इतना तो असर हो मेरी दुआओं में     घुले प्रेम का रँग सारी फ़िज़ाओं में

इतना तो असर हो मेरी दुआओं में घुले प्रेम का रँग सारी फ़िज़ाओं में

कितना अद्भुत सँगम है माँ शारदे की स्तुति के साथ हर रूह की चूनर प्रेम रँग से रँगते बसँत की दस्तक का !!

कितना खूबसूरत नज़ारा है !! हर तरफ ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा के पँडाल वीणावादिनी की कर्णप्रिय स्तुति से गुँजित हैं !!

बसँत की ख़ुमारी से रँगी ये सारी क़ायनात कितनी हसीन नज़र आ रही है !!

लेकिन कहीं ये निगाहों का भ्रम तो नहीं ? क्यूँकि प्रेम दिवस की मदहोशी हर उम्र के लिहाज़ की चूनर को तार तार कर चुकी है।हर सुबह का अख़बार अपने साथ एक न एक बलात्कार की ख़बर लेकर ही आता है।देश की मौज़ूदा स्थिति का हर पन्ना सियासी शतरँज का मोहरा बना हुआ है। हर दिल में अलगाववादिता की प्रचँड अग्नि जल रही है। हर रिश्ते की मिठास आक्रोश में बदल गई है।

ना जाने ये कैसी दुआएँ माँग रहे हैं लोग मज़हबी ख़ुदाओं से

सौंधी सुगँध ही खो गई मानव निर्मित मिट्टी की प्रतिमाओं से

चुनावी सरगर्मी ने विपक्षी दलों पर दोषारोपण की मिसाइलें दागने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हर कोई अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन कर ताज़पोशी के ख़्वाब देख रहा है।अवाम की प्राथमिक ज़रूरतों की गोटियाँ सत्तासीनों के हरम गुलज़ार कर रही हैं।आख़िर ये कैसा प्रेम है ?

कोई तो बताए आख़िर सोने की चिड़िया के जिस्म से रूह कैसे जुदा हो गई ?

कौन से क़ायदे की इबारतों में स्वार्थ पढ़ लिया है आज की पीढ़ी ने जो अपने ही आँगन के वृक्ष उखाड़ने की ज़िद ठाने बैठी है ?

एक दूसरे पर प्रभुत्व जमाने की ये कैसी भूख है जिसने स्वामित्व की लालसा में आत्मिकता की बुनियाद ही हिला दी है ?

स्वार्थ की ग़ुलामी करके आख़िर किस से आज़ादी की चाहत पाले बैठी है आज की पीढ़ी ?

कितना अच्छा हो अगर अपनी सोई चेतना को जागृत करके मानव अपनी मौलिक प्रतिभा के विकास की ओर क़दम बढ़ाए !!

क्यूँ न प्रकृति से निस्वार्थता का इल्म लेकर, सर्वोत्कृष्ट जीवन शैली अपनाएँ और समूचे विश्व में अपनी सँस्कृति की सुगँध फैलाएँ !!

प्रेम की खोज बाहर क्यूँ करनी, जब भीतर है मधुशाला

प्रेम बीजें प्रेम उगाएँ,तृप्त करें जग, बन प्रेम का निवाला

आज एकता की जगह पृथकतावादिता का बोलबाला है। हर कोई अपने स्वतँत्र अस्तित्व की तलाश में भी है और दूसरों में प्रेम भी खोज रहा है। जब निजी स्वार्थ की बूँदें सागर को खारा करने में माहिर हैं तो मीठे पानी की प्यास तो लाज़मी है।

दो और दो का जोड़ भला अब चार कहाँ होता है

फ़रेब भर कर अाज का मानव मानवता खोता है

जब हर गठजोड़ में फ़ासले होंगे तो भला एकत्व कहाँ से आएगा ? मिल्कियत की चाहत तो वर्गभेद की दीवारें ही निर्मित करेगी। इसलिए क्यूँ ना अब की बार अपने इश्क को  इबादत में रूपाँतरित करने का प्रयास करें।

हे माँ शारदे अब के बरस अनूठा कोई ज्ञान दो

मैं खुद की मैं से ऊपर उठूँ बस इतना वरदान दो

रीते दिलों में प्रेम भरूँ भूखे दिलों का बनूँ निवाला

हर आँख़ की नमी में रहे मेरा गिरजा और शिवाला

प्रेम कोई सँबँध नहीं सिर्फ मेरे वजूद का स्वभाव हो

कदम उस दिशा बढ़ाऊँ, जहाँ तेरे मिलन की राह हो

सारी क़ायनात सँग प्रेम ग्रँथ रचूँ एैसा मुझे मान दो

तेरा रूप बन तुझमें समाऊँ इतना मुझे अभिमान दो

बसँत पँचमी और प्रेम दिवस का अद्भुत सँगम हर रूह को निस्वार्थता की बौछार से उपजाऊ करे, जिसमें निस्वार्थ प्रेम के सुगँधित सुमन खिलें और समूचे विश्व को महकाएँ !!

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