साहित्य में शब्द और भाव और अनुभूतियाँ : सुशील शर्मा

साहित्य समाज का सशक्त अंग होता है। मनुष्य को बनाने एवं सँवारने में साहित्य का विशेष योगदान होता है। साहित्य अर्थात् सबका हित। ’’साहित्य और समाज एक ही सिक्के के दो पहलू होते है। एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की परिकल्पना का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। साहित्य  उसी रचना को कहेंगे। जिसमें कोई सच्चाई और अनुभूति प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित, सुंदर हो और जिसमें दिल-दिमाग पर असर डालने का गुण हो, साथ ही जब जीवन की सच्चाइयों का दर्पण हो। ’साहित्य के दीपक में साहित्यकार को खुद जल कर प्रकाश फैलाना पड़ता है एक शब्द उसके अंदर की किरण है । हम सभी साहित्यकार अपने भीतर न जाने कितनी किताबो को समेटे हैं। लेकिन आखिर में यह किताबें  किस प्रारूप में दिखाई देती है, वह सब प्रासंगिक नहीं है।प्रासंगिक है तो बस  शब्द, पात्र और कथा।

लेखन का आरम्भ स्वान्तः सुखाय होता है | रचनाकार की साहित्यिक अभिव्यक्ति वास्तव में उसका भोगा हुआ यथार्थ होता है जो एक सुनिश्चित स्वरुप और शिल्प में सामने आता है | यह गढना और गढ़ने की क्षमता ही उस व्यक्ति को आम से अलग बनाती है | दरअसल, साहित्य का समाज से सीधा संवाद बेहद जरूरी है। आमतौर पर साहित्य के विषय यथार्थ और कल्पना के कैनवास पर रचे जाते रहे हैं। यहां यह भी जरूरी है कि साहित्य से गुजरने के बाद पाठकों को चिंतन-मनन का मौका मिले।वर्तमान में रचे जा रहे साहित्य में मिट्टी की महक शिद्दत से महसूस होती हैं। मध्य वर्ग व निम्न वर्ग को केंद्र में रखकर विपुल साहित्य रचा जा रहा है। उसमें परंपरा व आधुनिकता का सम्मिश्रण भी है।

समय के साथ विषयवस्तु में बदलाव जरूर आया है। वैश्वीकरण व उदारीकरण ने हमारे समाज को गहरे तक झकझोरा है। उसकी प्रतिछाया साहित्य में शिद्दत से उभरती है। यह प्रवृत्ति स्वाभाविक  भी है। संक्रमणकालीन समाज का अक्स साहित्य में उभरता है।इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में हिन्दी साहित्य में युवाओं की रचनाशीलता के विस्फोट को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह विस्फोट कितना गुणात्मक है और कितना परिमाणात्मक, बहस तलब बात है। इसी कालखण्ड में हाशिए- दलित और स्त्राी- की रचनात्मक भागीदारी में पर्याप्त इजाफा हुआ है। बहरहाल, इन नए रचनाकारों को सामने लाने में साहित्यिक पत्रिकाओं का अहम योगदान है। किसी भी साहित्यिक पत्रिका और संपादक के मूल्यांकन की एक कसौटी अपने दौर के नए रचनाकारों को सामने लाना हो सकता है। नए रचनाकारों, नयी रचनाशीलता की खासियत को पहचानना, उसके साथ कदम-ताल मिलाते हुए उसकी सीमाओं को रेखांकित करना संपादक का एक मुख्य दायित्व होता है। दरअसल, वर्तमान की नयी/युवा रचनाशीलता ही भविष्य की मुख्य रचनाशीलता का स्थान लेती है। मुझे लगता है कि हार्डकॉपी धीरे-धीरे गायब हो सकती है। छोटे पाठकों के लिए कहानी चित्र किताबें और शायद सुरुचिपूर्ण कॉफी टेबल किताबें आकर्षित कर रहीं है । बेशक यह संक्रमण का समय है और भविष्य की भविष्यवाणी कौन कर सकता है? निश्चित रूप से एक उभरते लेखक के रूप में, साहित्यिक घटनाओं में भाग लेना आपके साहित्य और लेखन को सशक्त बनाता है।साहित्य के पाठ्यक्रम के इन हिस्सों को शिल्प सीखने के समान ही महत्व के साथ माना जाना चाहिए ; लेखन, और लेखन को बेचने की तकनीकों के बारे में जानना, स्पष्ट रूप साहित्य आज एक तेजी से डिजिटलीकृत और प्रतिस्पर्धी क्षेत्र बन कर उभरा है ।जो लोग अपने साहित्य को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। उनके लिए सोशल नेटवर्किंग महत्वपूर्ण है, इसलिए मैं फेसबुक का उपयोग करने, ट्वीट करने और अन्य ब्लॉगों में लॉगिंग करने की सलाह देता हूं। यू ट्यूब पर प्रचार करना भी उपयोगी है।

