भोपाल गैस त्रासदी : 34 साल तबाही के

2 दिसंबर 1984 यह तारीख़ जहन में आते ही लोगों की रूह कांप जाती हैं। यह वह काली रात थी जिसमे हज़ारों लोग काल के गाल में समा गए थे।भोपाल की गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है। तीन दिसंबर, 1984 को आधी रात के बाद सुबह यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली जहरीली गैस (मिक या मिथाइल आइसो साइनाइट) ने हजारों लोगों की जान ले ली थी। मरने वालों की संख्या को लेकर मदभेद हो सकते हैं, लेकिन इन त्रासदी की गंभीरता को लेकर किसी को कोई शक, शुबहा नहीं होगा।इसलिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि मरने वालों की संख्या हजारों में थी। प्रभावितों की संख्या लाखों में हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।उस मनहूस सुबह को यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर ‘सी’ में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे। लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर एकाएक क्या हो रहा है? कुछ लोगों का कहना है कि गैस के कारण लोगों की आंखों और सांस लेने में परेशानी हो रही थी। जिन लोगों के फैंफड़ों में बहुत गैस पहुंच गई थी वे सुबह देखने के लिए जीवित नहीं रहे।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार लोग मारे गए थे। हालांकि गैर सरकारी स्रोत मानते हैं कि ये संख्या करीब तीन गुना ज्यादा थी। इतना ही नहीं, कुछ लोगों का दावा है कि मरने वालों की संख्या 15 हजार से भी अधिक रही होगी। पर मौतों का ये सिलसिला उस रात शुरू हुआ था वह बरसों तक चलता रहा। यह तीन दशक बाद भी जारी है, जबकि हम त्रासदी के सबक से सीख लेने की कवायद में लगे हैं। अब तक लाखों लोग अस्थमा और कैंसर की बीमारी से लड़ते हुए मर रहे हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि कार्बाइड फैक्टरी से करीब 40 टन गैस का रिसाव हुआ था और इसका कारण यह था कि फैक्टरी के टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस से पानी मिल गया था। इस घटना के बाद रासायनिक प्रक्रिया हुई और इसके परिणामस्वरूप टैंक में दबाव बना। अंतत: टैंक खुल गया और गैस वायुमंडल में फैल गई।

इस गैस के सबसे आसान शिकार भी कारखाने के पास बनी झुग्गी बस्ती के लोग ही थे। ये वे लोग थे जो कि रोजीरोटी की तलाश में दूर-दूर के गांवों से आकर यहां पर रह रहे थे। उन्होंने नींद में ही अपनी आखिरी सांस ली। गैस को लोगों को मारने के लिए मात्र तीन मिनट ही काफी थे। कारखाने में अलार्म सिस्टम था, लेकिन यह भी घंटों तक बेअसर बना रहा। हालांकि इससे पहले के अवसरों पर इसने कई बार लोगों को चेतावनी भी थी।

जब बड़ी संख्‍या में लोग गैस से प्रभावित होकर आंखों में और सांस में तकलीफ की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों को भी पता नहीं था कि इस आपदा का कैसे इलाज किया जाए? संख्या भी इतनी अधिक कि लोगों को भर्ती करने की जगह नहीं रही। बहुतों को दिख नहीं रहा था तो बड़ी संख्या में लोगों का सिर चकरा रहा था। सांस लेने में तकलीफ तो हरेक को हो रही थी। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि पहले दो दिनों में लगभग 50 हजार लोगों का इलाज किया गया।

जैसी कि आशंका थी कि शुरू में डॉक्टरों को ही ठीक तरह से पता नहीं था कि क्या इलाज किया जाए। शहर में ऐसे डॉक्टर भी नहीं थे, जिन्हें मिक गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव रहा हो। हालांकि गैस रिसाव के आठ घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैसों के असर से मुक्त मान लिया गया, लेकिन वर्ष 1984 में हुई इस हादसे से भोपाल उबर नहीं पाया है। …और जब-जब तक इसकी याद रहेगी तब तक इसके उबरने की संभावना भी नहीं होगी। आज 34 साल बाद भी जेपी नगर, आरिफ नगर और आसपास के मोहल्लों में लोग उस दिन को याद करके सिहर जाते हैं. उस त्रासदी से किसी तरह बचने वाले लोग जब उस रात की कहानी सुनाते हैं तो दिल दहल जाता है।

अंदेशा था फिर लापरवाही क्यों?

ऐसा नहीं है कि किसी को इसका अंदेशा नहीं था. उस दुर्भाग्यपूर्ण रात के पहले भी कई बार छोटे-मोटे हादसे उस कारखाने में हो चुके थे. गैस लीक की छोटी मोटी घटनाएं हुई थीं. एकाध मजदूर उसमें मारे भी गए थे. अख़बारों में यूनियन कार्बाइड कारखाने की लोकेशन पर कई बार सवाल खड़े किए जा चुके थे लेकिन न तो किसी को फर्क़ पड़ना था और न पड़ा.

कारखाना अपनी गति से चलता रहा और शायद अगले कई सालों तक ऐसे ही चलता रहता, अगर उस रात वह हादसा नहीं हुआ होता. सुरक्षा के मानकों को दरकिनार करके मुनाफा बढ़ाने की नीयत के चलते कारखाने में कभी भी कोई दुर्घटना घट सकती थी लेकिन किसी का भी ध्यान उसकी तरफ नहीं था. यह कारखाना शुरू होने के ठीक 10 साल बाद 1979 में कंपनी ने मिथाइल आइसोसाइनाइट का उत्पादन शुरू किया. और इसके ठीक 5 साल बाद एक ऐसा हादसा हुआ जिसे इतिहास की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी मानी जाती है.

तमाम अखबार, पत्रिकाएं और सरकारी अमला इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि उस कांड का असर आज भी मौजूद है. बहुत से बच्चे आज भी अपंग या मानसिक रूप से कमजोर पैदा हो रहे हैं और पिछले 34 वर्षों में कितने ही लोगों ने धीरे धीरे कैंसर और अस्थमा जैसे रोगों से अपनी जान गंवा दी है। लोगों को मुआवजा तो मिला है लेकिन उतना नहीं जितना मिलना चाहिए था. और जिन लोगों को इस हादसे में उनसे छीन लिया है, उनका दर्द कभी भर ही नहीं सकता. आज यूनियन कार्बाइड का कारखाना उजाड़ पड़ा है लेकिन जहरीले पदार्थों का अवशेष अब भी मौजूद है. जरूरत है इस हादसे से सबक लेने की जिससे भविष्य में कोई और गैस कांड या ऐसी कोई त्रासदी ना हो.

– पुरु शर्मा

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