आजादी की एक और लड़ाई बाकी है दोस्त!

मनमोहन शर्मा ‘शरण’   (प्रधान संपादक ) 

श्रावण मास का प्रारम्भ रिमझिम और तूफानी रफ्तार से बरसात का आनन्द लेते हुए जिन्दगी आगे बढ़ रही है । अगस्त माह में (15 अगस्त को) हम आजादी की वर्षगाँठ हर वर्ष मनाते आ रहे हैं । यह वह समय होता है जब देश के शहीद जवानों, स्वतन्त्रता सेनानियों को हम नमन करते हैं जिनके महान संघर्ष एवं बलिदान के फलस्वरूप ही हम आजादी की श्वास ले रहे हैं ।
15 अगस्त 1947 से आज तक देश ने बहुत असाधारण तरक्की की है और देश के होनहार बच्चों के पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है ।
यह सच है किन्तु एक सच और है जो थोड़ा कड़वा है, उसे भी हमें देखना–सुनना होगा । आज भी शहीदों/स्वतन्त्रता सेनानियों के परिवारजनों में मलाल सा देखा जाता है कि जो शहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद एवं तमाम स्वतन्त्रता सेनानियों के सपनों का भारत, जो वो देखना चाहते थे, वो अभी बनना बाकी है । आजादी से पूर्व एक वह समय था जब लोग सबसे पहले देश हित, देखते थे । उनकी ‘मैं’ बड़ी विशाल थी, जिसमें अपना पूरा परिवार, पड़ौसी आदि भी समाहित होते थे और देश की भावना सर्वोपरि होती थी ।
कितना अच्छा लगता है इन बीते 67–68 सालों में हमने धन –दौलत, शौहरत, ज्ञान–विज्ञान, खेल सभी क्षेत्रों में बहुत आगे निकल आए हैं । बहुत तरक्की कर ली है । परन्तु आज अपनी ‘मैं’ का स्वरूप बहुत संकुचित/छोटा हो गया है ।
यही कारण है कि मैं और मेरा परिवार (जिसमें पत्नी और बच्चे ही सम्मलित हैं) यही एक नारा रह गया है । परिणास्वरूप माता–पिता पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में, लालन पालन, उच्च शिक्षा के लिए दाव पर लगा देते हैं और जब उनका समय आता है कि वे भी कुछ सहारा चाहते हैं तब पहले बच्चों की आँखों में अपने लिए प्यार–विश्वास और समर्पण की भावना को तलाशते हैं । झुकी हुए नजरें सब कुछ बयां कर देती है और परिणामस्वरूप अनाथआश्रम–वृद्धाआश्रमों में भीड़ बढ़ती जा रही है ।
हमें इन सबका कारण और उसका निवारण तलाशना होगा ।
पिछले दिनों मेरा महाक्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद जी से मिलना हुआ उन्होंने मुझे दिल्ली–एनसीआर (एचआरए) का मीडिया प्रभारी बनाया । उनके साथ शहीदों के सम्मान में आयोजित क्रार्यक्रमों में जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ । वहाँ स्वतन्त्रता सैनानियों के परिवारजनों से मिलना हुआ । उन सभी के मन में एक टीस है कि हम अंग्रेजों से तो आजाद हो गए किन्तु मानसिकता से गुलाम हो गए है । इसलिए मानसिकता को आजाद करने के लिए हमें एक और आजादी की लड़ाई लड़नी होगी ।

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