अब प्रश्न उठता है कि नया लेखन शुरू करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है?

मेरी राय में, सबसे पहले उस लेखन का एक चरित्र का सृजन ऐसा हो जो हर उस विषय से सम्बंधित को अपनी और आकृष्ट करने में सक्षम हो सके। वो चरित्र जीवित होकर हम सबके आसपास महसूस हो। नया लेखन करने वालो को उस लेखन के मुख्य चरित्र की एक प्रोफ़ाइल बनाना चाहिए । एक ऐसी संरचित प्रोफाइल जिसमे उस चरित्र का हर अंश परिलक्षित हो आप उस चरित्र की पसंद / नापसंद / संघर्ष / परिवार आदि से पूर्ण परिचित हों।

एक लेखक के लिए सचेत होना लेखन की प्रथम शर्त है । जब आप सचेत ,सादगी और वास्तविकता से लिखते हैं, तो आपके पास उस रोशनी को अपने पाठक के ह्रदय में सम्प्रेषित करने की क्षमता होती है। वह जो चित्र आप अपने लेखन से चित्रित करते हैं, उसमें वह अपने जीवन और सत्य को ढूढ़ने की कोशिश करता है। युवा लेखकों के लिए सलाह है की वो  अपने फैसले पर भरोसा करना सीखें, आंतरिक स्वतंत्रता सीखें, उस समय भरोसा करना सीखें जब वो बुरे दौर से गुजर रहे हों।

“अगर आप लिखना चाहते हैं, तो आपको पागलपन की हद तक किताबों से प्यार करना होगा ,आपको अपने जीवन के हर दिन को  लिखना होगा। आप जितने विभिन्न विषयों की किताबें  पढ़ेंगे आपके अंदर लिखने का उतना जूनून पैदा होगा।  आपको पुस्तकालयों में रहना चाहिए और इसमें से अच्छी कहानियां – विज्ञान कथा या अन्य विषयों का खूब अध्ययन करना चाहिए ।

अपने शिल्प पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करें। व्यापक रूप से पढ़ें, अपने लेखन को पूरी तरह से समर्पित करें और अपनी रचनात्मकता का पता लगाने की खुद को स्वतंत्रता दें। जब आप एजेंटों, प्रकाशकों, पत्रिकाओं आदि के साथ काम साझा करना शुरू करते हैं, तो संभावना है कि आपको सलाह, राय, रचनात्मक आलोचना, संपादन आदि सभी साहित्यिक क्रियाओं से निपटना पड़ सकता है । इसका स्वागत किया जाना चाहिए और आखिरकार (यदि आपको सही मैच मिल जाए) तो आपको बेहतर लेखक बनने में मदद मिलेगी। जैसे ही आप प्रक्रिया में आगे बढ़ते हैं, आपको अनिवार्य रूप से अपने दर्शकों के बारे में अधिक सोचना शुरू करना होगा। तो प्रक्रिया के प्रारंभिक दिनों के दौरान सुनिश्चित करें कि आप स्वयं को लेखन का आनंद लेने का मौका दें।जब मैंने रचनात्मक लेखन का अध्ययन किया, तो मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि लिखने के अलावा, लिखने के लिए और भी बहुत कुछ था। पाठ्य सूचियों के माध्यम से अपेक्षित कार्यों के बीच, साहित्य लिखना उसको सही जगह सबमिट करना और साहित्यिक तकनीकों की पहचान , मुझे नेटवर्किंग के महत्व और साहित्य में सही और गलत की पहचान का पता चला।

