नज़रों के सामने था (ग़ज़ल)

(अशोक मिज़ाज)
नज़रों के सामने था मगर ढूँढते रहे
अपनी गली में अपना ही घर ढूँढते रहे।
चेहरे पे ग़म के ज़ेरो-जबर ढूंढते रहे,
वो दर्द किस तरफ़ था,किधर ढूंढते रहे।
मौक़ा परस्त हम से भी आगे निकल गये
हम अपनी कोशिशों में कसर ढूँढते रहे
उसके लिए तो हमने सफ़र पर सफ़र किये
जिसने जिधर बताया उधर ढूँढते रहे
जब मर गया फ़क़ीर तो सबकी नज़र गई
झोली में उसकी लालो-गुहर ढूँढते रहे
तस्वीर तेरी मेज़ पे और ख़त दराज में
इक चीज़ इधर रखके उधर ढूँढते रहे
_ अशोक मिज़ाज

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