उम्मीद की किरण (लघुकथा )

उम्मीद की किरण (लघुकथा )

  अरूणा करवट बदल रही है । ‘नहीं, आज भी मुझे नींद नहीं आयेगी ।’ वो सोच रही है… बार – बार मनोज की याद आ रही है । आठ महीने पहले आज के दिन ही तो वो हादसा हुआ था । आज भी उस दुर्घटना के दृश्य आँखों में सजीव हैं । दिल काँप उठता है । अरूणा की सोच रात की तरह ही गहरी होती जा रही है । मनोज के मृत्योपरांत मिले जीवन बीमा के पैसे अब तक रीया और जीया के स्कूल की फीस के साथ – साथ  घर चलने  में खर्च हो रहे हैं । ऐसे और कितना दिन तक चलेगा । कल फैमिली पैंसन के कामों में फिर से ऑफिस जाना है । सब तो कहते हैं कि जल्द से जल्द हो जायेगा । लेकिन कहाँ ! कब तक !! ऑफिस वाले तो काम को आगे बढ़ाने के लिए आज ये कागजात चाहिए… कल वो कागजात चाहिए कहकर टाल – मटोल कर रहे हैं । श्रीवाणी को भी तो अपने पिता की मृत्यु पर वहीं बैंक में पिताजी की जगह पर नौकरी मिली है । सब कहते हैं, ‘मुझे भी पति की जगह पर नौकरी मिलनी चाहिए’ । मैं अपनी योग्यता के सारे प्रमाण पत्र दे चुकी हूँ और बैंक मैनेजर से प्रार्थना भी की हूँ । पता नहीं ऑफिस वालों को और क्या चाहिए !  क्या करूँ ….कैसे बेटियों को बड़ा करूँ ! ” तभी पास के ऑफिस की घंटी ने दो बजने का संकेत दिया जो सन्नाटे को चीरकर सीधे उनकी कानों में पड़ी । ”नहीं नहीं उसे अब सो जाना चाहिए । कल सुबह रीया और जीया को स्कूल भेजकर ऑफिस जाना है “। वह बुदबुदाई और दोनों कान रजाई से ढँककर सोने की कोशिश की । 

    सुबह दोनों बेटी को स्कूल भेजकर जल्दी – जल्दी घर के काम निपटा कर ऑफिस चली गई । ऑफिस में वो सीधे बैंक के  एसीसटेन्ट मैनेजर से मिली क्योंकि कुछ दिन पहले वहाँ के मैनेजर का तबादला  हुआ था । एसीसटेन्ट मैनेजर के केबिन में जब गई  तब उन्होंने बताया कि अब वो मैनेजर से बात कर सकती है क्योंकि आज ही नये मैनेजर ने ज्वॉइन किया है । उसकी बात सुनते ही उसका मन निराशाओं से भर गया। नये मैनेजर पता नहीं और कितने दिन काम को टालेंगे ।

     मैनेजर के केबिन का दरवाजा खटखटाकर अनुमति लेकर अंदर आयी । यह क्या ! उसे देखते ही वो जैसी की तैसी ठहर गई । दोनों आँखों से आँसू टपकने लगे । मैनेजर की कुर्सी से उठकर वर्णाली ने अरूणा का आलिंगन किया और बोली “ये तू ने क्या हालत बना रखी हो ! बैठो बैठो….” कहकर अरूणा को कुर्सी पर बिठा दिया । अरूणा ने अपनी बचपन की सहेली वर्णाली से अपनी सारी बातें बता दी । वर्णाली ने अरूणा को आश्वासन दिया कि अब उसे पैंसन और नौकरी के लिए चिंता की कोई आवश्यकता नहीं । अरूणा को उम्मीद की किरण नजर आने लगे ।      

                                                           वाणी बरठाकुर “विभा” , 

तेजपुर असम

कविता और कहानी