 

अपने लिखे साहित्य का  संपादन आसान नहीं  है, यह असंगत रूप से मुश्किल है। जब आप सब कुछ भाव लिखते हैं तो उसमे आप अपना  रक्त, पसीना  आंसु और प्यार डाल देते हैं,हर शब्द हम को प्रासंगिक लगता है किन्तु जब हम उसे समग्रता में देखते हैं तो उसके कई  अनुभागों को हटाने, बदलने, और संशोधित करने की आवश्यकता होती है। अब प्रश्न उठता है कि साहित्यकार स्वयं को प्रेरित करते हुए  लगातार लिखते जाएँ या कोई  शुरुआती मसौदा तैयार करें जिसमे कुछ मुख्य बिंदु हों जिन्हे बाद में विस्तारित किया जावे। इस सम्बन्ध में  मेरी लेखन प्रक्रिया ‘घोंघा जैसी’ है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मुझे हर शब्द को निचोड़ना है। फिर इसे बहुत सारे संपादन की जरूरत है। मार्क ट्वेन ने एक बार कहा था कि उन्होंने एक पूरी दोपहर एक अल्पविराम को  लगाने में बिताई और एक और दोपहर इसे बाहर करने में बिताई । कोई शुरुआती ड्राफ्ट कभी भी सही नहीं रहा है।

संपादन के बाद एक बार जब आप अपना लेखन  साझा करने के लिए तैयार होते हैं तो आपको लगता है कि कड़ी मेहनत खत्म हो गई है लेकिन सच्चाई यह है कि यह कड़ी मेहनत तो  अभी शुरू हो रही है। अपने लेखन के साथ न्याय को करने का सही तरीका है उसे सही जगह से प्रकाशित कराया जाए या उसे वो मंच मिले जो आपकी रचनात्मक दृष्टि को समझता है। अपने आदर्श मंच को खोजने का सबसे अच्छा तरीका है अपने विकल्पों (एजेंटों सहित) का शोध करना। यह प्रदर्शित करने का सबसे अच्छा तरीका भी है कि आप जिस मंच पर आ रहे हैं उसके लिए आप सही क्यों हैं।

प्रत्येक लेखक के लेखन की एक अलग प्रक्रिया होती है। कुछ लेखकों के लिए, लेखन एक नियमित नियम है जैसे एक निश्चित  समय में या एक निश्चित मात्रा में लिखने की आदत या  किसी विशेष स्थान पर या किसी विशेष कलम में या कपड़ों के एक विशेष सेट में लिखने से उनमें  रचनात्मक के रस बहते हैं।  सच्चाई यह है कि आप कई अलग-अलग तरीकों से सृजन कर सकते हैं कोई सही या गलत तरीका नहीं है। आपको बस अपना खुद का अद्वितीय दृष्टिकोण ढूंढना होगा जो आपके लिए काम करता है।

लेखन और पढ़ना दोनों काफी अकेले अनुभव माने जाते हैं। लेकिन अपने विचार, भावनाओं, ज्ञान, सहानुभूति को साझा करना ही सही साहित्यकार की निशानी है जिसके लिए आपको पाठकों का प्रबंध करना होगा और पाठक ही साहित्यिक रचना का अंतिम लक्ष्य है उसे आपको खोज कर अपनी रचना से जोड़ना होगा । लेखन के प्रति समर्पण और दृढ़ता मायने रखती है। ऐसा कहा जाता है कि प्रेरणा केवल 10% है और कड़ी मेहनत 90% है।

