“तुलसी है तू जाने किस आँगन की” —————————————– एक भीनी भीनी सी ख़ुश्बू लिए….. ये कौन है जिसने मेरे दिन रात अपने मोह में जकड़ लिए….. तुलसी है तू न जाने किस आँगन की….. मेरे मन आँगन में तू महका करती है बन कर शीतल घटा सावन की….. न जाने […]

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कविता       ” खून से सनी रोटी “   जानता हूँ काँटे फूल नहीं बनते यह भी जानता हूँ कि फूल कभी शूल नहीं बनते फिर भी सपने बुनता हूँ   मन चाहता है पँछी बन चहकने लगूँ फूल बन कर महकने लगूँ आसमान में उढ़ने लगूँ तूफान सा उमढ़ने […]

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“तुलसी है तू जाने किस आँगन की” —————————————– एक भीनी भीनी सी ख़ुश्बू लिए….. ये कौन है जिसने मेरे दिन रात अपने मोह में जकड़ लिए….. तुलसी है तू न जाने किस आँगन की….. मेरे मन आँगन में तू महका करती है बन कर शीतल घटा सावन की….. न जाने […]

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‘’   मेरे निशां  ‘’  1   एक आस यह दामन नही छोड़ती ,के जाने से पहले एक बार तुझे करीब से निहार लु,जाने कोन जन्म फिर तुझ से मुलाकात हो या ना हो,मेरे जाने के बाद मेरे निशां तेरी यादो मे रहे ना रहे कुछ पन्ने मेरी याद युही सम्भाल […]

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!! तृप्त हूँ मैं जलकर भी !!   तृप्त हूँ मैं जलकर …भी नहीं कामना कंचन ..की भंग निशा नीरवता का कर टिमटिमाती मद्धम ..सी   सन्तुष्ट हूं निज.जीवन…से निखर गई मैं …कुन्दन सी खुशियाँ आती जाती रहती तितलियो सी उपवन .की   मुझ विरहन को जलने भी दो यही […]

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वरना तो अब तलक ………     घनी जुल्फों की छाँव क्या मिली, अंधेरों के कायल हो गये, वरना तो अब तलक हम भी, उजालों के तलबगार थे……….   नजरें उनसे क्या चार हुयी सादगी के कायल हो गये, वरना तो अब तलक हम भी, तितलियों के तलबगार थे……….   बलखा के चलते क्या देखा उन्हे पायल के कायल हो गये, वरना तो अब तलक हम भी, घुंघरुओं के तलबगार थे……….   दिल में […]

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हम क्या हैं   क्या ऎसा नही लगता कि हम सभी के भीतर एक सुकरात जिंदा है कभी ना कभी तो जहर का प्याला हम भी पीते हैं, हंसते हंसते फिर कभी हमारी भी तो बदसूरती दिखाई देती है आईने को और हम भी अपनी ही सोच की जेल में […]

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औरतों की एक जमात    औरतों की एक जमात आज भी साड़ी पहनती सर पर पल्लू आँचल संभालती ओर घर की ड्ढ्योड़ी के साथ साथ भारतीय मूल्यों को तन,मन और प्राण से अपनाती है   आँखों के काले घेरे फैले पेट के गोलार्द्ध लिए जुटी रहती हैं अपनी हर नई […]

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