मेरे ज़हन मे उठते हुये सवालो से निकली एक छोटी सी कहानी

(बुशरा रज़ा)
बङा कनफ्यूज़न है भाई
बङा कनफ्यूज़न है—!!
कल शाम साढे पाँच बजे जब घर से निकली–,
अपने नग़्मो के साथ गाती हुई अपनी धुन में –,
ज़रा ज़रा सा जाम था उसी वक़्त मेरी नज़र
कुछ दूरी पर सङक के किनारे खङी एक महिला पर पङी हर गाङी उसके पास रूकती और आगे बढ़ जाती —
मै भी गुज़री उसने मुझे भी हाथ दिया–मैने म्युज़िक सिस्टम कम किया और रूक कर उसकी बात सुनी–
बेहद घबराई हुई थी ,पेशानी पर इस हल्की सी ठंडक मे भी पसीने की बूदें साफ दिखाई देती थी—-हाथ मे फोन पकङे थी बार बार फोन देख रही थी —
उसने मुझसे कहा –मेरी बेटी एमेटी यूनिवर्सिटी मे पढती है रोज़ बस से आती जाती है आखरी बस स्टाप से मे उसे लेने आ जाती हु—मगर आज जब वो यूनिवर्सिटी से रवाना हुई तो उसका फोन आया —
के आज लौटते वक़्त वो अकेली है लङकियो मे–, कोई और लङकी नही है– एक यूनिवर्सिटी का लङका है–बस और साथ मे कन्डक्टर और ड्राइवर है  —
बहन आप अगर मुझे युनिवर्सिटी के रास्ते ले चलिये तो आपकी मेहरबानी होगी —मै बेहद घबरा रही हू–न जाने उसके साथ कही कुछ गलत न हो जाये—आजकल किसी की नीयत का कोई भरोसा नही–;
वो इतना ही कह पाई थी के मैने गाङी किनारे की और उसको गाङी मे बैठा लिया ,अपनी बोतल से उसको पानी दिया उसने कहा मुझे पानी नही पीना आप बस जितनी जल्दी हो सके मुझे वहाँ दूसरे बस स्टाप तक पँहुचा दीजिये —
मैने गाङी स्टार्ट की और सीधे तीसरे और चौथे गयर पर गाङी भगाना शुरू कि मगर बीच बीच मे जाम था–
मैने उससे कहा –ईशवर पर भरोसा रखिये ऐसा कुछ नही होगा –आपने सुबह उसे अल्लाह के हवाले करके ही भेजा होगा न परेशान मत होइये हम जल्द उस तक पँहुच जायेगे—और माँ की दुआयें बच्चो के साथ हमेशा होती है—और आपकी लङकी के पास फोन है कुछ भी होगा तो वो फोन कर देगी आप न परेशान हो–
बहन सब कहने की बातें है—उसने उलझते हुये मुझसे कहा –हाथ से फोन छीना भी जा सकता हैऔर रही बात माँ की दुआओ की ईश्वर पर भरोसे की तो —;
क्या निर्भया और आसिफा और जितने आजकल रेप केस सामने आते है उन सब बच्चियो के साथ उनकी माँओ की दुआयें नही थी क्या ईश्वर उस वक़्त छुट्टी पर था–??
उसका ये कहना था के मेरे होश उङ गये–
बात तो सोलाह आने सच कही थी उसने–,
मै ख़ामोश हो गयी और रास्ता साफ होने पर हम लोग दूसरे बस स्टाप तक पँहुच गये थे –बस पाँच मिनट मे आ गयी थी उसने अपनी लङकी का हाल चाल हर थोङी देर मे लिया था और उसे बता दिया था के वो दूसरे बस स्टाप पर उतर जाये
यहाँ मेरे लिखने का ये मक़सद नही है कि मैने उसकी मदद की-, उसको वहाँ तक पँहुचाने में–
मेरा मक़सद सिर्फ कुछ सवालो पर आकर रूक गया ज़हन ओ क़लम मचल गयी के मै ये सवाल लिखू —
क्या सच मे माँ की दुआयें होती है ?
क्या ईश्वर ऐसे वक़त पर छुट्टी पर चला जाता है-?
जब कुछ ऐसा घिननौना काम होता है–तो क्यो होता है??मेरी समझ के परे है मै बहोत पढी लिखी नही हू न इतनी ज्ञानी हू —
अभी बहोत से लोग ये कहेगे के मै अपने मज़हब के खिलाफ हू मै ऐसी अजीब ओ गरीब बाते लिख रही हू —,मै किसी भी मज़हब के खिलाफ नही हू मै एक मज़हब से वाक़िफ हू वो है –“इन्सानियत” —
अल्लाह राम ईश्वर किसी भी नाम से पुकारो क्या फर्क़ पढता है—-
कुछ लोग ज़रूर कहगे ऐसे सवाल क्यो करती हो जिससे अल्लाह की ज़ात पर नाऊज़ोबिल्लाह शक़ हो अल्लाह से डरो —
मेरा कहना है कि अल्लाह तो हमारी शाह रग से भी ज़्यादा क़रीब है हमे सत्तर हज़ार माओ से ज़्यादा चाहता है फिर उससे क्यो डरा जाये वो कोई भूत तो नही है —
डरना है तो अपने आमालो से डरना चाहिये–न कि अल्लाह से–
बाहर हाल –ये सवाल तो है –क्यो दुनिया और ईश्वर मे सवालो का इतना कनफ्यूज़न है —
ज़हन मे हलचल होने लगती है के आखिर ऐसा है तो क्यो है ???और क्यो ऐसा गंदा काम होता है—-ईश्वर के रहते माँ की दुआओ के साथ क्यो क्यो???
बुशरा रज़ा—–13/11/18———12:57pm

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