ये दौड़ती भागती लड़कियाँ

©डॉ. मनोज कुमार “मन”

 

सुबह-सुबह कँधे पर बैग लटकाकर
एक हाथ में टिफिन बैग और
दूसरे में इयर लीड लगा मोबाइल ले
मेट्रो को पकड़ने के लिए
दौड़ती भागती लड़कियाँ

मार्बल की सीढ़ियों पर
टप्प-टप्प की अनुगूँज करती
पतली तली वाली चप्पलें
मानो दबी जुबान में कह रही हैं के
हमारे साथ इतना भी अन्याय मत करो
हमें दौड़ाने के लिए नहीं बनाया गया है
मगर रेस में दौड़ती भागती लड़कियाँ
कब सुनती हैं उनकी दबी आवाज को
जो उनके पैरों तले
कदम दर कदम करहा रही हैं

न जाने कौन-सी धुन सवार है उन पर
किसको हराना चाहती हैं ये लड़कियाँ
किससे जीतना चाहती हैं ये लड़कियाँ

उनके चेहरों पर रात भर की
अलसाई स्पष्ट दिखाई देती है,
फिर भी कदमों में स्फूर्ति लिये दौड़ती हैं
कभी लिफ्ट को पकड़ने के लिए,
लिफ्ट निकल जाती है तो दौड़ती हैं
एक्सलेटर या सीढ़ियों की ओर
और फिर दौड़ पड़ती हैं
मेट्रो के दरवाजों की ओर
उनके बंद होने से पहले
चली जाना चाहती हैं जल्दी से अंदर
पहुँचने के लिए अपनी मंजिल पर
शायद उन्हें एहसास है बंद दवाजों का
सदियों से रहीं हैं वे दहलीज के भीतर

ज्यादातर ने मेकअप से नीचे
दबा लिया है अपनी थकान को
कुछों ने कोई मेकअप नहीं किया है
उनकी ताज़गी देखते ही बनती है

पटरियों पर किसी रेल-सी
दौड़ती भागती ये लड़कियाँ
उषा के सूरज को निहारती
ये लड़कियाँ, खूबसूरत-सी
मगर बेहद बेचैन लड़कियाँ
©डॉ. मनोज कुमार “मन”
(प्रातः 6-7 बजे मेट्रो सफर के दौरान)

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