बेटियां (कविता)

आकांक्षा द्विवेदी (कवयित्री) बिंदकी फतेहपुर

बेटियां तो परिया बाबुल की अमानत होती है।

बाबुल के आंगन की उनसे ही रौनक होती हैं।।

 

प्यार दुलार के छाव की वो कोमल डाली होती हैं।

माँ के ममता की वो तो  उज्ज्वल छाया होती है ।।

 

पढ़ लिख कर रोशन वो बाबुल का जहाँ करती हैं।

पहचान देती उनको जो उनकी दुनिया होती हैं।।

 

बेटियों को मत बोलो पराया बस दो घर उनके होते है।

दोनों में अंतर कोई नही बस मन के भाव का होता हैं।

 

वरना बेटी और बहू दोनों में ममता ही छलकती है ।

अपना और पराया दूषित मानसिकता ही होती हैं।।

 

समझो तो बहु भी अपनी न समझो तो बहु परायी।

बस घर बदलते है ममता नारी की नही बदलती ।।

 

दोनों का फर्ज एक है दोनों के अहसास भी एक।

अलग भाव पैदा न हो गर बेटी समझो बहु को आज।

Releated Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *