतिरोधक
अनंगवती का असह्य अनुनाद / और /
अपस्तंब में प्रज्ज्वलित तृष्णा पर /
प्रतिपल विजित मुमूर्षा,
साकार प्यार को दृश्यमान देखने का तर्षण,
एक कुंठा बन गयी/
वही कुंठा त्रिदशांकुश रूप में मातृपद भी प्रदूषित कर गयी/ मेरे /
कानों में घुलता नवजात शिशु का क्रंदन/
कितना बौराया था मन/
मगर वह प्रतिज्ञा, अंधत्व को नकारने के लिए/
पहना आवरण / एक व्यतिक्षेप बन /
विरूदित परम प्रयापित ज्वाला में/आखिर लपेट लिया एक दिन गौरवांवित कुरू वृद्ध कुल!
दोषी कौन था ? प्रारब्ध /पितामह तुम / या एक नारी की अपमुर्धा आकांक्षा ?
दग्ध हो रही हूँ / पितामह/ उस परिसंचित ताप से /
सदियों से / अद्यतन/
तपे हुए मरूभूमि में
अनुत्तरित इस प्रश्न को सुलझाने के लिए ।
कोई प्राभिकर्ता ही / कहाँ /
मेरी समस्या का समाधान कर वर्ण सहलाने की चेष्टा की ।
युग विहंसा/ तू अबला /ऊपर से अवरुद्ध दृष्टि /
तेरे लिए क्या सूखा /
क्या वृष्टि
ओह! मैं / पट्टमहिषी न हो /
एक प्रेष्या / परिव्रज्या ही होती/
तो किंस्यात् यूँ न रोती ।
मगर आज/ वक्त /ऊँगली पकड़ मेरे साथ है /चाहती हूँ/
कल का प्रत्युक्ति ।
क्यों ? प्रत्याशा में गँवाए अपने /जीवन के वे दिन ?
मैं रौद्र/ निर्भिक/ योद्धा/ जिसने भी दिया/ मुझे /ाोखा/
प्रस्तुत हो/ समक्ष मेरे/ इस प्रत्यूस में/
बलवती होती मेरी प्रत्यंचा/ प्रकर्षित वाण/
न जाने किस–किस को बिंधे /कौन सा प्रत्यूह अब ?
प्रणम्य! यथाशीघ्र करना है/युद्ध का शंखनाद/
उतारूँगी नहीं आँखों से पट्टी को/चलाना है मुझे शब्द वेधी /
स्वर से पहचान लूँगी/ कौन सखा ? शत्रु कौन ?
उताहुल मन तत्पर है/ भेदने / इस प्रातिलोम्य को/
आकांक्षा नहीं/ प्रकीर्ति की अब/
महासमर में भेदना है / मुझे ही/
अतीत के/ उत्कर्ष की/ उस / अनंत/ अकल्पित चक्रव्यूह को ।

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