यह जरूर है कि वर्तमान के नवोदित साहित्यकार नहीं समझ पाते कि साहित्य की प्रत्येक विधा के अपने कुछ नियम होते हैं, व्याकरण होती है यहाँ तक कि अपनी शब्दावली होती है। अतुकान्त कविता में जिस तरह लेखक एक वाक्य को लिख कर कुछ अंशों में बाँट कर उसे कविता मान लेते हैं, उसी तरह लघुकथा और आपबीती या संस्मरण में अन्तर नहीं समझते। एक घटना को ज्यों का त्यों लिख देने से वह लघुकथा नहीं बन जाती। कहानी के नियम लघुकथा पर भी लागू होते हैं – बल्कि लघुकथा को मैं कहानी लेखन से अधिक कठिन विधा मानता हूँ, क्योंकि लेखक को शब्दों की सीमा का ध्यान रखना पड़ता है।

पाठक को साहित्य अनुभव करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, उन्हें अनुमति हो कि वह चित्रण करें, पाठ्य सामग्री से जुड़े, महसूस करें, विचार-मंथन करें ताकि वह साहित्य के साथ सामंजस्य स्थापित कर सके व अपने जीवन में साहित्य के महत्त्व को महसूस कर सकें।

आज के प्रायः अधिकाँश वरिष्ठ साहित्यकार स्व विद्वता  में फंसे हैं और उन्हें अपने सिवाय कुछ दिखाई नही दे रहा | प्रकाशन से मंच तक मठ ,गुट और गढ़ बने हैं |दस – बीस वर्षों के लेखन के बाद अपने अपने कारणों और प्रोत्साहनों के ज़रिये जब हम समाज के समक्ष आते हैं तो हमें अपेक्षा रहती है कि कुछ सार्थक समालोचना प्राप्त होगी मार्गदर्शन मिलेगा खास कर अपने से वरिष्ठ रचनाकारों का | परन्तु अक्सर हर स्तर पर हमें और हमारे भीतर के रचनाकार के अस्तित्व को ही नकारा जाता है।आप किसी भी शहर में जाईये वहाँ वही दस बीस साहित्यकार आपको हर जगह दिख जायेंगे | उनकी एक ही कविता इतनी प्रसिद्ध है कि उसे वे दस वर्षों से हर मंच पर सुना रहे होंगे और आपकी दस रचनाओं को जगह नहीं मिलेगी | मेरा किसी बड़े साहित्यकार से कोई दुराव नहीं उन्हें पढ़ – सुनकर ही हमने कुछ कहना – लिखना सीखा है , पर बात सिर्फ इतनी है कि वे समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करें और उसके समक्ष नए लोगों को भी सामने लाएं | आज नवोदित युवा लेखक हैं-कुछ वे जो आहिस्ता-आहिस्ता बिना प्रचार की कामना लिए पूरे दायित्वबोध के साथ रचना-कर्म कर रहे हैं, कुछ वे जिन्हें अपने रचना-कर्म की तुलना में अभी ही ज्यादा पहचान मिल चुकी है, कुछ वे जो समान तरह का लेखन कर रहे लेखकों की एक छोटी-सी दुनिया का हिस्सा बने हुए हैं और जिन्हें नयी कहानी दौर की लेखक-त्रायी जैसी किसी स्थिति का स्वप्न अभिभूत किए हुए है, कुछ वे जिन्हें आत्ममुग्धता बाँधे हुए है। मेरा मानना है साहित्य मनोरंजन का साधन नहीं है। यह स्वविद्वता का प्रदर्शन तो बिल्कुल नहीं है। अगर ऐसा हो जाता है तो पाठक साहित्य से अलग हो जाता है। रचना पाठक को छूनी चाहिए। साहित्य जीवन में  एक सूचना, विशिष्ट पाठ, लेखक व शब्दावली के ढाँचे के रूप में न हो कर एक जीवंत परंपरा के रूप में हो जिसमें पाठक प्रवेश कर सकता है और उसे पुनः जीवित कर सकता है। साहित्य एक अनुभव है, सूचना मात्र नहीं है और पाठक को इसमें प्रतिभागी बनने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। पाठक की भूमिका साधारण रूप में बाह्य अवलोकनकर्ता मात्र की नहीं होनी चाहिए।

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