इश्क सूफ़ियाना इबादत का ही रँग लाए

डॉक्टर कविता मल्होत्रा

कोई तो जग को अनासक्ति का सबक सिखाए

चार दिन का है जग मेला, सब मिथ्या मोह माय

बचपन में खिलौनों के लिए मचल जाना, युवावस्था में मित्र मँडली का याराना, प्रौढ़ावस्था में गृहस्थाश्रम के दायित्वों का बहाना और वृद्धावस्था में तलाशना मँदिर, मस्जिद, गिरजे और गुरुद्वारे का ठिकाना, क्या यही मानव जीवन के परम उद्देश्य का सार है ?

मानव देह पाँच तत्वों के मिश्रण से बनी है, ये पाँचों तत्व अग्नि, जल, वायु, आकाश और धरती अपनी-अपनी निस्वार्थ प्रवृत्ति के माध्यम से मानव को सदा निस्वार्थ प्रेम का सँदेश देते हैं।लेकिन मानव मन अपने ही स्वार्थों में उलझा हुआ चार दिन की जागीर पर अपना स्वामित्व जताना चाहता है, जिसके कारण अनेक उपद्रव पैदा होते हैं।

हर कोई खजूर के वृक्ष की तरह गगनचुँबी ऊँचाई तो पाना चाहता है मगर छायादार मीठे फलदायक वृक्षों की श्रेणी में नहीं आना चाहता क्यूँकि स्वार्थ और लोभ के मायावी चक्रव्यूह में फँस कर वो केवल अपने अधिकार क्षेत्रों पर अपना क़ब्ज़ा बनाए रखने की बात करता है,अपने दायित्वों के प्रति वो बिल्कुल भी सचेत नहीं होता।

ऐसे में यदि मानव मन की दोहरी मानसिकता पर प्रहार किया जाए, तो ये बात तो साबित हो ही जाएगी कि कोई मँज़िल नहीं है, जिसे पाकर किसी को हार जीत का प्रमाण देना है, बल्कि जीवन तो एक सफर है जिस के हर पड़ाव को ख़ूबसूरती से पार करना है। लेकिन सउद्देश्य चलना ही परम गँतव्य पर पहुँचाएगा, वर्ना व्यर्थ चल चल कर कभी कोई कहीं नहीं पहुँच सकता।

सुनहरे ख़्वाबों की साज़िश में हर्गिज़ मत उलझ जाना

मुरझाए चमन कोई न खिलाएगा, होगा हर सू वीराना

छाँट लेना धुँधलके, फरेबी हवाओं से खुद को बचाना

होड़ की दौड़ में गिरे जग औंधे मुँह,ठहरा वही सयाना

जीवन में ठहराव तभी आ सकता है जब जीवन की सार्थकता समझ में आ जाए। वैश्विक बँधुत्व का भाव तभी जागृत हो सकता है जब वासुदेव कुटुम्बकम का अर्थ अँतरदृष्टि को प्रकाशित कर सके। समूचे ब्रह्माण्ड का रचयिता सृष्टि की रग रग में समाया है।

एक सा रक्त मास

सबकी एक सी रूह

सभी में अँश प्रभु का

सब जग उसका समूह

बिना किसी भी भेदभाव के यदि मानव एक दूसरे के उत्थान में सहयोगी हो,तो मानसिक उत्कर्ष का योग खुद ब खुद सध जाएगा।

शून्य से जन्में और शून्य में विलीन जीवन का अँत

ना जाने क्यूँ जन्मों-जन्म रहे “मैं” का शोर अनँत

अदना से विवेक का ज़रा से चिंतन का यही सार है कि मानसिक स्वास्थ्य का दायरा लफ़्ज़ों की पकड़ में नहीं आ सकता।यदि विचारधारा स्वस्थ होगी तो जीवन स्वस्थ भी होगा और सार्थक भी।

सँसार की नश्वरता के कीचड़ में अनासक्त रह कर कमल की तरह खिलें और साक्षात ईश्वर का हस्ताक्षर बन सकें। अपने कार्मिक फल को, बिना किसी पर दोषारोपण किए,

चाहे वो सज़ा दे या मज़ा दे, सहज स्वीकार कर सकें, और विश्व कल्याण की राह पर चलते रहें, यही सार्थक जीवन का परम धर्म है।

रहे हर इश्क सूफ़ियाना

इबादत का ही रँग लाए

ये नूर जगत नियँता का

रहे हर रूह पे सदा छाए

क़ातिल ही सही ख़ुमारी

सजदे में ही सर झुकाए

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