राजधर्म या राज हठ

राजधर्म या राज हठ

लोकतन्त्र में ऐसा भी होता है कि प्रचण्ड बहुमत पाने के बाद सत्ताधारी दल का

सर्वेसर्वा अपने को अजेय,अपराजेय,शक्तिमान,विलक्षण समझने लगता है कि उसको लगता है कि मैं जो भी कर रहा हूं, वह उचित ही है,सब उसको मान ही लेंगे,नहीं मानेंगे तो मैं सत्ता के तंत्र से दबा कर,उनके विरोध को अनसुना कर,येन केन प्रकारेण,साम दण्ड, भेद की नीति से हर बार की तरह कुचल दूँगा,क्योंकि सभी विरोधियों का सुर एक भी हो जाये तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। यही तो  लोकतांत्रिक तानाशाही है।इसी दिव्य अनुभूति का भान हमारे महामना स्वनाम

धन्य,अपने को प्रधान सेवक कहने वाले  प्रधानमन्त्री मोदी जी को हो गया है।

वर्तमान सरकार को यह सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि किसानों का आंदोलन इतना मजबूत, विशाल ,शान्त और प्रभावी होगा। राज्यसभा में मानसून सत्र में

हो हल्ले के दौरान  बिना वोटिंग के ध्वनिमत से पास कराया गया,अकाली दल की

नाराज़गी की  प्रचण्ड बहुमत के नशे में अनदेखी कर दी गई। किसानों से आज प्रत्येक की हमदर्दी जुड़ी हैं, वो अन्नदाता तो है ही और फिर किसान वर्ग में सब  जाति व धर्म के लोग हैं। देश की आधी आबादी खेती से जुड़ी है। पंजाब के

मरजीवड़े युवा व प्रौढ़ किसानों के ज़ज़्बे को भांपने व पहचानने में भूल कर गई

सरकार। जब पंजाब में 2 माह से रेल रोको आंदोलन चल रहा था,केंद्रीय सरकार के राजस्व को हानि पहुँच रही थी तो भी सचेत जाती तो ठीक था ओर फिर दिल्ली आने की घोषणा तो वो एक महीने से कर ही रहे थे। हरियाणा में तो अजब हालत

है,दुष्यंत चौटाला की पार्टी एक ओर तो कहती है,हम किसानों के साथ है फिर

सत्ता का चस्का भी नहीं छोड़ पा रही है।इस दोगलेपन को जनता खूब समझती है।इनका ये कानून कहता है कि किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकता है और इनके अपने ही मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व शिवराज सिंह चौहान कह रहे

है,हम अपने राज्य में दूसरे राज्य के किसान को फसल बेचने नहीं देंगे। अरे। देश के अनोखे कर्णधारों पहले खुद तो इस प्रावधान पर एकमत हो जाओ!

 केंद्रीय सरकार को तो यह गुमान था कि जैसे सी ए ए व नागरिकता कानून से उपजे आंदोलन से निपटे,वैसे ही इससे भी निपट लेंगे पर ये किसान रणबांकुरे तो लम्बी लड़ाई लड़ने की ठान कर आये हैं।जितना लम्बा सरकार खिंचवायेगी,उतना ही ये विशाल दृढ़ और असरदार होता जाएगा। सिर्फ दिल्ली व उसके आसपास के लोग ही नहीं बल्कि धीरे धीरे यह अलग अलग प्रारूपों में फैलता हुआ देश के अधिकांश हिस्सों में द्रश्यमान होगा जिसकी घोषणा ये किसान संगठनों के प्रतिनिधि कर ही रहे हैं।एक दो केंद्रीय मंत्रियों ने इस आंदोलन में चीन,पाकिस्तान, खालिस्तान समर्थकों का हाथ बता कर किसानों के आक्रोश को और बड़ा दिया है।सत्ता के नशे में स्वस्थ राजनीति का अर्थ ही भूल गये है।अपना विरोध करने वाला हर शख्स उन्हें देशद्रोही लगता है। लगता है, यही उनके राजधर्म का पर्याय रह गया है।

एक तरफ तो सरकार दबे स्वरों में ये भी कहती है कि कुछ गलती हमसे हुई है,

कानून लाने से पहले बात करनी चाहिए थी तो अब गलती सुधारने को अपनी

मूंछ की लड़ाई भी बना रहे हो और ऊपर से तुर्रा ये,अपनी धौंस भी दिखा रहे हो।

बाकी ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो सरकार जनभावनाओं का सम्मान नहीं

करती है,सत्ता के मद में भय का माहौल बना देती है, वक्क्त आने पर जनता उसे

धूल भी चटा देती है। इतिहास गवाह है वक्क्त के प्रवाह में बड़े बड़े सिकन्दर डूब गए।ये राज हठ तो छोड़े बिना बात नहीं बनेगी!

आखिर हम ने ने इन्हीं कर्णधारों के हाथ में देश प्रदेश की सत्ता ही नहीं,अपना भविष्य भी  सौंपा है,अपना कल सौंपा हैं,बरसों से सँजोये सुनहरी सपनों को साकार होते देखने की चाहत सजाई है,पर इन्होंने अपने कार्यकलापों से हमारा आज ही खराब कर दिया।जनता ने ही आपको राजपाट दिया था,राजधर्म का पालन करते हुए उसे सुचारू रूप से चलाने के लिये, राज हठ में यह हश्र कर दोगे

सोचा न था! मत भूलो,हश्र करने वालो का हश्र क्या हो,यह निर्धारण भी तो  वक्क्त आने पर उन्हें ही करना है,जिन्होनें तुम्हें ये राजपाट सौंपा है!

-राजकुमार अरोड़ा गाइड

कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार

सेक्टर 2,बहादुरगढ़(हरियाणा)

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